इयर बुक के इस खण्ड में वर्ष 2021-22 वैसे 100 समसामयिक महत्वपूर्ण मुद्दे को समाहित किया गया है, जो भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, आंतरिक सुरक्षा और विज्ञान व प्रौद्योगिकी जैसे महत्वपूर्ण विषयों के अलावा शासन और नैतिकता सम्बन्धी मुद्दों के विश्लेषण पर आधारित है, जो न सिर्फ वर्तमान समय में बल्कि आगे आने वाले वर्षों में भी प्रासंगिक बने रहेंगे।
वर्तमान में परिवर्तित होती भू-राजनीतिक और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था से भारत भी प्रभावित हो रहा है, जिसका प्रभाव आर्थिक और वैदेशिक नीतियों पर पड़ने के साथ-साथ ऊर्जा नीति, आतंरिक और बाह्य सुरक्षा पर पड़ रहा है, जबकि साइबर अपराध तथा मानवीय नैतिकता के मुद्दे विशेषकर आपदा के समय में गंभीर प्रश्न बनकर उभरे हैं, इसलिए समसामयिक मुद्दे से सम्बन्धित इस खंड में इन सभी मुद्दों को प्रमुखता से विश्लेषित किया गया है।
भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा 21 सदी में तकनीकी तथाडिजिटल कृषि का महत्व बढ़ने और जलवायु परिवर्तन से इसके प्रभावित होने का मुद्दे महत्वपूर्ण है, साथ हीअर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों जिसमें कौशल विकास, अवसंरचना, ऊर्जा सुरक्षा तथा सूक्ष्म लघु उद्योग की भूमिका महत्वपूर्ण है, इसलिए इन सभी मुद्दों की समझ वर्तमान में आवश्यक हो जाती है।
इसी प्रकार वर्तमान समय में बदलती भू-राजनीतिक व्यवस्था तथा भारत के पडोसी देशों के साथ संबंधों में उतार-चढ़ाव से भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा सम्बन्धी मुद्दे काफी महत्वपूर्ण हो जाते हैं, इसलिए इस खण्ड में भारत की लोक कूटनीति तथा सॉफ्ट पावर की विदेश नीति में भूमिका के साथ-साथ विश्व के प्रमुख वैदेशिक क्षेत्रों के साथ संबंधों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, जिसका उद्देश्य एक समग्र संकल्पना को विकसित करना है।
आर्थिक तथा विदेशी नीतियों की सफलता में राजनीतिक शासन व्यवस्था, विज्ञान व प्रौद्योगिकी तथा उभरती नवीनतम तकनीकी की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती हैद्य अतः पेगासस, भारत की संघीय व्यवस्था में दल-बदल की समस्या तथा अधिकार सम्बन्धित मुद्दे वर्तमान में प्रमुख प्रश्न बनकर उभरे हैं, जिनका समाधान कर भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो सकता है, इसलिए इन सभी संकल्पनाओं की व्याख्या अति आवश्यक हो जाती है।
अतः समसामयिक मुद्दों से सम्बन्धित इन खंड में उपरोक्त सभी पहलुओं को समावेशित कर एक विस्तृत विश्लेषण को प्रस्तुत किया गया है, जो न सिर्फ भारत बल्कि वैश्विक दृष्टिकोण से भी प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण हैं।
आर्थिक परिप्रेक्ष्य के मुद्दे
इसमें भारतीय अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित वैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया है जो समसामयिक प्रवृत्ति के होते हुए भी दीर्घकालिक महत्व के विषय है तथा इस मुद्दों से सम्बन्धित विषयों से संघ लोक सेवा आयोग तथा राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में लगातार प्रश्न पूछे जाते हैं।
अतः इस खण्ड में वर्तमान में चर्चित रहे मुद्दे जैसे डिजिटल मुद्रा और क्रिप्टो मुद्रा, सूक्ष्म और लघु उद्योग, भारत की विनिवेश नीति के साथ-साथ कृषि से जुड़े तमाम मुद्दे को शामिल किया किया है, जो प्रारंभिक, मुख्य परीक्षा के साथ-साथ साक्षात्कार में भी सामान्य रूप से उपयोगी साबित हो सकेगा।
राष्ट्र हित व सुरक्षा से जुड़े मुद्दे
एक राष्ट्र की राष्ट्रीय सुरक्षा उसकी भौगोलिक विशेषताओं, ऐतिहासिक विरासत, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक विकास से निर्धारित होती है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती सामाजिक अशांति और उथल-पुथल तथा सशस्त्र संघर्ष के कारण दुनिया के सभी राष्ट्र अपनी सुरक्षा के प्रति चिंतित हैं। भारत के समक्ष बाह्य और आंतरिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ विद्यमान हैं। बढ़ती हुई सीमावर्ती झड़पों के कारण सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की शांति एवं स्थिरता भंग होती है; वहीं दूसरी तरफ महत्वपूर्ण संसाधनों का व्यय आर्थिक विकास पर खर्च न कर रक्षा उपकरणों की खरीद पर करना पड़ता है। इस बाधा ने भारत के सुरक्षा वातावरण को गंभीर रूप से प्रभावित करने के साथ आर्थिक स्वतंत्रता को प्रभावित किया है। साइबर सुरक्षा में ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आदि को शामिल कर सुरक्षा खतरों एवं आतंकवाद के पारंपरिक रूपों को दूर किया जा रहा है।
पर्यावणीय सुरक्षा चिंता
पर्यावरण में वह सभी प्राकृतिक संसाधन शामिल हैं जो कई तरीकों से हमारी म करते हैं तथा चारों ओर से हमें घेरे हुए हैं। यह हमें बढ़ने तथा विकसित होने का बेहतर माध्यम देता है, यह हमें वह सब कुछ प्रदान करता है जो इस ग्रह पर जीवन यापन करने हेतु आवश्यक है। हमारा पर्यावरण भी हमसे कुछ म की अपेक्षा रखता है जिससे की हमारा लालन पालन हो, हमारा जीवन बना रहे और कभी नष्ट न हो। तकनीकी आपदा की वजह से दिनप्रति दिन हम प्राकृतिक तत्व को अस्वीकार रहे हैं। अमेरिका की प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता मिस सेम्पल के अनुसार ‘मानव अपने पर्यावरण की उत्पत्ति है’। पर्यावरण यानी हमारे चारों और मौजूद जीव-अजीव घटकों का आवरण, जिससे हम घिरे हुए हैं जैसे कि जीव-जंतु, जल, पौधे, भूमि और हवा जो प्रकृति के संतुलन को अच्छा बनाएं रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राचीन काल मे पर्यावरण प्रदूषण जैसी कोई समस्या नहीं थी। लेकिन आज विकास के नाम पर विज्ञान और तकनीकों के बढ़ते प्रयोग के परिणामस्वरूप पर्यावरण दूषित हो रहा है, जिसकी वजह से न सिर्फ हमारा वर्तमान तो बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, लेकिन बल्कि हमारा भविष्य भी संकट में है। विकास की दौड़ में पर्यावरण की उपेक्षा हो रही है। इसके लिए मानव समाज को पर्यावरण को बचाने व बढ़ाने की जरूरत है। इससे भविष्य में पर्यावरण संकट कम हो सकता है।
संवैधानिक मुद्दों की व्याख्या
आज दुनिया के ज्यादातर देशों के पास अपना संविधान है। आमतौर पर सभी लोकतांत्रिक देशों के बारे में उम्मीद की जा सकती है कि उनके पास संविधान जरूर होगा। संविधान कई उद्देश्यों की पूर्ति करता है। पहला, यह दस्तावेज उन आदर्शों को सूत्रबद्ध करता है जिनके आधार पर नागरिक अपने देश को अपनी इच्छा और सपनों के अनुसार निर्माण कर सकते हैं। यानी संविधान ही बताता है कि हमारे समाज का मूलभूत स्वरूप क्या हो। देश के भीतर आमतौर पर कई समुदाय रहते हैं। उनके बीच कई बातें समान होती हैं लेकिन जरूरी नहीं कि वे सारे मुद्दों पर एक-दूसरे से सहमत हों। संविधान नियमों का एक ऐसा समूह होता है जिसको एक देश के सभी लोग अपने देश को चलाने की पद्धति के रूप में अपना सकते हैं। इसके जरिए वे न केवल यह तय करते हैं कि सरकार किस तरह की होगी बल्कि उन आदर्शों पर भी एक साझी समझ विकसित करते हैं जिनकी हमेशा पूरे देश में रक्षा की जानी चाहिए।
शासन आधारित नीतियों का विश्लेषण
शासन संचालन की गतिविधि को शासन कहते हैं, या दूसरे शब्दों में कहें तो, राज करने या राज चलाने को शासन कहा जाता है। इसका संबंध उन निर्णयों से है जो उम्मीदों को परिभाषित करते हैं, शक्ति देते हैं, या प्रदर्शन को प्रमाणित करते हैं। यह एक अलग प्रक्रिया भी हो सकती है या प्रबंधन अथवा नेतृत्व प्रक्रिया का एक खास हिस्सा भी हो सकती है। कभी कभी लोग इन प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं के संचालन के लिए सरकार की स्थापना करते हैं। किसी कारोबार अथवा गैर-लाभकारी संगठन के सन्दर्भ में, शासन का तात्पर्य अविरुद्ध प्रबंधन, एकीकृत नीतियों, मार्गदर्शन, प्रक्रियाओं और किसी दिए गए क्षेत्र के निर्णायक-अधिकारों से संबंधित है। उदाहरण के लिए, कॉर्पोरेट स्तर पर प्रबंधन के लिए गोपनीयता, आंतरिक निवेश, तथा आंकड़ों के प्रयोग संबंधी नीतियाँ बनाना शामिल हो सकता है।
मानवीय मूल्य एवं नैतिक मुद्दे
नैतिकता का हमारे जीवन में बहुत बडा स्थान है। जगह जगह पर यह सुननें और देखनें को मिल जाता है कि अब नैतिकता बची ही कहां है। किंतु यह क्या ऐसा वास्तिविकता में है? नैतिकता मूलरूप से नीति से उत्पन्न हुई है। नीति से नीतिक और इसी का अपभ्रंश नैतिक है। नीति से उत्पन्न भाव नैतिकता कहलाते हैं। नीति एक तरह की विचारधारा है जिसके अंतर्गत हमारे समाजिक ढांचे को मजबूत किया गया है। मनुष्य का विकास क्रमिक है। मनुष्य के विकास के साथ-साथ उनका सामाजिक दायरा बढा, सोंच बढी जिसके साथ-साथ नैतिकता भी बढी। आदिकाल से लेकर मध्यकाल तक नैतिकता सामाजिक विकास के अनुपातिक क्रम मे बढी। जैसे जैसे मनुष्य ने अर्वाचीन काल में प्रवेश किया उसी समय से नैतिकता में गिरावट आनी शुरू हो गई। नैतिकता का क्षेत्र विस्तृत है। इसके अंदर वे सभी नियम कानून आ जाते हैं जो किसी भी संस्था को चलाने के लिये आदर्श माने जाते हैं।
सामाजिक सरोकार से जुड़े विषय
सामाजिक सरोकार, सामाजिक संरचना के उन विभिन्न पहलुओं और सामाजिक कारकों का अध्ययन है जो समाज के तीव्र विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं। इसका उद्देश्य किसी समुदाय के समक्ष उस आर्दश प्रारूप को प्रस्तुत करना है, जो उस समुदाय के लोगों को विकास की ओर अग्रसर कर सके।
विकास को आर्थिक संवृद्धि से हमेशा अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे बदलते समय के अनुसार विशेषज्ञ पुनः परिभाषित करने की कोशिश करते हैं। हाल के वर्षों में अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को अपनाने से विकास की परिभाषा में परिवर्तन आया है। विकास ऐसे परिवर्तनों को लक्षित करता है, जो प्रगति की ओर उन्मुख रहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विकास एजेंसियां इसको ध्यान में रखते हुए, अपना कार्य सम्पादित कर रही हैं। उदाहरण के लिए जीवन का अधिकार, काम करने का अधिकार, भोजन का अधिकार, बोलने की स्वतंत्रता का अधिकार आदि। विकास जैसी गतिशील प्रक्रिया में मानवाधिकार, मूल्यवान मार्गदर्शक रहा है।
नवीन प्रौद्योगिकी विकास की रूपरेखा
हम प्रौद्यौगिकी का वर्णन उत्पादों और प्रक्रियाओं के रूप में कर सकते हैं जिनका उपयोग हमारे दैनिक जीवन को सरल बनाने के लिए किया जाता है। हम अपनी क्षमताओं का विस्तार करने के लिए प्रौद्यौगिकी का उपयोग करते हैं, जिससे लोग किसी भी तकनीकि प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं। प्रौद्योगिकी ज्ञान, कौशल, अनुभव और तकनीकों का एक समूह है, जिसके माध्यम से मनुष्य हमारे पर्यावरण और उपकरण, मशीनों, उत्पादों और सेवाओं को बनाने, बदलने में उनका उपयोग करते हैं जो हमारी जरूरतों और इच्छाओं को पूरा करते हैं। प्रौद्योगिकी का सबसे सरल रूप बुनियादी साधनों या उपकरणों का विकास और उपयोग है। आर्थिक वृद्धि की प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी को मौलिक कारक माना जाता है। प्रौद्योगिकीय परिवर्तन का अर्थ है पूंजी और मशीनरी के उत्पादन में प्रयुक्त तकनीकि ज्ञान। प्रौद्योगिकी में विभिन्न परिवर्तन श्रम, पूंजी तथा उत्पादन के अन्य कारकों की उत्पादकता में वृद्धि कर देते हैं।
कला, संस्कृति व विरासत
कला एवं संस्कृति किसी समाज एवं देश की अमूल्य धरोहर होती है। यह हमारे समाज के लिए आईना होती है, जिसके माध्यम से हम अपने इतिहास एवं जीवंतता को महसूस करते हैं और इस पर गौरवान्वित होते हैं। भारतीय संविधान के मूल कर्तव्य में हमारे संस्कृति एवं धरोहर को संजोये रखने का जिक्र किया गया है। इस मूल कर्तव्य का पालन हम तभी कर सकते हैं जब इनकी बारिकियों से भली भांति अवगत हों। प्राचीन राष्ट्रों में केवल भारत ही एक ऐसा राष्ट्र है, जिसने अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये कठोर संघर्ष किया, अपनी संस्कृति को बचाये रखा तथा उसे संवाहित किया है। हमारी संस्कृति जीवन्त बनी रही क्योंकि इसमें कुछ वैसे शाश्वत मूल्यों का पोषण और विकास होता रहा है जो चिरकाल से भारत में बने हुये हैं। इसकी संस्कृति जीवन्त है, उसकी जड़े जीवन्त अतीत में निहित है और यह एक जीवन्त आध्यात्मिक भूमि पर स्थापित है। इस संस्कृति ने विश्व में विद्यमान वैचारिक एवं भौतिक भिन्नता के उपरान्त भी आध्यात्मिक एकता के सिद्धान्त को स्थापित किया।
कोविड-19 महामारी के कारण पिछले दो साल विश्व अर्थव्यवस्था के लिए कठिन रहा है। संक्रमण की नयी लहरों, आपूर्ति-श्रृंखला में व्यवधान, और हाल ही में मुद्रास्फीति के कारणवश नीति-निर्माण के लिए यह समय विशेषतः चुनौतीपूर्ण रहा है। इन चुनौतियों की तत्काल प्रतिक्रिया के रूप में भारत सरकार ने समाज के कमजोर वर्गों एवं व्यापार क्षेत्र के लिए एक विस्तृत सुरक्षा-जाल का गठन किया।
इसके उपरांत, बुनियादी ढांचे पर पूंजीगत व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि की गयी तथा मध्यम-अवधि की मांग पुनः बढ़े, एवं अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक विस्तार के लिए आपूर्ति-पक्ष उपायों को कृतसंकल्प लागू किया गया।
भारत में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में अग्रिम अनुमान के अनुसार, 2021-22 में 9.2 प्रतिशत के विस्तार की उम्मीद है।
महामारी से कृषि और संबद्ध क्षेत्र सबसे कम प्रभावित हुए हैं और पिछले वर्ष में 3.6 प्रतिशत की वृद्धि के बाद इस क्षेत्र के 2021-22 में 3.9 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है। 2020-21 में 7 प्रतिशत संकुचन के पश्चात्, उद्योग के सकल मूल्यवर्धन (खनन और निर्माण सहित) में 2021-22 में 11.8 प्रतिशत की वृद्धि अग्रिम तौर पर अनुमानित है।
सेवा क्षेत्र महामारी से सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। 2021-22 में कुल खपत में 7 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है, जिसमें सरकारी खर्च का महत्वपूर्ण योगदान है।
वस्तुओं और सेवाओं दोनों का निर्यात 2021-22 में असाधारण रूप से मजबूत रहा है, वहीं घरेलू मांग और अंतरराष्ट्रीय वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण आयात में भी मजबूती आई है। आर्थिक गति तीव्र होने, और आपूर्ति-पक्ष सुधारों के संभावित दीर्घकालिक लाभों के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था 2022-23 में सकल घरेलू उत्पाद में 8.0.8.5 प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है। अनिश्चित समय के दौरान वित्तीय तंत्र दबाव का एक संभावित क्षेत्र होता है।
हालांकि, भारत के पूंजी बाजारों ने कई वैश्विक बाजारों की तरह असाधारण रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है, जिसकी मदद से भारतीय कंपनियों के लिए रिकॉर्ड- स्तर पर जोखिम पूंजी जुटाना संभव हुआ है। गौरतलब है कि बैंकिंग प्रणाली अच्छी तरह से पूंजीकृत है और गैर-निष्पादित आस्तियों में, महामारी के विलम्बित प्रभाव को मिलाकर भी, संरचनात्मक रूप से गिरावट आई है।
कृषि और संबद्ध क्षेत्र
भारत की अर्थव्यवस्थाओं में कृषि की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। कुल कार्य बल की 54-6 प्रतिशत आबादी कृषि और उससे संबद्ध क्षेत्र के कार्यकलापों में लगी हुई है (संगणना 2011) और वर्ष 2019-20 में देश के सकल मूल्य संवर्धन में इसकी भागीदारी 16-5 प्रतिशत रही है। कृषि और संबद्ध क्षेत्र का प्रदर्शन कोविड-19 के प्रभाव के प्रति लचीला रहा है। यह क्षेत्र वर्ष 2020-21 में 3.6 प्रतिशत की दर से बढ़ा और वर्ष 2021-22 में सुधरकर 3.9 प्रतिशत हो गया। भारत में पिछले दो वर्षों में कृषि क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ है।
कोविड की वजह से लागू लॉकडाउन द्वारा उत्पन्न कठिनाइयों ने गैर-कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन को प्रतिकूल ढ़ंग से प्रभावित किया, तथापि वर्ष 2020-21 (प्रथम अग्रिम अनुमान) के दौरान स्थिर कीमतों पर कृषि क्षेत्र ने 3.4 प्रतिशत की विकास दर हासिल किया। आत्म-निर्भर भारत अभियान के अंतर्गत शुरू किए गए विभिन्न उपायों जैसे ऋण, बाजार में सुधार और खा/ प्रसंस्करण से इस उद्योग में नवीन स्फूर्ति आई।
वर्ष 2019-20 के दौरान, भारत ने लगभग ` 252 हजार करोड़ के कृषि और संबद्ध उत्पादों का निर्यात किया है। भारत ने जिन देशों को मुख्य रूप से निर्यात किया, उनमें यूएसए, सऊदी अरब है।
मुद्रा और बैंकिंग
बैंक एक वित्तीय संस्था है, जिसका प्राथमिक काम उसके खातों में जमा पैसों का उपयोग करना और ट्टण देना है। इनके जमा और ट्टण काफी विभेदीकृत प्रकृति के होते हैं। बैंकों का विनियमन RBI (भारतीय रिजर्व बैंक) करता है। बैंकिंग राष्ट्रीयकरण अधिनियम, 1969 की मदद से सरकार ने कुल 20 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अनुसार, भारत का बैंकिंग क्षेत्र पर्याप्त रूप से पूंजीकृत और अच्छी तरह से विनियमित है। ऋण, बाजार और चलनिधि जोखिम अध्ययनों से पता चलता है कि भारतीय बैंक आमतौर पर लचीले हैं और उन्होंने वैश्विक मंदी का अच्छी तरह से सामना किया है।
भारत में डिजिटल भुगतान प्रणाली 25 देशों में सबसे अधिक विकसित हुई है, जिसमें भारत की तत्काल भुगतान सेवा (आईएमपीएस) फास्टर पेमेंट्स इनोवेशन इंडेक्स (एफपीआईआई) में पांचवें स्तर पर एकमात्र प्रणाली है।
भारतीय बैंकिंग प्रणाली में सहकारी ऋण संस्थानों के अलावा 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, 22 निजी क्षेत्र के बैंक, 46 विदेशी बैंक, 56 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, 1485 शहरी सहकारी बैंक और 96,000 ग्रामीण सहकारी बैंक शामिल हैं। वर्ष 1949 में भारत के केंद्रीय बैंक (Central bank of India) का राष्ट्रीयकरण भी किया गया था। नरसिम्हन समिति की सिफारिश के साथ, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का गठन 2 अक्टूबर, 1975 को किया गया था।
मुद्रा और प्रतिभूति बाजार
एक विकसित वित्तीय प्रणाली में सुरक्षित तथा उन्नत भुगतान प्रक्रिया, प्रतिभूति बाजार, बाजारों के लिए वित्त व्यवस्था हेतु मध्यस्थों की उपस्थिति के साथ-साथ जोखिम प्रबन्धन हेतु वित्तीय संस्थानों की उपस्थिति अनिवार्य है। वित्त का सामान्य अर्थ है मौद्रिक स्रोत, जिसमें स्वामित्व तथा उधार दोनों सम्मिलित किया जाता है तथा प्रणाली का अर्थ किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक से अधिक सम्बन्धित कार्यों को करने से है। किसी भी अर्थव्यवस्था के वित्तीय प्रणाली (Financial System) के दो महत्वपूर्ण कार्य हैं। व्यक्तियों तथा संस्थाओं/संगठनों के आधिक्य वित्त (Surplus Fund) को चलन में लाना व आधिक्य कोषों (Surplus Funds) को उन व्यक्तियों तथा संगठनों को मुहैया कराना।
वित्तीय समावेशन
रिजर्व बैंक वित्तीय समावेशन को सामान्य रूप से समाज के सभी जरुरतमंद वर्गों और विशेष रूप से निम्न आय समूह वाले कमजोर वर्गों तक विनियमित मुख्यधारा के सस्ंथागत भागीदारियों द्वारा उचित और पारदर्शी तरीके से सस्ती कीमत पर आवश्यक उचित वित्तीय उत्पादों और सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित करता है। वित्तीय समावेशन के तहत निम्न आय वर्ग तथा कमजोर समूह वाले वर्ग तक वित्तीय सेवाओं तथा वित्तीय साक्षरता की पहुँच के रूप में परिभाषित किया गया है।
मुद्रास्फ़ीति
यह मांग में उत्पन्न होने वाले असंतुलन की स्थिति है तथा इससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती है। कीमतों में इस वृद्धि को मुद्रास्फीति कहते हैं। भारत अपनी मुद्रास्फीति की गणना दो मूल्य सूचियों के आधार पर करता है- थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index-WPI) एवं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index-CPI)। मुद्रास्फीति मुख्यतः दो कारणों से होती है, मांगजनित कारक एवं लागतजनित कारक। अगर मांग के बढ़ने से वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है तो वह मांगजनित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation) कहलाती है। अगर उत्पादन के कारकों (भूमि, पूंजी, श्रम, कच्चा माल आदि) की लागत में वृद्धि से वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि होती है तो वह लागतजनित मुद्रास्फीति (Cost-Push Inflation) कहलाती है।
प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में कोविड़-19 से संबंधित प्रोत्साहन खर्च के साथ-साथ उपभोक्ता खर्च को बढ़ाने वाली मांग ने कई उन्नत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति को बढ़ा दिया।
सेवा क्षेत्र
भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सेवा क्षेत्र का योगदान 50 प्रतिशत से अधिक है, जबकि कोविड-19 महामारी का अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, सेवा क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ क्योंकि भारत के जीवीए में इसकी भागीदारी वर्ष 2019-20 में 55 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2021-221 में 53 प्रतिशत हो गई। सेवा क्षेत्र के भीतर, कोविड-19 का प्रभाव विविध रहा। जबकि गैर-संपर्क सेवाएं जैसे सूचना, संचार, वित्तीय, पेशेवर एवं व्यावसायिक सेवाएं लचीली बनी रही। संपर्क आधारित सेवाएँ जैसे पर्यटन, खुदरा व्यापार, होटल, आतिथ्य तथा मनोरंजन आदि पर बहुत गंभीर प्रभाव रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी क्षेत्र
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार बाजार है। दूरसंचार क्षेत्र किसी देश के सामाजिक और आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले सबसे शक्तिशाली क्षेत्रों में से एक है। देश में सूचना प्रौद्योगिकी अहम भूमिका निभा रही है। भारत अब आधुनिक दुनिया की सबसे बड़ी आईटी राजधानी में से एक है। उत्तर प्रदेश, देश में सबसे अधिक आबादी वाला राज्य और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ ही देश में सॉफ्टवेयर निर्यात के छठे स्थान के साथ उत्तर भारत का आईटी हब है। आईटी/आईटीईएस क्षेत्र में सबसे बड़ा योगदान देने वाला राज्य लगातार अवसंरचना, मानव पूंजी विकास और प्रभावी नीति कार्यान्वयन के विकास पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, ताकि आईटी-बीपीएम उद्योग के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया जा सके।
कौशल विकास
देश के कार्यशील आबादी को हुनरमंद और स्वरोजगार से जोड़ने के हेतु किये जाने वाले प्रयास कौशल विकास कहलाते हैं। इसके लिए केन्द्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMMVY) चलाई जा रही है। व्यापक स्तर पर बेरोजगारी का प्रमुख कारण युवाओं को अपर्याप्त और गुणवत्ताविहीन कौशल प्रशिक्षण देना है। भारत ने वर्ष 2022 तक 30 करोड़ लोगों को कौशल एवं प्रशिक्षण प्रदान करने का लक्ष्य रखा है। भारत में कौशल विकास तथा बेरोजगारी की समस्या के मूल में स्कूली स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा की अनुपस्थिति तथा विभिन्न कौशल विकास योजनाओं का अप्रभावी क्रियान्वयन है। इसे दूर कर भारत की कार्यशील आवादी को रोजगार प्रदान किया जा सकता है तथा भारत जनसांख्यिकी लाभांश को सही दिशा में उपयोग कर आर्थिक संविृद्धि को प्राप्त कर सकता है।
पर्यटन
संयुक्त राष्ट्र विश्व पर्यटन संगठन की दीर्घकालिक भविष्यवाणी टूरिज्म टुवार्डस 2030 के अनुसार 2010 से 2030 के मध्य पूरी दुनिया में अंतरराष्ट्रीय पर्यटक आगमन में 3.3 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से वृद्धि होगी और 2030 तक अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या 1.8 बिलियन प्रतिवर्ष पहुँच जाएगी।
देश के सकल घरेलू उत्पाद में इस क्षेत्र का योगदान 5% है तथा कुल रोजगार की दृष्टि से यह 13% का योगदान देता है। विदेशी पर्यटकों के मामले में वर्ष 2017 से देश में उनके आगमन में कमी आई है तथा अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के आगमन के मामले में भारत का विश्व में 23वां स्थान है तथा विदेशी मुद्रा अर्जन के मामले में 12वां स्थान है। पर्यटन मंत्रालय का मुख्य उद्देश्य भारत में अंतर्गामी और घरेलू दोनों तरह के पर्यटन को बढ़ावा देना और सुविधा प्रदान करना है। पर्यटन के बुनियादी ढांचे को बढ़ाना, यात्रा में आसानी सुनिश्चित करना, पर्यटन उत्पादों और गंतव्यों को बढ़ावा देना लक्षित क्षेत्रों में से एक है।
बीमा क्षेत्र
बीमा क्षेत्र के प्रदर्शन और क्षमता का आकलन दो संकेतकों पर किया जाता है-इंश्योरेंस पेनेट्रेशन (बीमा पैठ) और इंश्योरेंस डेंसिटी (बीमा घनत्व)। इंश्योरेंस पेनेट्रेशन की गणना जीडीपी के बीमा प्रीमियम प्रतिशत के रूप में की जाती है और इंश्योरेंस डेंसिटी की गणना आबादी के बीमा प्रीमियम के अनुपात के रूप में की जाती है।
भारत में, जहां 2001 में इंश्योरेंस पेनेट्रेशन 2.71 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2019 में बढ़कर यह 3.76 प्रतिशत हो गया। इसके विपरीत, एशिया यानी मलेशिया, थाईलैंड और चीन में 2019 में इंश्योरेंस पेनेट्रेशन क्रमशः 4.72, 4.99 और 4.30 प्रतिशत था। वर्ष 2019 में, भारत में जीवन बीमा के लिए पेनेट्रेशन 2.82 प्रतिशत था, जबकि गैर-जीवन बीमा इससे कहीं कम, 0.94 प्रतिशत था।
अवसंरचना
अवसंरचना किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए रीढ़ की हड्डी होती है। अवसंरचना की सीमा तथा गुणवत्ता देश की तुलनात्मक लाभ का उपयोग करने और लागत प्रतिस्पर्धात्मकता को सक्षम करने की क्षमता को निर्धारित करती है। सशक्त बैकवर्ड और फॉरवर्ड लिंकेज तथा अवसंरचना से उत्पन्न सकारात्मक परिणामों को देखते हुए, यह सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन के लिए एक वाहन हो सकता है।
अवसंरचना में सार्वजनिक-निजी भागीदारी इस क्षेत्र में निवेश का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। अवसंरचना में निजी भागीदारी पर विश्व बैंक के डेटाबेस के अनुसार, भारत पीपीपी परियोजनाओं की संख्या के साथ-साथ संबद्ध निवेशों में विकासशील देशों में दूसरे स्थान पर है।
ऊर्जा क्षेत्र
देश में बिजली की मांग तेजी से बढ़ी है और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की उम्मीद है। देश में बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए, स्थापित उत्पादन क्षमता में भारी वृद्धि की आवश्यकता है।
सतत विकास लक्ष्य 7 - सस्ती और प्रदूषण-मुक्त ऊर्जा सस्ती, विश्वसनीय, सतत और आधुनिक ऊर्जा सुलभता को सुनिश्चित करना है। ऊर्जा की सतत् सुलभता से वंचित लोग राष्ट्र और विश्व की प्रगति में हिस्सा लेने के अवसर से वंचित रह जाते हैं, फिर भी दुनिया भर में एक अरब लोगों को ऊर्जा सुलभ नहीं है। इसके लिए सुनिश्चित करना होगा कि 2030 तक हर किसी को सस्ती, विश्वसनीय और आधुनिक ऊर्जा सेवाएं सुलभ हों।
भारतीय बिजली क्षेत्र एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा है, जिसने उद्योग के दृष्टिकोण को फिर से परिभाषित किया है। भारत में बिजली की मांग को बढ़ाने के लिए सतत आर्थिक विकास जारी है। भारत सरकार के ‘सभी के लिए बिजली’ प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करने से देश में क्षमता वृद्धि में तेजी आई है। साथ ही, बाजार और आपूर्ति पक्षों (ईंधन, रसद, वित्त और जनशक्ति) दोनों में प्रतिस्पर्धात्मक तीव्रता बढ़ रही है।
भारत में 2022 तक, सौर ऊर्जा का 114 गीगावॉट पवन ऊर्जा से 67 गीगावॉट और बायोमास और जल विद्युत से 15 गीगावॉट का योगदान होगा। 2022 तक अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य बढ़ाकर 227 गीगावाट कर दिया गया है।
FY22 में (अक्टूबर 2021 तक), देश में कुल थर्मल स्थापित क्षमता 234.44 GW थी। अक्षय, पनबिजली और परमाणु ऊर्जा की स्थापित क्षमता क्रमशः 103.05 GW, 46.51 GW और 6.78 GW है।
उधोग क्षेत्र
कोविड-19 महामारी के कारण हुए व्यवधानों से वैश्विक औद्योगिक गतिविधि प्रभावित होती रही है। यघपि भारतीय उद्योग इन व्यवधानों का अपवाद नहीं था, परंतु वर्ष 2021-22 में इसके प्रदर्शन में सुधार हुआ है। अर्थव्यवस्था के धीरे-धीरे खुलने, रिकॉर्ड टीकाकरण, उपभोक्ता मांग में सुधार, आत्मनिर्भर भारत अभियान के रूप में सरकार द्वारा उद्योगों के प्रति निरंतर नीति सहयोग तथा वर्ष 2021-22 में आगे सुदृढ़ीकरण के कारण औद्योगिक क्षेत्र के प्रदर्शन में तेजी आई है। औद्योगिक क्षेत्र की वृद्धि, वर्ष 2021-22 की पहली छमाही में, 2020-21 की इसी अवधि की तुलना में 22.9 प्रतिशत थी और इस वित्तीय वर्ष में 11.8 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है। जैसा कि आईआईपी के संचयी विकास में परिलक्षित होता है। वर्ष 2021-22 के अप्रैल-नवंबर दौरान वर्ष 2020-21 के अप्रैल-नवंबर में (-) 15.3 प्रतिशत की तुलना में आईआईपी 17.4 प्रतिशत की दर से बढ़ा।
वर्तमान में भारत में 6.3 करोड़ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र कार्यशील है तथा इसमें लगभग 110 मिलियन लोग कार्यरत है तथा यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद में 30% का योगदान करता है जिसमें विनिर्माण सबंधी उत्पादन में 45% तथा कुल निर्यात में इसका योगदान 40% है। भारत में इस क्षेत्र के विकास का मुख्य लक्ष्य जीडीपी में इसका योगदान बढाकर 50% करना ताकि भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का सपना पूरा हो सके।
भारत सरकार वर्ष 2020-24 तक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र के योगदान को जीडीपी के 50% तक बढ़ाने और 50 करोड़ रोजगार सृजत करने की योजना बनाई जा रही है।
परिवहन
भारत का परिवहन क्षेत्र यात्री और माल ढुलाई दोनों में सबसे बड़ा भागीदार है, साथ ही यहाँ कुल यातायात का 40% राष्ट्रीय राजमार्गों से किया जा रहा है, जबकि देश में कुल सड़क नेटवर्क का मात्र 2-2% भाग ही राष्ट्रीय राजमार्ग है। जबकि भारत का रेलवे नेटवर्क विश्व में चौथा तथा यात्री ढुलाई में पहला तथा माल ढुलाई में चौथा स्थान रखता है। भारत में लगभग प्रतिदिन 22-24 मिलियन लोग रेलवे से यात्रा करते है। भारत सड़क परिवहन का लक्ष्य में राष्ट्रीय राजमार्गों के माध्यम से माल धुलाई को 40% से बढ़कर 80% करना तथा सड़कों के विनियामक ढांचे में सुधार करना तथा वर्ष 2022-23 तक राष्ट्रीय राजमार्गों की लम्बाई को दोगुना करके 2 लाख किमी करने के साथ-साथ एकल तथा मध्यवर्ती राष्ट्रीय राजमार्गों को चौड़ा करना है। अन्य लक्ष्यों में 2022-23 तक एकल तथा मध्यवर्ती राष्ट्रीय राजमार्गों की लम्बाई को 10% से भी कम स्तर तक लाना तथा ब्राजीलिया घोषणा पत्र के अनुसार वर्ष 2020 तक सड़क दुर्घटना और उससे होने वाली मौत की संख्या में 50% तक की कमी करना शामिल है। रेलवे परिवहन के अंतर्गत अवसंरचना में वृद्धि करना, 2022-23 तक ब्रॉड गेज ट्रैक का 100% विद्युतीकरना करना जो 2016-17 तक 40% तथा मालगाड़ी और मेल एक्सप्रेस ट्रेनों की औसत गति बढ़ाकर क्रमशः 50, और 80 किमी प्रति घंटा करने के साथ-साथ शून्य मृत्यु को सुनिश्चित कर 2022-23 तक 95% समय पर आगमन प्राप्त करते हुए सेवा वितरण में सुधार कर कुल राजस्व में गैर किराया राजस्व का हिस्सा बढ़ाकर 20% करना शामिल है।
विनिर्माण
विनिर्माण भारत में उच्च विकास वाले क्षेत्रों में से एक के रूप में उभरा है। भारत को विश्व मानचित्र पर एक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने और भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक पहचान देने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी जिसका सरकार का लक्ष्य 2022 तक इस क्षेत्र में 10 करोड़ नए रोजगार सृजित करना है। भारत में वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की क्षमता है और 2030 तक यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में सालाना 500 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक जोड़ सकता है। फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, वित्त वर्ष 2022 की दूसरी तिमाही में भारत के विनिर्माण क्षेत्र में क्षमता उपयोग 72.0% था, जो इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार का संकेत देता है। सितंबर 2021 में प्प्च् का मैन्युफैक्चरिंग कंपोनेंट 129.9% था। भारत सरकार ने देश में विनिर्माण क्षेत्र के विकास के लिए एक स्वस्थ वातावरण को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं। सरकार ने 16 संयंत्रों के लिए एक पीएलआई योजना को मंजूरी दी इन 16 संयंत्रों की स्थापना से कुल रु- का निवेश होगा। जिसमें 348-70 करोड़ (US$ 47-01 मिलियन) का निवेश तथा नौकरियों का सृजन होगा।
कर और राजकोषीय नीति
पिछले दो वर्षों में, राजकोषीय नीति महामारी से उपजी आर्थिक गिरावट को दूर करने में एक महत्वपूर्ण उपकरण बनी हुई है। भारत सरकार ने महामारी के लिए एक कैलिब्रेटेड राजकोषीय नीति व दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें स्थिति के अनुरूप समाज/फर्मों के कमजोर वर्गों को ऊपर उठाने की बात कही गयी थी। इस नीति का मुख्य लक्ष्य पारदर्शी वितीय प्रबंधन प्रणाली को सुनिश्चित करना तथा देश के ऋणों का अधिक उचित और प्रबंधनीय वितरण करना है महामारी के प्रारंभिक चरण में, राजकोषीय नीति के जरिए समाज के गरीब और कमजोर वर्गों को सबसे खराब स्थिति के परिणामों से बचाने के लिए सुरक्षा-जाल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया। जहां कमजोर वर्गों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, छोटे व्यवसायों को आपातकालीन ऋण, और 80.96 करोड़ लाभार्थियों को लक्षित करने वाले दुनिया के सबसे बड़े खा/ सब्सिडी कार्यक्रम जैसे प्रोत्साहन प्रदान किये गए है। वर्तमान में सरकार की राजकोषीय नीति का मुख्य उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मांग को उत्प्रेरित करने पर था।
विदेश व्यापार
कोविड-19 महामारी ने 2021 के दौरान वैश्विक आर्थिक वातावरण को प्रभावित करना जारी रखा। वर्ष 2021 की पहली छमाही (H1) में वैश्विक आर्थिक गतिविधि में तेजी देखी गई, जिसने वाणिज्य/पण्य व्यापार को अपने पूर्व-महामारी शिखर से ऊपर उठा दिया। 2021 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अपनी वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक (WEO) रिपोर्ट के अक्टूबर 2021 संस्करण में, वस्तुओं और सेवाओं में वैश्विक व्यापार की मात्रा में 9.7 प्रतिशत की उच्च वृद्धि का अनुमान लगाया, जो अनुमानित वैश्विक सुधार के अनुरूप 2022 में कुछ घट कर 6.7 प्रतिशत तक रह सकती है। पिछले वर्ष की महामारी से प्रेरित मंदी के बाद 2021-22 में विदेशी व्यापार में मजबूती से सुधार हुआ और मजबूत पूंजी प्रवाह से विदेशी मुद्रा भंडार का तेजी से संचय हुआ।
अप्रैल-नवंबर, 2021 में अमेरिका के बाद संयुक्त अरब अमीरात और चीन शीर्ष निर्यात गंतव्य बने रहे, जबकि चीन, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़े आयात स्रोत थे। कमजोर पर्यटन राजस्व के बावजूद, अप्रैल-दिसंबर, 2021 के दौरान सेवाओं से होने वाली निवल आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी, ऐसा मजबूत सॉफ्टवेयर सेवाओं और व्यावसायिक आय के कारण हुआ था
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, सामाजिक सुरक्षा मानव गरिमा और सामाजिक न्याय की मान्यता पर आधारित है, जो उन सभी मनुष्यों हेतु कानून द्वारा गारंटीकृत है, जो अपने श्रम पर जीवनयापन करते हैं तथा कुछ परिस्थितियों के कारण अस्थायी रूप से अथवा स्थायी रूप से कार्य करने में अक्षम होते हैं।
ऐसे में प्रभावी सामाजिक सुरक्षा प्रणालियां किसी भी प्रतिकूल स्थिति में आय की सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी प्रदान करती हैं। परंतु कोविड-19 महामारी ने विशेष रूप से अनौपचारिक कामगारों से संबंधित भारत की सामाजिक सुरक्षा नीतियों के दोषों को प्रकट किया है। भारत ने शेष विश्व के साथ महामारी के प्रकोप का सामना किया, भारत सरकार का मुख्य ध्यान समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा कवच प्रदान करने के साथ-साथ महामारी के स्वास्थ्य परिणामों के लिए एक सुसंगत प्रतिक्रिया प्रदान करने पर रहा। भारत पहले से ही दो कोविड-19 लहरों का सामना कर चुका है, पहली लहर सितंबर 2020 के मध्य में तथा दूसरी मई 2021 के अंत में आई और अब वर्तमान में ओमीक्रोन वेरियंट वाली तीसरी लहर का सामना कर रहा है।
त्रैमासिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2021 तक महामारी से प्रभावित शहरी क्षेत्र में रोजगार लगभग पूर्व-महामारी के स्तर तक पहुंच गया। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के आंकड़ों से पता चलता है कि न केवल दूसरी कोविड-19 लहर के दौरान नौकरियों का औपचारिकता जारी रहा, बल्कि नौकरियों की औपचारिकता पर दूसरी लहर का प्रभाव भी पहली कोविड-लहर की तुलना में बहुत कम रहा।
महामारी के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में असंगठित श्रमिकों के लिए आवश्यक रोजगार प्रदान करने के लिए, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के लिए धन के आवंटन को वर्ष के दौरान बढाया गया है।
नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, स्कूल अवसंरचना जैसे मान्यता प्राप्त स्कूलों तथा कॉलेजों की संख्या एवं स्कूलों में बुनियादी सुविधायें और छात्र-शिक्षक अनुपात में परिलक्षित शिक्षकों की उपलब्धता में पिछले वर्षों की तुलना में वर्ष 2019-20 में सुधार हुआ। वर्ष 2019-20 में उच्च प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च माध्यमिक में नामांकन दरों में सुधार और सभी स्तरों पर स्कूल ड्रॉपआउट दर में भी सुधार देखा गया।
नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 ने स्वास्थ्य तथा अन्य सामाजिक क्षेत्रों में सरकारी कार्यक्रमों के उत्साहजनक परिणाम दिखाए। कुल जन्म दर (टीएफआर) वर्ष 2015-16 में 2-2 से घटकर वर्ष 2019-21 में 2 हो गई। स्वास्थ्य अवसंरचना तथा जनता तक पहुंचने वाली सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार देखा गया।
महिला एवं बाल विकास व संरक्षण
भारतीय संविधान में लैंगिक समानता का सिद्धांत प्रतिष्ठापित है। संविधान महिलाओं को न केवल समानता प्रदान करता है, अपितु महिलाओं के समक्ष संचयी सामाजिक-आर्थिक तथा राजनैतिक अधिकार भी प्रदान करता है। महिलाओं को लिग के आधार पर भेदभाव नहीं किए जाने और कानून के तहत समान संरक्षण प्राप्त करने का मौलिक अधिकार है। यह प्रत्येक नागरिक पर महिलाओं की गरिमा के प्रतिकूल प्रथाओं को समाप्त करने का मौलिक कर्त्तव्य भी प्रदान करता है। सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) ने विकास संबंधी प्राथमिकताओं को परिभाषित करने में मुख्य भूमिका निभाई है। महिला सशक्तीकरण को गरीबी उन्मूलन, असमानता, बेहतर स्वास्थ्य, उत्कृष्ट कार्यों और आर्थिक विकास जैसे सतत विकास लक्ष्यों के विभिन्न लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पूर्वशर्त के रूप में व्यापक रूप से मान्यता दी गई है। महिलाओं और बच्चों की बेहतरी देश के जनसांख्यिकीय लाभांश की प्राप्ति के लिए अनिवार्य होती है। महिलाओं को सशक्त बनाने तथा उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, घरेलू हिसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, दहेज प्रतिषेध अधिनियम आदि कानूनों लागू किया जा रहा है। हमारे देश के विकास में जेंडर समानता के मुद्दे को मुख्य स्थान दिया गया है। यह धारणा तय सतत विकास लक्ष्यों के माध्यम से प्रतिबिबित होती है जिसे आधिकारिक तैार पर ‘हमारी बदलती दुनिया: 2030 सतत विकास का एजेन्डा’ के रूप जाना जाता है, 1 जनवरी, 2016 से लागू हुआ है। जेंडर समानता को बढ़ाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने नवंबर 2021 में महिलाओं को सामाजिक और संवैधानिक समानता प्रदान करते हुए हिंदू मैरिज ऐक्ट, 1955 के सेक्शन 5 (पपप), स्पेशल मैरिज ऐक्ट, 1954 और बाल विवाह निषेध ऐक्ट, 2006 में बदलाव करने का प्रस्ताव पारित किया है।
ट्रांसजेंडर
ट्रांसजेंडर व्यक्ति विभिन्न प्रकार के भेदभाव तथा अभिघातों का सामना करते हैं। औपनिवेशिक शासन के समय से ट्रांसजेडरों को महिलाओं के वस्त्र पहनने वाले व्यक्तियों, भिखारियों और अप्राकृतिक वेश्या के रूप में वगीकृत किया जाता रहा है। उन्हें जन्म से ही बहिष्कृत माना जाता है।
सामाजिक कलंक के कारण और उन्हें कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं होने के कारण हाल ही में उनके लिए संसद द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 पारित किया गया है। यह अधिनियम इस समुदाय को ‘तीसरे लिंग’ के रूप में मान्यता प्रदान करती है और विभिन्न प्रकार के भेदभाव के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध कराता है। यह अधिनियम एक स्वागतयोग्य कदम है और भेदभाव से ट्रांसजेंडर इस समुदाय की रक्षा करता है, पर ट्रांसजेंडर समुदाय को संसद में प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की जनसंख्या 6 लाख है। सर्वाधिक आबादी (लगभग 28:) उत्तर प्रदेश में चिह्नित किए गए हैं, जिसके पश्चात क्रमशः आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल का स्थान आता है। इसलिए संसद में प्रतिनिधित्व प्राप्त करना उनके लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। राष्ट्रीय विधिक सेवाएं प्राधिकरण बनाम भारत का संघ में उच्चतम न्यायालय ने इस समुदाय को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के रूप में माना है। ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए भेदभाव धर्म पर आधारित नहीं है बल्कि जन्म से उनके लैंगिक व्यवहार को ‘संदूषण’ और ‘अशुद्धता’ के रूप में देखे जाने पर अधिक आधारित है।वरिष्ठ नागरिक
विकसित देशों में जहाँ पर जीवन संभाव्यता अपेक्षाकृत अधिक है वहां लोग 65 वर्ष की आयु पार करने के बाद ही वृद्ध की श्रेणी में आते हैं परन्तु विकासशील देशों में जैसे कि भारत में जहाँ पर अपेक्षाकृत कम जीवन संभाव्यता है वहां 60 वर्ष की आयु को वृद्ध माना जाता है। इन दोनों ही मामलों में वृद्ध की परिभाषा अस्पष्ट है।
वृद्ध होना एक जटिल और क्रमिक प्रक्रिया है जिसमें जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आयाम होते हैं जो एक-दूसरे से न ही मिलते हैं। और न ही ये किसी व्यक्ति की कालक्रमिक आयु (chronological age) के अनुरूप होते हैं। कालक्रमिक आयु बढ़ती हुई आयु और विकासात्मक प्रक्रिया का एक सूचक है जो जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आयामों में पूरा होता है।
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 10.4 करोड़ वृद्ध नागरिक (60 वर्ष या उससे अधिक) हैं, जिनमें 5.3 करोड़ महिलाएं और 5.1 करोड़ पुरुष हैं। वृद्ध लोगों में 71 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में, जबकि 29 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में निवास करती हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और हेल्पएज इण्डिया द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2026 तक वृद्ध नागरिकों की संख्या बढ़कर 173 मिलियन हो जाने का अनुमान है।
भारत में व्यापक रूप से वृद्धजन निर्भरता अनुपात वर्ष 1961 के 10.9 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2011 में 14.2 प्रतिशत हो गया है। 2011 के अनुसार वृद्ध महिलाओं और पुरुषों में यह निर्भरता अनुपात क्रमशः 14.9 प्रतिशत और 13.6 था। भारत में 2011 के जनगणना के अनुसार सर्वाधिक वृद्ध जनसंख्या वाला राज्य केरल (12.6 प्रतिशत) है। इसके उपरांत गोवा (11.2 प्रतिशत) और तमिलनाडु (10.4 प्रतिशत) का स्थान है।
सभी राज्यों में वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या में, शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में कुल आबादी में वृद्धजनों की आबादी की सर्वाधिक प्रतिशतता हिमाचल प्रदेश (92.36 प्रतिशत) है। इसके बाद बिहार (89.11 प्रतिशत) और अरुणाचल प्रदेश (88.56 प्रतिशत) का स्थान आता है।
अल्पसंख्यक वर्ग
संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार, ऐसा समुदाय जिसका सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक रूप से कोई प्रभाव न हो और जिसकी आबादी अन्य बहुसंख्यकों की तुलना में कम हो, अल्पसंख्यक है।
फरवरी 2019 में उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित करने और राज्यवार उनकी पहचान करने के संदर्भ में निर्णय लेने के लिए कहा।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29, 30, 350A तथा 350B में अल्पसंख्यक शब्द का प्रयोग किया गया है, लेकिन इसे परिभाषित नहीं किया गया है। अनुच्छेद 29 के अनुसार भारत के राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 की धारा 2(7) के अनुसार यह अधिसूचित किया गया है कि मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन (2014) तथा पारसी समुदाय को अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में माना जाएगा। ये अधिसूचित छह अल्पसंख्यक समुदाय देश की लगभग 19 प्रतिशत आबादी है।
अनुसूचित जाति व जनजाति
अनुसूचित जाति (एससी) व जनजाति ऐतिहासिक रूप से सामाजिक तथा शैक्षणिक निर्योग्यता से ग्रसित रहे हैं। भारतीय समाज ऐतिहासिक रूप से एक कठोर, श्रम आधारित, वर्ण व्यवस्था में बंटा हुआ था, जिसमें सामाजिक वर्गीकरण में किसी जाति का सापेक्षिक स्थान उसके परंपरागत व्यवसाय द्वारा निर्धारित होता था।
वर्ष 1931 की जनगणना में, पहली बार जातियों को व्यवस्थित रूप से दलित वर्गों के रूप में वर्गीकृत किया गया था। इसके पश्चात, भारत सरकार अधिनियम 1935 में पहली बार सामाजिक रूप से वंचित जातियों को अनुसूचित जातियों के रूप में अधिसूचित करने की व्यवस्था की गई थी। तद्नुसार ऐसी जातियों की एक सूची भारत सरकार (अनुसूचित जाति) आदेश, 1936 में अधिसूचित की गई थी।
भारत का संविधान, जो 26 जनवरी, 1950 से प्रभावी हुआ, उसमें, अन्य बातों के साथ-साथ, अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया तथा अनुसूचित जातियों के लिए अनेक विशेष सुरक्षा प्रदान की गई जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे अन्य सामाजिक मुद्दों के साथ यथासंभव कम समय में समानता प्राप्त करने में समर्थ हो सकें।
पिछड़ा वर्ग
अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) जिनकी संख्या हमारी जनसंख्या की अनुमानतः लगभग आधी है, सदियों से सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का शिकार हुए हैं। पिछड़े वर्ग में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा, ऐसे वर्ग या नागरिक शामिल हैं जिन्हें केंद्र सरकार ऐसे नागरिक वर्गों के पक्ष में नौकरियों में आरक्षण देने के प्रयोजनार्थ समय-समय पर तैयार की गई सूचियों में विनिर्दिष्ट करती है, जिन्हें सरकार की राय में भारत सरकार और अन्य किसी स्थानीय अथवा अन्य प्राधिकरण के अंतर्गत सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है।
अनुच्छेद 340 के तहत गठित द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग के नाम से ज्ञात) ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। भारत सरकार ने इस रिपोर्ट के आलोक में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के दिनांक 13 अगस्त, 1990 के तहत सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (अन्य पिछड़े वर्गों या ओबीसी के रूप में भी संदर्भित) के व्यक्तियों के लिए केन्द्रीय सरकार के पदों पर 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने का आदेश जारी किया था। उच्चतम न्यायालय द्वारा 1992 में इनका एक प्रमुख निर्णय जोकि इंदिरा साहनी मामला निर्णय के रूप में सामान्यतः ज्ञात है, द्वारा निपटान किया गया था। न्यायालय ने इस निर्णय में भारत संघ के तहत सिविल पदों और सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का अनुमोदन किया, बशर्ते सम्पन्न वर्ग (क्रीमी लेयर) को छोड़ा जाए। सरकार द्वारा ओबीसी के विकास के लिए कई पहलें की गई हैं, जिनके सकारात्मक परिणाम मिले हैं, जिसके परिणामस्वरूप शेष जनसंख्या की तुलना में इन वर्गों का अंतर कम हुआ है।
वर्ष 2018-19 में, ओबीसी के सशक्तीकरण के लिए संविधान के अनुच्छेद 338ख नामक नए अनुच्छेद का अंतर्वेशन करके राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) को 15 अगस्त, 2018 से संवैधानिक दर्जा दिया गया था।
दिव्यांगजन
भारत दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीआरपीडी) और सतत् विकास लक्ष्य का एक समर्थक (पार्टी) है।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 2.68 करोड़ दिव्यांगजन हैं (जो कि कुल जनसंख्या का 2.21 प्रतिशत है)। कुल दिव्यांगजनों में से 1.50 करोड़ पुरुष हैं और 1.18 करोड़ महिलाएं हैं। इनमें दृष्टि, श्रवण, वाक और गतिविशयक दिव्यांगताएं, मानसिक रूग्णता, मानसिक मंदता (बौद्धिक दिव्यांगताएं), बहु-दिव्यांगताएं तथा अन्य दिव्यांगताएं शामिल हैं। दिव्यांगजनों के लिए समर्थकारी वातावरण का निर्माण करना आवश्यक है ताकि वे खेल सहित जीवन के प्रत्येक कदम पर श्रेष्ठ होने में समर्थ हों, इस उद्देश्य से कि खेल गतिविधियों में, दोनों स्तर पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, दिव्यांगजनों को भाग लेने में बढावा दिया जा सके। सरकार ने ग्वालियर, मध्य प्रदेश में एक दिव्यांगता खेल केंद्र (सैंटर फॉर डिसेबिलिटी स्पोर्ट्स) को स्थापित करने का निर्णय लिया है।
शिक्षा
शिक्षा पूर्ण मानव क्षमता को प्राप्त करने, एक न्यायसंगत और न्यायपूर्ण समाज के विकास और राष्ट्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए मूलभूत आवश्यकता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक सार्वभौमिक पहुंच प्रदान करना वैश्विक मंच पर सामाजिक न्याय और सामानता, वैज्ञानिक उन्नति, राष्ट्रीय एकीकरण और सांस्कृतिक संरक्षण के संदर्भ में भारत की सतत प्रगति और आर्थिक विकास की कुंजी है।
भारत द्वारा 2015 में अपनाए गए सतत विकास एजेंडा 2030 के लक्ष्य-4 में परिलक्षित वैश्विक शिक्षा विकास एजेंडा के अनुसार विश्व में 2030 तक सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुनिश्चित करने और जीवन-पर्यंत शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा दिए जाने का लक्ष्य है।
भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लाया गया है, जो 21वीं शताब्दी की पहली शिक्षा नीति है, जिसका लक्ष्य हमारे देश के विकास के लिए अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत की परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों के आधार को बरकरार रखते हुए, 21वीं सदी की शिक्षा के लिए आकांक्षात्मक लक्ष्यों, जिनमें एसडीजी-4 शामिल हों, के संयोजन में शिक्षा व्यवस्था, उसके नियमन और गवर्नेंस सहित, सभी पक्षों के सुधार और पुनर्गठन का प्रस्ताव रखती है। नई शिक्षा नीति प्रत्येक व्यक्ति में निहित रचनात्मक क्षमताओं के विकास पर विशेष जोर देती है। यह नीति शिक्षा के साक्षारता और संख्याज्ञान जैसी बुनियादी क्षमताओं, उच्चतर स्तर की तार्किक और समस्या-समाधान संबंधी संज्ञानात्मक क्षमताओं का विकास के साथ-साथ नैतिक, सामाजिक और भावनात्मक स्तर का विकास पर भी जोर देता है।गरीबी
गरीबी मापन सरकार और नीति-निर्माता का ध्यान निर्धनों की जीवन दशा पर केंद्रित करने का बड़ा सशक्त माध्यम है। ये मापक विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों (निर्धनता, शहरी/ग्रामीण, पर्वतीय, जनजाति प्रधान), सामाजिक वर्गों (अनुसूचित जातियों/ जनजातियों, मुस्लिमों, महिला प्रधान परिवारों और कमाऊ सदस्यों से हीन परिवार आदि) आदि के आधार पर निर्धनता की गहनता और व्यापकता का अनुमान तैयार करता हैं।
रेवेल्लीयन (1998) के अनुसार ‘‘निर्धनता का विश्वस्त अनुमान नीति निर्धारक का ध्यान निर्धनों की जीवन दशा की ओर केंद्रित कराने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है।’’
गरीबी को एक मापदण्ड के आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए। क्योंकि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था विकसित होगी, गरीबी का दायरा बढ़ेगा, देश आय गरीबी से मानव गरीबी की ओर बढ़ेगा और न्यूनतम उपभोग व्यय केवल न्यूनतम आवश्यक कैलोरी की पूर्ति तक सीमित नहीं होगा बल्कि अन्य आवश्यकताओं की आपूर्ति (जो सामान्य कार्य क्षमता में वृद्धि लाने वाली आवश्यकताओं) पर भी बल देता है।
भारत में निर्धनता अनुपात में वर्ष 1993-94 में लगभग 45 प्रतिशत से कम होकर वर्ष 2011-12 में निर्धनता रेखा के नीचे के निर्धनों का अनुपात 21.9 प्रतिशत रह गया।
रंगराजन कमेटी के अनुसार 2011-12 में ग्रामीण जनसंख्या का 30.5 प्रतिशत तथा शहरी जनसंख्या का 26-4 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे थे। 2011-12 के अनुसार 363 मिलियन व्यक्ति गरीबी रेखा से नीचे थे, जिनमें 260.5 मिलियन ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 102.5 मिलियन शहरी क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे थे।
भारत सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए कई प्रगतिशील योजनाएं शुरू किया है, जिनमें विश्व की सबसे रोजगार गारंटी योजना; महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के साथ-साथ शहरी तथा ग्रामीण आजीविका मिशन शामिल हैं।
बेरोजगारी
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के अनुसार भारत में बेरोजगारी दर वर्ष 2020 में बढ़कर 7-11: (तीन दशकों में उच्चतम) हो गई। कोविड-19 संकट से पहले ही भारत मंद आर्थिक संवृद्धि तथा बढ़ती बेरोजगारी का सामना कर रहा था। ये समस्याएं वैश्विक महामारी तथा उनसे संबद्ध लॉकडाउन के पश्चात नाटकीय रूप से बढ़ती चली गई।
त्रैमासिक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़ों के अनुसार, महामारी से प्रभावित शहरी क्षेत्र में रोजगार लगभग पूर्व-महामारी के स्तर तक पहुंच गया। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के आंकड़ों के अनुसार न केवल दूसरी कोविड-19 लहर के दौरान नौकरियों का औपचारिका जारी रहा, बल्कि नौकरियों की औपचारिकता पर दूसरी लहर का प्रभाव भी पहली कोविड-लहर की तुलना में बहुत कम रहा। भारत में कुल श्रम बल का 90 प्रतिशत से अधिक भाग अनौपचारिक क्षेत्रक में कार्यरत है। इनके पास उपयुक्त सामाजिक संरक्षण उपायों का अभाव है तथा हानि/क्षति को सहन करने की कम क्षमता होती है। कोविड-19 ने अनौपचारिक क्षेत्रक के लिए आधुनिकीकरण करने तथा अपनी संवृद्धि संबंधी संभावनाओं में सुधार को और अधिक कठिन बना दिया जिसके परिणामस्वरूप, अनौपचारिक क्षेत्रक में 80 प्रतिशत से अधिक कामगारों का रोजगार छिन गया।
स्वास्थ्य
स्वास्थ्य का तात्पर्य व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति से है, जिसमें व्यक्ति अपनी क्षमताओं का सर्वोत्तम निष्पादन कर पाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों या दुर्बलताओं की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक खुशहाली की स्थिति है।
भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र की संघीय संरचना है तथा वित्तपोषण का विभाजन केंद्र व राज्यों के मध्य किया जाता है। स्वास्थ्य पर कुल सरकारी व्यय का लगभग दो तिहाई भाग राज्य सरकारों द्वारा तथा एक-तिहाई व्यय केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है।
भारत में स्वास्थ्य राज्य का विषय है और इस पर केंद्र सरकार द्वारा दिशा-निर्देश दिए जाने के बावजूद अंतिम निर्णय लेने का अधिकार राज्य सरकारों के पास होती है। इन सब के बावजूद 1947 के बाद से भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और उस पर व्यय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। केंद्र और राज्यों द्वारा सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में स्वास्थ्य पर किए गए व्यय 2014-15 से 2020-21 की अवधि के दौरान 1.2 प्रतिशत से बढ़कर 1.5 प्रतिशत हो गई है।
भारत में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 1983 में बनाई गई थी, जिसे वर्ष 2002 में संशोधित किया गया था और अब पुनः संशोधित राष्ट्रीय नीति को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय 15 मार्च, 2017 को पारित किया। इस संशोधित नीति के अंतर्गत सरकार ने सभी का ध्यान बीमारी की देखभाल से हटाकर बीमार के कल्याण पर केन्द्रित करने की सिफारिश की। इस संशोधन के अंतर्गत सरकार ने वर्ष 2025 तक हृदय रोग, मधुमेह रोग, पुराने श्वसन संबंधी रोगों और कैंसर जैसी बीमारियों से समय पूर्व होने वाली मृत्यु दर को 25 प्रतिशत तक कम करने का लक्ष्य रखा है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में, स्वास्थ्य की आधारभूत सेवाओं को मजबूत बनाने और स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं में दक्षता राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (एनएफएचएस-5) के परिणामों से देखा जा सकता है, जिसमें एनएफएचएस-4 की तुलना में एनएफएचएस-5 में अधिकांश चयनित राज्यों में शिशु मृत्यु दर और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में गिरावट आई है। परन्तु वैश्विक पोषण रिपोर्ट 2021 के अनुसार भारत में 15-49 आयु वर्ग की आधी से अधिक भारतीय महिलाएं रक्ताल्पता से पीड़ित हैं। वर्ष 2016 में 52.6 प्रतिशत महिलाएं रक्ताल्पता से पीड़ित थी, जो वर्ष 2020 में बढ़कर 53 प्रतिशत हो गई है। इसके साथ ही भारत में लगभग 6.2 प्रतिशत वयस्क महिलाएं और 3.5 प्रतिशत वयस्क पुरुष मोटापे के साथ जीवन यापन कर रहे हैं।
भारत पिछले 7 दशकों में जन स्वास्थ्य में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिसमें जन्म के समय जीवन की प्रत्याशा में सुधार है, जो वर्ष 1947 में 32 वर्ष से बढ़कर वर्ष 2021 में 69.4 हो गया है।
पोषण व खाद्य सुरक्षा
किसी भी राष्ट्र को विकसित बनाने के लिए वहां के नागरिकों का स्वस्थ होना जरूरी है। स्वस्थ्य और सुपोषित बच्चे ही भावी स्वस्थ नागरिक बनेंगे और इन्हीं स्वस्थ नागरिकों से बेहतर और क्रियाशील मानव संसाधन का निर्माण होता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में लगभग 14.6 करोड़ से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, जिनमें से लगभग 5.7 करोड़ बच्चे केवल भारत में हैं। भारत में लगभग 19 करोड़ जनसंख्या कुपोषण से ग्रसित है, जो कुल जनसंख्या का लगभग 14 प्रतिशत है। कुपोषण के मामलों में महिलाओं की स्थिति दयनीय है।
खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा जारी विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति रिपोर्ट 2020 के अनुसार लगभग 690 मिलियन लोग (वैश्विक जनसंख्या का 8.9 प्रतिशत) भुखमरी से ग्रसित हैं, जो विगत वर्ष से लगभग 10 मिलियन अधिक हैं और पिछले पांच वर्षों में इनमें लगभग 60 मिलियन की बढ़ोतरी हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में विश्व के 2 अरब लोगों की सुरक्षित, पोषक और पर्याप्त खाद्य पदार्थों तक नियमित पहुंच सुनिश्चित नहीं हो सकी। खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा जारी विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति रिपोर्ट 2020 (SOFI 2020) के अनुसार विश्व वर्ष 2030 तक शून्य भुखमरी के सतत विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर नहीं है और यही प्रवृत्तियां जारी रहती हैं, तो वर्ष 2030 तक भुखमरी से पीड़ित लोगों की संख्या 840 मिलियन से अधिक हो जाएगी। SOFI 2020 रिपोर्ट के अनुसार कोविड-19 महामारी के दौरान उत्पन्न हुए स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के कारण सर्वाधिक सुभे/ जनसंख्या समूहों की पोषण संबंधी स्थिति और अधिक निम्नस्तरीय होने की संभावना है।
संचारी एवं गैर-संचारी रोग
गैर-संचारी रोगों को दीर्घकालिक बीमारियों के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि ये लंबे समय तक बनी रहते हैं तथा ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलते हैं, जबकि संचारी रोग वे रोग होते हैं जो संक्रमण से एक व्यक्ति से दूसरे में फैलते हैं। इनमें मलेरिया, टायफाइड, चेचक, इन्फ्रलूएंजा, डेंगू और डायरिया को शामिल किया गया है। आमतौर पर ये रोग आनुवंशिक, शारीरिक, पर्यावरण और जीवन-शैली जैसे कारकों के संयोजन का परिणाम होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हृदय संबंधी विकार, कैंसर और मधुमेह सहित गैर-संचारी रोग भारत में लगभग 61% मौतों का कारण बनते हैं। इन बीमारियों के कारण लगभग 23% लोगों पर प्री-मैच्योर (समय से पहले) मौत का खतरा बना हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी वैश्विक स्वास्थ्य अनुमान (Global Health Estimates: GHE) के अनुसार, वर्ष 2019 में गैर- संचारी रोग 74% वैश्विक मृत्युओं के लिए उत्तरदायी रहे हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research- ICMR) की रिपोर्ट ‘इंडियाः हेल्थ ऑफ द नेशंस स्टेट्स’ के अनुसार, वर्ष 2016 में होने वाली कुल मौतों में गैर-संचारी रोगों का योगदान 61.8% था, जबकि जून 2017 में ब्रिटेन की एक मेडिकल पत्रिका ‘दि लांसेट’ के अनुसार, (15 राज्यों के आंकड़ों के आधार पर) भारत के 7 प्रतिशत लोग मधुमेह-ग्रस्त थे। रिपोर्ट के अनुसार, केरल, गोवा और तमिलनाडु में महामारी के संक्रमण अर्थात् संचारी रोगों के कारण क्षेत्र में मृत्यु के मामले कम पाए गए जबकि मातृत्व, नवजात एवं पोषण संबंधी गैर-संचारी बीमारियाँ मृतकों की संख्या में वृद्धि कर रही हैं। गैर-संचारी रोग के जोखिम उम्र बढ़ने, अस्वास्थ्यकर आहार, शारीरिक गतिविधि की कमी, उच्च रक्तचाप, उच्च रक्त शर्करा, उच्च कोलेस्ट्रॉल तथा अधिक वजन आदि के कारण बढ़ रहे हैं। हालाँकि सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय राज्य सूची के अंतर्गत आता है, केंद्र सरकार राज्य सरकारों के प्रयासों में पूरक का कार्य करती है। केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (National Health Mission- NHM) के तहत कैंसर, मधुमेह और हृदय रोगों तथा स्ट्रोक की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिये राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य कैंसर सहित सामान्य गैर-संचारी रोगों से लोगों को सुरक्षा प्रदान करना है जिसमें स्वास्थ्य संवर्द्धन गतिविधियाँ आदि शामिल है।
सरकार द्वारा दिसम्बर, 2021 में जैव विविधता (संशोधन) विधेयक, 2021 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया है, ताकि अनुसंधान, पेटेंट आवेदन प्रक्रिया एवं अनुसंधान परिणामों के हस्तांतरण में तीव्र अनुपथन (ट्रैकिंग) की सुविधा प्राप्त हो सके। विधेयक औषधीय पौधों की खेती को प्रोत्साहन देकर वन्य (जंगली) औषधीय पौधों पर दबाव को कम करने के प्रयास की चर्चा की गई है। विधेयक में आयुष चिकित्सकों को जैविक संसाधनों या ज्ञान तक अभिगम हेतु भयभीत करने वाले जैव विविधता बोर्डों से उन्मुक्ति प्रदान करने का प्रस्ताव दिया गया है। विधेयक में राष्ट्रीय हितों से समझौता किए बिना जैविक संसाधनों, अनुसंधान, पेटेंट एवं वाणिज्यिक उपयोग में अधिक विदेशी निवेश की चर्चा की गई है। यह विधेयक वर्तमान परिदृश्य में भारत को वैश्विक स्तर पर फैले महामारी से बचने हेतु प्राकृतिक औषधियों के शोध में काफी मदद करेगा।
पूरा विश्व लगभग दो साल से जारी कोरोना महामारी से त्रस्त है। सतर्कता और टीकाकरण से संक्रमण की रोकथाम की कोशिशें भी अपने चरम पर हैं। ऐसे उपायों के साथ हमें दीर्घकालिक नीतियों को अपनाकर ऐसी महामारियों से मानव जाति को सुरक्षित करने के ठोस उपायों पर ध्यान देने की जरूरत है। वायरस और बैक्टीरिया से होनेवाली बीमारियों का सीधा संबंध पर्यावरण के क्षरण से है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के भारत प्रमुख अतुल बगाई के अनुसार फ्कोविड-19 महामारी प्राकृतिक क्षेत्रों के क्षरण, प्रजातियों के लुप्त होने तथा संसाधनों के दोहन का परिणाम है।’’
पर्यावरणविदों का मानना है कि यह वायरस मनुष्य और प्रकृति के बीच पैदा हुए प्राकृतिक असंतुलन का दुष्परिणाम है। वैज्ञानिकों के अनुसार, अत्यधिक मांस का उत्पादन, रोगाणुरोधी प्रतिरोध और बढ़ते वैश्विक तापमान जैसे कारक वन्यजनित विषाणुओं को मनुष्यों में फैलने और भयावह रूप धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही जलवायु संकट विषाणु जनित रोगों से लड़ने के प्रति हमारी प्रतिरोधक क्षमता भी कम कर रही है। दरअसल, विगत कुछ दशकों से हो रहे पारिस्थितिकीय परिवर्तन, बेरोकटोक आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा दोहन ने पारिस्थितिकीय तंत्र के अनुचित तथा असंतुलित प्रयोग को बढ़ाया है। पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव-विविधता के पतन के दुष्परिणामों को भुगत रही है। महात्मा गांधी के प्रकृति चिन्तन से सम्बन्धित संदेश आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उनके लेखों तथा विचारों में पर्यावरण सम्बन्धी दृष्टिबोध तथा पर्यावरण पर काम करने वालों के लिए कालजयी मार्गदर्शन मौजूद है इसलिये उपभोक्तावाद से त्रस्त अनेक लोग, गांधी दर्शन में मुक्ति तथा विकास का मार्ग खोज रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन एक प्रमुख भूमंडलीय पर्यावरणीय और विकासात्मक समस्या है। दशकों, सदियों या उससे अधिक समय में किसी स्थान विशेष या पूरी धरती की जलवायु में आने वाला दीर्घकालिक बदलाव ही जलवायु परिवर्तन है। जलवायु की दशाओं में यह बदलाव प्राकृतिक भी हो सकता है और मानव के क्रियाकलापों का परिणाम भी ग्रीनहाउस प्रभाव और वैश्विक तापन को मनुष्य की क्रियाओं का परिणाम माना जा रहा है जो औद्योगिक क्रांति के बाद मनुष्य द्वारा उद्योगों से निःसृत कार्बन डाइ ऑक्साइड आदि गैसों के वायुमण्डल में अधिक मात्रा में बढ़ जाने का परिणाम है।
प्रदूषण
पर्यावरण प्रदूषण एक ऐसी सामाजिक समस्या है जिससे मानव सहित समस्त जैव जगत के लिए जीवन की कठिनाइयाँ बढ़ती जा रही है। पर्यावरण के तत्व यथा वायु, जल, मृदा, वनस्पति आदि के नैसर्गिक गुण ह्रासमान होते जा रहे हैं जिससे प्रकृति और जीवों का आपसी सम्बन्ध बिगड़ता जा रहा है। वैसे प्रदूषण की घटना प्राचीनकाल में भी होती रही है लेकिन उस समय प्रकृति इसका निवारण करने में सक्षम थी, जिससे इसका प्रकोप उतना भयंकर नही था, जितना आज है।
सतत विकास
सतत विकास से अभिप्राय ऐसे विकास से है, जो हमारी भावी पीढ़ियों की अपनी जरूरतें पूरी करने की क्षमता को प्रभावित किए बिना वर्तमान समय की आवश्यकताएं पूरी करे। यह एक ऐसी अवधारणा है, जो आर्थिक रूप से व्यवहार्य, सामाजिक रूप से स्वीकार्य और पर्यावरण की दृष्टि से संतुलित हो। गरीबी में कमी, सामाजिक समानता और पर्यावरण सुरक्षा पारस्परिक रूप से एक-दूसरे से सम्बद्ध है। अतः सतत विकास के लिए स्थानीय संसाधनों का विकास, स्थानीय उत्पाद में वृद्धि, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, गरीबी में कमी, सामाजिक समानता और पर्यावरण सुरक्षा अपेक्षित है। सतत विकास को प्राप्त करने के लिए निर्णय निर्माण में व्यापक जन-भागीदारी और सामाजिक उत्तरदायित्व को मूलभूत आधार माना गया है।
जैव विविधता
जैव विविधता जीवन और विविधता के संयोग से निर्मित शब्द है जो आम तौर पर पृथ्वी पर मौजूद जीवन की विविधता और परिवर्तनशीलता को संदर्भित करता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी), के अनुसार जैव विविधता विशिष्टतया अनुवांशिक, प्रजाति तथा पारिस्थितिकि तंत्र के विविधता का स्तर मापता है। जैव विविधता किसी जैविक तंत्र के स्वास्थ्य का द्योतक है। पृथ्वी पर जीवन आज लाखों विशिष्ट जैविक प्रजातियों के रूप में उपस्थित है।
आपदा प्रबंधन
आपदा प्रबंधन प्राकृतिक या मानव निर्मित आपदाओं के दौरान जीवन और संपत्ति की रक्षा करने और आपदा के प्रभाव को कम करने के लिए विशेष तैयारी की प्रक्रिया है। आपदा प्रबंधन सीधे खतरे को खत्म नहीं करता है, बल्कि यह योजना बनाकर जोखिम को कम करने में मदद करता है।
अपशिष्ट प्रबंधन
बढ़ते शहरीकरण और उसके प्रभाव से निरंतर बदलती जीवनशैली ने आधुनिक समाज के सम्मुख घरेलू तथा औद्योगिक स्तर पर उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट के उचित प्रबंधन की गंभीर चुनौती प्रस्तुत की है। वर्ष-दर-वर्ष न केवल अपशिष्ट की मात्र में बढ़ोतरी हो रही है, बल्कि प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्री की बढ़ती हिस्सेदारी के साथ ठोस अपशिष्ट के स्वरूप में भी बदलाव नजर आ रहा है। हालाँकि अपशिष्ट प्रबंधन की बढ़ती समस्या ने देश को इस विषय पर नए सिरे से सोचने को मजबूर किया है और इस संदर्भ में कई तरह के सराहनीय प्रयास भी किये जा रहे हैं, परंतु इस प्रकार के प्रयास अभी तक देश भर में व्यापक स्तर पर अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या से निपटने के लिये अपनी उपयोगिता साबित करने में नाकाम रहे हैं।
पर्यावरणीय संस्थान व संगठन
विभिन्न पर्यावरणीय मुद्दों पर कार्य करने के लिये संयुक्त राष्ट्र द्वारा राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर, राष्ट्रीय सरकारों तथा सिविल सोसाइटी द्वारा कई पर्यावरण संबंधी संस्थाएँ एवं संगठन स्थापित किए गए हैं। कोई भी पर्यावरणीय संगठन एक ऐसा संगठन होता है जो पर्यावरण को किसी प्रकार के दुरुपयोग तथा अवक्रमण के खिलाफ सुरक्षित करता है साथ ही ये संगठन पर्यावरण की देखभाल तथा विश्लेषण भी करते हैं एवं इन लक्ष्यों को पाने के लिये प्रकोष्ठ भी बनाते हैं। पर्यावरणीय संगठन सरकारी संगठन हो सकते हैं, गैर सरकारी संगठन हो सकते हैं या एक चैरिटी अथवा ट्रस्ट भी हो सकते हैं। पर्यावरणीय संगठन वैश्विक, राष्ट्रीय या स्थानीय हो सकते हैं। यह पाठ अग्रणीय पर्यावरणीय संगठनों के बारे में सूचना प्रदान करता है। ये संगठन सरकारी हों या सरकार के बाहर के राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर पर्यावरण के संरक्षण तथा विकास के लिये कार्य करते हैं।
सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) अधिनियम के प्रस्तावित संशोधनों जो व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर जैसे प्लेटफार्मों पर ‘गैरकानूनी’ जानकारी उपलब्ध कराने वाले ‘प्रवर्तक’ का पता लगाने और ऐसी सूचनाएँ अधिसूचित होने के 24 घंटे बाद इस तरह की सामग्री को हटाना अनिवार्य करते हैं, का मसौदा जारी किया है।
उल्लेखनीय है कि फेक न्यूज/व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया साइटों के जरिये फैलाई गई अफवाहों के कारण 2018 में मॉब लिंचिंग की अनेक घटनाएँ हुईं।
यह मसौदा सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के बाद आया है जिसमें सरकार को गूगल, फेसबुक, यूटड्ढूब और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया मंचों के जरिये चाइल्ड पोर्नोग्राफी, बलात्कार और सामूहिक बलात्कार जैसे यौन दुर्व्यवहार संबंधी ऑनलाइन सामग्री के प्रकाशन और इनके प्रसार से निपटने के लिये दिशा-निर्देश या मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure-SOP) तैयार करने के लिये मंजूरी दी गई थी।
प्रौद्योगिकी, वर्तमान समय में वाणिज्य और व्यापार का अभिन्न अंग बन गयी है। संचार क्रान्ति के फलस्वरूप अब दूरसंचार को भी सूचना प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख घटक माना जाने लगा है और इसे सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी भी कहा जाता है।
एक उद्योग के तौर पर यह एक उभरता हुआ क्षेत्र है। भारत की वर्तमान तरक्की में आईटी का बहुत बड़ा योगदान है। विगत वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के बढ़ोतरी के प्रतिशत में 6 प्रतिशत योगदान आईटी का ही है।
पिछले 10 सालों में देश में जो रोजगार उपलब्ध हुआ है, उसका 40 प्रतिशत आईटी ने उपलब्ध कराया है।
भौगोलिक सीमाओं को तोड़ते हुए अलग-अलग देशों में उत्पाद उत्पाद इकाइयाँ बनाना, हर देश में उपलब्ध श्रेष्ठ संसाधन का उपयोग करना, विभिन्न देशों से काम करते हुए पूरे 24 घंटे अपने ग्राहक के लिए उपलब्ध रहना और ऐसे डेटा सेंटर बनाना जो कहीं से भी इस्तेमाल किए जा सकें, ये कुछ ऐसे प्रयोग थे जो हमारे लिए काफी कारगर साबित हुए। अब सारी दुनिया इन्हें अपना रही है।
अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में खगोल विज्ञान, ताराभौतिकी, ग्रहीय विज्ञान एवं भू विज्ञान, वायुमंडलीय विज्ञान एवं सैद्धांतिक भौतिक विज्ञान जैसे क्षेत्रों के अनुसंधान शामिल हैं। बलून, परिज्ञापी रॉकेट, अंतरिक्ष आधार और भू-आधारित सुविधाएं इन अनुसंधान प्रयासों में सहायक हैं। परिज्ञापी रॉकेटों की श्रृंखला वायुमंडलीय प्रयोगों हेतु उपलब्ध हैं। विभिन्न वैज्ञानिक उपकरण उपग्रहों पर विशेषकर, खगोलीय एक्सं-किरण एवं गामा किरणों को दिशा देने हेतु प्रक्षेपित किए गए हैं। अंतरिक्ष विज्ञान एक व्यापक शब्द है जो ब्रह्मांड के अध्ययन से जुड़े विभिन्न विज्ञान क्षेत्रों का वर्णन करता है तथा सामान्य तौर पर इसका अर्थ "पृथ्वी के अतिरिक्त" तथा "पृथ्वी के वातावरण से बाहर" भी है। मूलतः, इन सभी क्षेत्रों को खगोल विज्ञान का हिस्सा माना गया था।
जैव प्रौद्योगिकी
जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय के अनुच्छेद-2 के अनुसार कोई भी तकनीकी अनुप्रयोग, जिसमें जैविक प्रणालियों, सजीवों या व्युत्पन्न पदार्थ का उपयोग किसी विशिष्ट कार्य के लिये, उत्पाद या प्रक्रियाओं के निर्माण या रूपांतरण में किया जाता है, जैव प्रौद्योगिकी कहलाता है। जैव प्रौद्योगिकी या जैव तकनीकी का वो विषय है जो अभियान्त्रिकी और तकनीकी के डेटा और तरीकों को जीवों और जीवन तन्त्रों से सम्बन्धित अध्ययन और समस्या के समाधान के लिये उपयोग करता है। इसे रासायनिक अभियान्त्रिकी, रसायन शास्त्र या जीव विज्ञान में संबंधित माना जाता है। जैव प्रौद्योगिकी ने आज खाद्य व कृषि, पोषण, स्वास्थ्य, पर्यावरण और औद्योगिक विकास के क्षेत्र को प्रभावित करने में मुख्य भूमिका निभाई है। जैसे-जैसे इस क्षेत्र में प्रगति हुई है, जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
स्वास्थ्य सुरक्षा
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) ने सन् 1948 में स्वास्थ्य या आरोग्य की निम्नलिखित परिभाषा दी-
1. दैहिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना (समस्या-विहीन होना) ही स्वास्थ्य है। 2. किसी व्यक्ति की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक रूप से अच्छे होने की स्थिति को स्वास्थ्य कहते हैं। स्वास्थ्य सिर्फ बीमारियों की अनुपस्थिति का नाम नहीं है। हमें सर्वांगीण स्वास्थ्य के बारे में जानकारी होना बहुत आवश्यक है। स्वास्थ्य का अर्थ विभिन्न लोगों के लिए अलग-अलग होता है। लेकिन अगर हम एक सार्वभौमिक दृष्टिकोण की बात करें तो अपने आपको स्वस्थ कहने का यह अर्थ होता है कि हम अपने जीवन में आनेवाली सभी सामाजिक, शारीरिक और भावनात्मक चुनौतियों का प्रबंधन करने में सफलतापूर्वक सक्षम हों। वैसे तो आज के समय में अपने आपको स्वस्थ रखने के ढेर सारी आधुनिक तकनीक मौजूद हो चुकी हैं, लेकिन ये सारी उतनी अधिक कारगर नहीं हैं।
रक्षा प्रौद्योगिकी
‘‘डिफेंस सेक्टरय् यानी ‘‘रक्षा क्षेत्रय् एक ऐसा स्ट्रेटेजिक सेक्टर है, जिस पर सरकार और रक्षा मंत्री का विशेष ध्यान रहता है। दरअसल, किसी भी देश की सुरक्षा के लिहाज से यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण है। इसलिए किसी भी देश को बाहरी हमलों से बचाने और देश के नागरिकों को एक सुरक्षित महौल मुहैया कराने के लिए रक्षा क्षेत्र का मजबूत होना सबसे महत्वपूर्ण है। साल 2014 से 2021 तक भारत ने भी रक्षा क्षेत्र को मजबूती प्रदान करने के लिए विभिन्न बदलाव किए हैं। यही कारण है कि आज भारत के रक्षा क्षेत्र में जमीन पर सकारात्मक असर नजर आने लगा है। साथ ही रक्षा नीतियां में भी जो आमूलचूल परिवर्तन किए गए थे, उनका सकारात्मक परिणाम भी सामने हैं।
सूचना एवं प्रौद्योगिकी
सूचना प्रौद्योगिकी, आँकड़ों की प्राप्ति सूचना (Information) संग्रह, सुरक्षा, परिवर्तन, आदान-प्रदान, अध्ययन, डिजाइन आदि कार्यों के निष्पादन के लिये आवश्यक कम्प्यूटर हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर अनुप्रयोगों से सम्बन्धित है। सूचना प्रौद्योगिकी कम्प्यूटर पर आधारित सूचना प्रणाली का आधार है। सूचना प्रौद्योगिकी, वर्तमान समय में वाणिज्य और व्यापार का अभिन्न अंग है। संचार क्रान्ति के फलस्वरूप अब इलेक्ट्रॉनिक संचार भी सूचना प्रौद्योगिकी का एक प्रमुख घटक माना जाने लगा है, इसे सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (Information and Communication Technology, ICT) भी कहा जाता है। सूचना व संचार प्रौद्योगिकी की इस व्यापक परिभाषा के तहत रेडियो, टीवी, वीडियो, डीवीडी, टेलीफोन (लैंडलाइन और मोबाइल फोन दोनों ही), सैटेलाइट प्रणाली, कम्प्यूटर और नेटवर्क हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर आदि सभी आते हैं; इसके अलावा इन प्रौद्योगिकी से जुड़ी हुई सेवाएं और उपकरण, जैसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, ई-मेल और ब्लॉग्स आदि भी आईसीटी के दायरे में आते हैं।
भारतीय विदेश नीति
किसी भी स्वतन्त्र व प्रभुसत्तासम्पन्न देश की विदेश नीति मूल रूप में उन सिद्धान्तों, हितों तथा लक्ष्यों का समूह होती है जिनके माध्यम से वह देश दूसरे देशों के साथ सम्बन्ध स्थापित करने, उन सिद्धान्तों, हितों व लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत् रहता है। किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति उसकी आन्तरिक नीति का ही एक भाग होती है जिसे उस देश की सरकार ने बनाया है। इसलिए ऐसा कहना की ‘कोई राष्ट्र अन्य राष्ट्रों के व्यवहार में परिवर्तन करवाने के लिए और गतिविधियों को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए जो उपाय करता है’, विदेश नीति कहलाती है। भारत की विदेश नीति की मूल बातों का समावेश हमारे संविधान के अनुच्छेद 51 में किया गया है जिसके अनुसार राज्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देगा, राज्य राष्ट्रों के मध्य न्याय और सम्मानपूर्वक संबंधों को बनाये रखने का प्रयास करेगा। राज्य अंतरराष्ट्रीय कानूनों तथा संधियों का सम्मान करेगा तथा राज्य अंतरराष्ट्रीय झगड़ों को पंच फैसलों द्वारा निपटाने की रीति को बढ़ावा देगा। इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए भारत के विदेश संबंधों का कार्यान्वयन निम्नलिखित प्रमुख सिद्धातों से संचालित रहा है-
भारत और प्रमुख क्षेत्रीय संगठन
अंतरराष्ट्रीय संगठन उन संस्थाओं को कहते हैं जिसके सदस्य, कार्यक्षेत्र तथा उपस्थिति वैश्विक स्तर पर हो तथा कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए स्थापित किये जाते हैं जो उनके संघटक दस्तावेजों में वर्णित किये जाते हैं। राष्ट्रों के सामने अक्सर कुछ काम से आ जाते हैं जिन्हें साथ मिलकर ही करना होता है। कुछ मुद्दे इतने चुनौतीपूर्ण होते हैं कि उनसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा संगठन के सहयोग से सम्पन्न किया जा सकता है; जैसे- महामारी, वैश्विक तापन, ग्लोबल वार्मिंग आदि।
भारत और क्षेत्रीय संबंध
क्षेत्रीय सहयोग का इतिहास भी उतना ही पुराना है जितना अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का। क्षेत्रीय संगठनों के माधयम से क्षेत्रीय सहयोग की प्रवृत्ति लम्बे समय से चली आ रही है। और आज यह अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की एक वास्तविकता है जिस पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग आधारित है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद महाशक्तियों के परस्परिक अविश्वास और संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) में पैदा होने वाली राजनीति अड़चनों के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय सहयोग के संगठनों की उत्पत्ति और विकास को अधिाक बल मिला। इनके निर्माण का प्रमुख उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान करना तथा क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाना बनाना है। भौगोलिक दृष्टि से समीपता रखने वाले हितों में साम्य रखने वाले कुछ देशों द्वारा संगठित होने की प्रवृति को क्षेत्रीय सहयोग कहा जाता है। क्षेत्रीय सहयोग के लिए कुछ देश क्षेत्रीय आधार पर संगठित होकर अपने हितों को पूरा करते हैं। पामर व पर्किन्स ने क्षेत्रीय सहयोग या संगठन को परिभाषित करते हुए कहा है कि क्षेत्रीय सहयोग ऐसी व्यवस्था का नाम है जिसमें दो या दो से अधिक सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य समान हित के आधार पर संगठित होकर कार्य करते हैं। इसके लिए भौगोलिक निकटता का होना अनिवार्य नहीं है। आज बदलते संदर्भ में क्षेत्रीय सहयोग का अर्थ है- उन सभी राज्यों के समूहों के बीच सहयोग स्थापित करना जो अपने आपको भौगोलिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व राजनीतिक हितों के रूप में बंधा हुआ महसूस करते हैं।
भारत का द्विपक्षीय संबंध
एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र के साथ सामरिक और कूटनीतिक संबंध किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का प्रमुख अंग होता है जिसके माध्यम से एक राष्ट्र अपने हितों की पूर्ति कर वैश्विक स्तर पर पहचान की स्थापना करता है। इसी क्रम में भारत के कई महत्त्वपूर्ण देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधें का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
गोलिक दृष्टिकोण से भारत दक्षिण एशिया में स्थित एक लोकतांत्रिक देश है, जिसके उत्तर में संसार की सबसे ऊंची हिमालय पर्वत श्रेणी एवं दक्षिण में विशाल हिंद महासागर है। राजनीतिक क्षेत्र में भारत ने विश्व समुदाय के मध्य एक महत्वपूर्ण स्थान बनाने के साथ-साथ क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर चीन और अमेरिका के बाद तीव्र गति से बढ़ने वाली तीसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है, जबकि जीडीपी के संदर्भ में सातवीं सबसे बडी अर्थव्यवस्था है।
भारत का हमेशा से यह नीति रही है कि अपने पड़ोसियों के साथ उत्तम व्यवहार करे, जिसकी पुष्टि तब साफ़ और हो गई, जब नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी के तहत वर्ष 2014 में भारतीय प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के सभी नेताओं तथा 2019 में बिम्सटेक नेताओं को भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया।
भारत आजादी के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय शांति की बात करता रहा है तथा अपने पड़ोसियों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाता रहा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि करना तथा राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखना, अंतरराष्ट्रीय विधि और संधि बाघ्यताओं के प्रति आदर बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय विवादों के मध्यस्थ द्वारा निपटाने के लिए प्रोत्साहन देने का वर्णन है। यह तथ्य भारत के पड़ोसियों में भारत के प्रति आत्म विश्वास को बढ़ाने का कार्य करता है।
भारत के पड़ोसी देश हैं- श्रीलंका, चीन, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार एवं बांग्लादेश। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही भारत ने अपने सभी पड़ोसी देशों से निकटतम संबंध बनाए रखने का निरंतर प्रयास किया है।
14 फरवरी, 2005 को पहली बार भारत ने अपनी पड़ोस नीति की घोषणा करते हुए कहा कि वह पड़ोसी देशों की सरकारों के साथ कामकाजी सम्बन्ध बनाकर रखेगा, लेकिन साथ ही उन देशों में पल रही लोकतान्त्रिक आकांक्षाओं को भी प्रोत्साहित करता रहेगा, जिसके उद्देश्य एक शांतिपूर्ण, सुरक्षित एवं स्थिर पड़ोस सुनिश्चित करना है और इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ पारम्परिक रूप से लाभकारी संबंधों का विकास कर रहा है।
भारत ने हमेशा से पड़ोस की विचारधारा को ऐसी विचारधारा के रूप में परिभाषित किया है, जिसके क्षेत्र का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक समानताओं की मध्य धुरी के इर्द-गिर्द निरन्तर विकास हो।
भारत-पाकिस्तान
भारत, पाकिस्तान के साथ 3,190 किलोमीटर लम्बी सीमा साझा करता है। परंतु 1947 के पूर्व भारत और पाकिस्तान एक ही राष्ट्र थे। 1947 में द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर भारत-पाकिस्तान का स्वरुप सामने आया। एशिया महाद्वीप में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की समाप्ति के साथ भारत-पाकिस्तान के मध्य एक नये संघर्ष की शुरुआत हुई, जो वर्तमान समय में भी जारी है। पाकिस्तान के द्वि-राष्ट्र सिद्धांत से उत्पन्न जम्मू-कश्मीर पर नियंत्रण स्थापित करने को लेकर दोनों देशों के मध्य कई युद्ध और संघर्षों से लेकर भारतीय सुरक्षा बलों पर आतंकी हमले हो चुके हैं, जिसके कारण भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक तनाव की स्थिति बनी हुई रहती है। यहूदी-फिलीस्तीन समस्या की भांति कश्मीर भी उन अनसुलझी समस्या में से एक है, जिसके हल निकाले जाने के अभी तक के सारे प्रयास असफल ही रहे हैं। अगस्त, 1947 में स्वतंत्रता एवं विभाजन की दो घटनाओं ने द. एशिया में भारत एवं पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र राष्ट्रों को जन्म दिया। भारत-पाक के मध्य 1947 से ही कश्मीर को लेकर विवाद आरंभ हुआ तथा दोनों के मध्य अभी तक 1965, 1971, 1999 में युद्ध हो चुके हैं, जिनमें पाक सभी युद्धों में पराजित हुआ। 1971 के युद्ध की समाप्ति के पश्चात् हुआ ‘शिमला समझौता’ दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय संबंधों के आधार के रूप में प्रसिद्ध है। सुरक्षा बलों पर हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से मोस्ट फ़ेवर्ड नेशन का दर्जा वापस ले लिया, जिससे दोनों देशों के संबंध अस्थिर हो गए और दोनों देशों ने जवाबी कार्यवाई करते हुए दोनों देशों के मध्य चल रहे व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया।
भारत-अफ़गानिस्तान
भौगोलिक दृष्टि से अफगानिस्तान एक भू-आबद्ध (Land Looked) देश है। 17वीं सदी तक अफगानिस्तान बृहद भारत का एक भाग था। अफगानिस्तान को खुरासान, आर्याना आदि नामों से जाना जाता था। 19वीं सदी में आंग्ल-अफगान युद्धों के कारण अफगानिस्तान पर यूरोपीय प्रभाव बढ़ता गया। अफगानों के साथ हुए संघर्षों के बाद अंग्रेजों ने ब्रिटिश भारत एवं अफगानिस्तान के मध्य ‘डूरंड रेखा’ नामक सीमा का निर्धारण किया। यह रेखा वर्तमान में पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान के मध्य सीमा है। 1980 के दशक में अफगानिस्तान में रूसी सेना ने अतिक्रमण कर कम्युनिस्ट शासन की स्थापना की, किंतु अमेरिकी सहयोग से यहां के जनजातीय एवं मुजाहिदीन लोगाें ने रूसी सेना को 1989 में भगा दिया। रूसी सेना के भगाने के बाद से अफगानिस्तान में कट्टरपंथ को बढ़ावा मिला, जिसकी परिणति 1997 में तालिबानी शासन के रूप में हुई। यहीं से इस क्षेत्र का आतंकीकरण हुआ। अफगानिस्तान जो पहले मध्य-एशिया एवं पश्चिम-एशिया तथा भारत के बीच का सांस्कृतिक महत्त्व हुआ करता था, वह पिछले 200 वर्षों से महाशक्तियों की प्रतिस्पर्द्धा का केंद्र बना हुआ है।
भारत-चीन
चीन एशियाई महाशक्ति है एवं सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है साथ ही P5 +1 समूह का सदस्य है। वहीं भारत एक उपक्षेत्रीय शक्ति है एवं अर्द्ध परमाणु संपन्न राष्ट्र है। भारत-चीन ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़कर आजाद हुए एवं आरंभ में दोनों देशों के मध्य शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का संबंध विद्यमान रहा तथा दोनों देशों के मध्य संबंधों में समन्वय स्थापित करने हेतु 1954 में ‘पंचशील सिद्धांत’ का प्रतिपादन किया गया। परंतु 1962 में हुए भारत-चीन युद्ध ने दोनों देशों के मध्य संदेह का वातावरण निर्मित कर दिया। वर्ष 1988 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा अपने चीन दौरे पर इन संबंधों को मजबुती प्रदान करने की कोशिश की गयी। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध एवं 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद यह संबंध पुनः बिगड़ गए। 2003 के बाद से भारत-चीन के मध्य सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत किए जाने का प्रयास किया गया।
भारत-नेपाल
भारत एवं नेपाल के मध्य सांस्कृतिक प्रगाढ़ता, ऐतिहासिक साझी विरासत, व्यक्तिगत स्तर पर संबंधों की मजबूती विद्यमान है। 1816 में ब्रिटिश द्वारा नेपाल को जीतकर अपने नियंत्रण में ले लिया गया, किंतु भारत के स्वतंत्रता के पश्चात् चीन के प्रभाव को नेपाल में बढ़ने से रोकने हेतु भारत-नेपाल संबंधों को ब्रिटिश नीति का भी समर्थन मिला।
नेपाल में 1950 के दशक में लोकतांत्रिक आंदोलन चल रहा था, किंतु नेपाल के राजा महेंद्र इसे भारत द्वारा एवं भारत द्वारा नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप मानते थे। इसी वजह से राजा महेंद्र ने चीन के साथ सहयोग आरंभ कर दिया। भारत की अनेक कूटनीतिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप भारत एवं नेपाल के संबंधों को चीनी प्रभाव से दूर भारतीय हित में साधा जा सका। भारत द्वारा नेपाल की अर्थव्यवस्था को सहारा देने हेतु व्यापार एवं पारगमन संधि (जुलाई, 1950) की गयी। इसके तहत भारत ने नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक वस्तुओं की जिम्मेदारी ली। नेपाल भारत और तिब्बत के बीच स्थित है और अब तिब्बत पर चीन के आधिपत्य के बाद भारत व चीन के मध्य एक बफर स्टेट के रुप में कार्य करता है। इसकी स्थापना पृथ्वी नारायण शाह (1723-1774) ने 1769 में की थी। भारत के उत्तर-पूरब में स्थित नेपाल सामारिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। चीन द्वारा तिब्बत को हस्तगत कर लेने के बाद भारत-चीन सम्बन्धों में नेपाल की सामरिक स्थिति का राजनीतिक महत्व बढ़ गया।
भारत-भूटान
भूटान हिमालय में बसा एक छोटा एवं महत्वपूर्ण देश है। यह भारत एवं चीन के मध्य अवस्थित होने के कारण भारत के लिए सामरिक संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। वर्ष 1865 में ब्रिटेन एवं भूटान के मध्य सिनचुलु संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत ब्रिटिश को भूटान के कुछ भू-भाग प्राप्त हुए। वर्ष 1907 में ब्रिटिश प्रभाव में ही यहां राजशाही की स्थापना हुई। एक अन्य समझौते के तहत ब्रिटेन ने यह स्वीकार किया कि वह भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, किंतु भूटान की विदेश नीति इंग्लैण्ड द्वारा तय की जाएगी। 1947 के बाद यह भूमिका भारत को मिल गयी। भारत और भूटान के मध्य राजनयिक संबंध 1968 में भारत के रेजीडेंट प्रतिनिधि की नियुक्ति के साथ स्थापित हुए। उससे पूर्व भूटान के साथ संबंधों की देख-रेख सिक्किम में नियुक्त भारतीय अधिकारी के द्वारा की जाती थी। भारत, भूटान को एक स्वतन्त्र देश के रूप में बनाये रखना चाहता है। भारत की पहल पर ही भूटान 1971 में संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बना, 1973 में वह निर्गुट आन्दोलन में शामिल हुआ, 1977 में भारत ने भूटान के राजदूतावास का नई दिल्ली में दर्जा बढ़ाया।
भारत-बांग्लादेश
बांग्लादेश जो 1947 में भारत से विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान के रूप में था, उसे भारत ने सहायता प्रदान कर 1971 में एक स्वतंत्र राष्ट्र बांग्लादेश के रूप में स्थापित किया। भारत पहला देश था, जिसने बांग्लादेश की स्थायी सरकार बनने से पहले ही उसे 6 दिसंबर 1971 को मान्यता प्रदान की। साथ ही भारत ने न केवल बांग्लादेश स्वतंत्र सेना ‘मुक्तिवाहिनी’ को सशस्त्र सहायता दी, वरन् करोड़ों शरणार्थियों का भरण-पोषण भी किया। 10 दिसंबर, 1971 को भारत सरकार ने बांग्लादेश के कार्यवाहक राष्ट्रपति के साथ समझौता किया, जिसमें नागरिक सेवाएं बहाल करना, विदेश नीति, शरणार्थी संकट समेत कई मुद्दों पर बात हुई। बांग्लादेश की स्वतंत्रता के नायक रहे मुजीर्बुर रहमान बांग्लादेश के प्रधानमंत्री बने। भारत ने उनके साथ सहयोगात्मक संबंध अपनाया, जिसे दोनों देशों के संबंधों का स्वर्ण काल माना जाता है। बांग्लादेश की वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना के पद पर बैठने के बाद से ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक नवीन उमंग देखी जा सकती है, जो खालिदा जिया सरकार के समय अपने निम्न स्तर पर पहुंच गयी थी। बांग्लादेश, दक्षिण एशिया में भारत का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार देश है। व्यापार असंतुलन के निवारणार्थ भारत ने बांग्लादेश के कई उत्पादों को शुल्क मुक्त घोषित किया है साथ ही भारत अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ 10 एकीकृत चेक पोस्ट भी विकसित कर रहा है।
बांग्लादेश विगत 8 वर्षों में सड़क, रेलवे, पोत परिवहन और बंदरगाहों जैसे विभिन्न क्षेत्रकों में भारत के लाइन ऑफ क्रेडिट (8 बिलियन अमेरिकी डॉलर) के सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक रहा है। बांग्लादेश भारत की प्रमुख ‘नेबरहुड फर्स्ट (Neighborhood First) और ‘एक्ट ईस्ट (Act East) नीतियों के केंद्र में है। साथ ही भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने में बांग्लादेश की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।
भारत-म्यांमार
भारत म्यांमार के साथ 1,468 किलोमीटर लम्बी सीमा साझा करता है। भारतीय राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर तथा मिजोरम म्यांमार के साथ सीमा साझा करते हैं। म्यांमार जिसे पहले बर्मा के नाम से जाना जाता था, भारत के साथ औपनिवेशिक विरासत का साझीदार रहा है। अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर को अंग्रेजों ने कैद कर बर्मा की राजधानी रंगून में रखा था। ब्रिटिश द्वारा बर्मा/पेगू विजय के द्वारा इसे भारत में मिला लिया गया था, जिसे 1935 के भारत शासन अधिनियम के माध्यम से पुनः भारत से पृथक कर दिया गया था। म्यांमार में स्वतंत्रता के बाद से अधिकांश समय तक सैन्य शासन रहा। पिछले पांच दशकों से सैनिक नेतृत्व, जिसे जुंटा शासन भी कहा जाता है, ने लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाए रखा। किंतु चीन की मौजूदगी एवं म्यांमार की महत्ता के कारण भारत-म्यांमार के संबंध लगभग मधुर ही बने रहे। सांस्कृतिक रूप से भी म्यांमार एवं भारत का एक साझा इतिहास रहा है। म्यांमार में बौद्ध धर्म का प्रसार भारत की भूमि से ही हुआ है। पुराने संबंधों को बनाए रखने के लिए भारत-म्यांमार अपने सीमा के समीप निवास करने वाली जनजातियों को सीमा के आर-पार 16 किलोमीटर तक यात्रा करने के लिए एक मुक्त आवागमन व्यवस्था की अनुमति प्रदान करते हैं। मुक्त आवागमन व्यवस्था जहां जनजातियों को पुराने संबंधों को बनाए रखने में मदद की है, वहीं यह सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत चिंता का कारण भी बना हुआ है। क्योंकि विप्लवकारियों ने मुक्त आवागमन व्यवस्था का लाभ उठाकर म्यांमार में पहुंच कर हथियारों से संबंधित प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं, और विद्रोही हमलों को अंजाम देते हैं।
भारत-श्रीलंका
अशोक के काल से ही भारत एवं श्रीलंका के मध्य सांस्कृतिक संबंध बन गए थे। फिर आगे चोल काल एवं पूर्व मध्य काल में व्यापारिक संबंधों के भी साक्ष्य मिलते हैं। ब्रिटिश काल में भारत से लोगों को श्रीलंका में बगानी खेती हेतु मजदूर (गिरमिटिया) बनाकर ले जाया गया, जिनमें तमिल लोग अत्यधिक मात्र में थे।
दोनों देशों के मध्य संबंधों में समय-सयम पर उतार-चढ़ाव विद्यमान रहा। वर्ष 1948-1955 के मध्य कई मुद्दों पर दोनों देशों के मध्य मतभेद की स्थिति बनी रही, वहीं 1956-76 के मध्य सहयोगात्मक एवं परस्पर सम्मान रखने वाला दृष्टिकोण रहे। 1977 में प्रेमदासा की सरकार के समय तमिल-सिंहली विवाद ने जन्म लिया। भारतीय शांति सेना का श्रीलंका जाना और फिर उसकी वापसी, राजीव गांधी की हत्या में तमिल हाथ होने से 1993 तक भारत-श्रीलंका संबंध में अविश्वास रहा। राजपक्षे के काल में श्रीलंका चीन की तरफ झुक गया तथा श्रीलंका द्वारा चीन को कई प्रकार की सामरिक सैन्य रियायतें प्रदान की गई। इसके अतिरिक्त भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में श्रीलंका में मानवाधिकारों के हनन हेतु श्रीलंका के विरुद्ध मत देना, भारत और श्रीलंका मध्य संबंधों में अविश्वास को और बढावा दिया है, परंतु श्रीलंका के प्रति भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति के ही अनुरूप वर्ष 2020 में श्रीलंका की इंडिया फर्स्ट विदेश एवं सुरक्षा नीति अभिव्यक्त हुई थी। लेकिन हाल के दिनों में चीनी हस्तक्षेप के कारण दोनों देशों के संबंधों में गिरावट आई है।
भारत-श्रीलंका संबंधों में पिछले तीस वर्षों में कई बदलाव आए हैं। श्रीलंका की आंतरिक राजनीतिक स्थिति और उस पर भारत की प्रतिक्रिया ने ज्यादातर द्विपक्षीय संबंधों को आकार दिया है। साथ ही, दोनों देशों ने आर्थिक सहयोग के साथ-साथ क्षेत्रीय मंचों, जैसे कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) और बहु-क्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी पहल (बिम्सटेक), के माध्यम से एक-दूसरे के साथ जुड़ने के प्रयास किए हैं। श्रीलंका सामरिक रूप से भारत के दक्षिण में स्थित एक छोटा द्वीप है, जिसका क्षेत्रफल 65,610 वर्ग किलोमीटर तथा जनसंख्या (2012) 21.28 मिलियन है। सांस्कृतिक दृष्टि से श्रीलंका, भारत के साथ जुड़ा हुआ है। यहां पर रहने वाले भारतीय तमिलनाडु के मूल निवासी हैं। श्रीलंका के अधिकांश निवासी बौद्ध धर्मावलम्बी हैं। हिन्द महासागर में भारत के समीप होने के कारण सैनिक एवं सामरिक दृष्टि से श्रीलंका का भारत के लिए अत्यधिक महत्व है। श्रीलंका, भारत से दक्षिण में पाक जलडमरूमध्य से पृथक् होता है। इसके पश्चिम में पाक जलडमरूमध्य एवं मन्नार की खाड़ी है।
जून, 2021 में प्रकाशित स्वीडिश थिंक टैंक ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीटड्ढूट-सिपरी’ (SIPRI) द्वारा हथियारों के आयात और निर्यात पर रिपोर्ट जारी की गई। 2011-15 और 2016-20 के बीच भारत के हथियार आयात में 33% की कमी आई है, फिर भी भारत, सऊदी अरब के बाद दूसरा सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बना हुआ है। वर्ष 2020 में भारत सरकार ने घरेलू कंपनियों की सहायता करने और हथियारों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने हेतु 100 से अधिक विभिन्न प्रकार के सैन्य उपकरणों के आयात पर चरणबद्ध प्रतिबंध लगाने की घोषणा की। यह इस बात को दर्शाता है कि भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कितना सतर्क है।
किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार से हो सकता है। लेकिन जब राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा बाहर से होता है तो यह पूर्ण रूप से राष्ट्रीय रक्षा के क्षेत्र में आता है जबकि आंतरिक खतरा, राष्ट्रीय रक्षा एवं सुरक्षा दोनों क्षेत्रों से संबंधित होता है।
चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है कि एक राज्य को निम्नलिखित चार अलग-अलग प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ सकता है- 1. आंतरिक, 2. बाह्य, 3. बाह्य रूप से सहायता प्राप्त आंतरिक, 4. आंतरिक रूप से सहायता प्राप्त बाहरी। भारत में आंतरिक सुरक्षा के परिदृश्य में उपर्युक्त खतरों के लगभग सभी रूपों का मिश्रण है।
आंतरिक सुरक्षा का सामान्य अर्थ एक देश की अपनी सीमाओं के भीतर की सुरक्षा से है। आंतरिक सुरक्षा एक बहुत पुरानी शब्दावली है लेकिन समय के साथ ही इसके मायने बदलते रहे हैं। स्वतंत्रता से पूर्व जहाँ आंतरिक सुरक्षा के केंद्र में धरना-प्रदर्शन, रैलियाँ, सांप्रदायिक दंगे, धार्मिक उन्माद थे तो वहीं स्वतंत्रता के बाद विज्ञान एवं तकनीकी की विकसित होती प्रणालियों ने आंतरिक सुरक्षा को अधिक संवेदनशील और जटिल बना दिया है। पारंपरिक युद्ध की बजाय अब छद्म युद्ध के रूप में आंतरिक सुरक्षा हमारे लिये बड़ी चुनौती बन गई है।
आंतरिक भागों में नक्सलवाद की विचारधारा का प्रसार और ‘लाल गलियारा’ की उपस्थति चुनौती बनी हुई है। यह परिघटना विशेष रूप से पिछड़े क्षेत्रों में देखने को मिलती है, जो असमान क्षेत्रीय विकास को दर्शाता है। इन क्षेत्रों का विकास भारत के अन्य क्षेत्रों की तुलना में अलग रहा है। भारत सरकार को स्थिर विकास सुनिश्चित करने के लिए इन मुद्दों का समाधान करना आवश्यक है।
आंतरिक सुरक्षा
किसी भी देश की संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए उस देश की बाहरी सीमाओं की सुरक्षा जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतनी ही जरूरी उस देश की सीमाओं के अंदर स्थित भूमि की सुरक्षा अर्थात् देश की आंतरिक सुरक्षा होती है। भारत में जहां बा“य सुरक्षा का दायित्व रक्षा मंत्रालय पर होता है, वहीं देश की आंतरिक सुरक्षा का उत्तरदायित्व गृह मंत्रालय पर होता है। गृह मंत्रालय के अंतर्गत ही एक ‘आंतरिक सुरक्षा’ विभाग होता है, जो आंतरिक सुरक्षा की सभी जरूरतों को पूरा करता है। ऐसा माना जाता है कि बदलता बा“य परिवेश भी हमारी आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करता है। श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार में होने वाली घटनाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमारी आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करती हैं। इसलिए आज के डिजिटल युग में देश की सुरक्षा के आंतरिक अथवा बा“य खतरे दोनों एक-दूसरे से आपस में जुड़े हैं और इन्हें एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। पिछले कुछ वर्षों से हमारी आंतरिक सुरक्षा का खतरा कई गुना बढ़ गया है। आंतरिक सुरक्षा की समस्या ने हमारे देश की प्रगति एवं विकास को प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया है और यह अब सरकार की मुख्य चिंताओं में से एक है।
साइबर सुरक्षा
साइबर सुरक्षा जिसे कंप्यूटर सुरक्षा या इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी सुरक्षा भी कहा जाता है, यह डेटा, कम्प्यूटर्स, नेटवर्क और सॉफ्टवेयर को साइबर आक्रमण से दूर रखने का एक तरीका है। साइबर सुरक्षा में कंप्यूटर और नेटवर्क में उपलब्ध किसी भी प्रकार की सूचनाओं और डेटा को सुरक्षित और गोपनीय रखने का अभ्यास किया जाता है। यह सॉफ्टवेयर या इलेक्ट्रॉनिक डेटा की चोरी या क्षति के साथ-साथ उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के विघटन या गलत पहचान से कंप्यूटर सिस्टम और नेटवर्क की सुरक्षा है। साइबर सुरक्षा के प्रभाव का दायरा सैन्य क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह देश के शासन, अर्थव्यवस्था और कल्याण सभी पहलुओं को शामिल करता है।
वित्तीय सुरक्षा
आज की मानव सभ्यता की प्रगति यात्र कई युगों से अनेक परिवर्तनों के पश्चात् वर्तमान स्वरूप में मुखरित हुई है। सभ्यता के विकास क्रम में मनुष्य जाति ने अनेक उतार-चढ़ावों का सामना किया है। वस्तु विनिमय प्रणाली से गुजरते हुए वैज्ञानिक अविष्कार, मशीनों के निर्माण, तकनीकी विकास करते हुए, अनेक वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन प्रारम्भ किया है, जिन्हें सम्पूर्ण इस मानव जाति उपभोग कर रही है। वस्तुओं के निर्माण से उपभोग तक के सम्पूर्ण क्रियाजाल में ‘व्यावसायिक वित्त’ मूल आधार में स्थित है। वित्त के अभाव में न तो किसी व्यवसाय को स्थापित किया जा सकता है और न ही उसे सफलतापूर्वक संचालित ही किया जा सकता है। वित्त आधुनिक व्यवसाय का ‘जीवन रक्त’ माना जाता है। वित्त के अभाव में अच्छी-से-अच्छी योजनाएँ एवं प्रस्ताव केवल कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं, इसके अभाव में उन्हें मूर्त रूप नहीं दिया जा सकता है। इस प्रकार वित्त का व्यवसाय एवं वाणिज्य में वही स्थान है जो कि एक मानव शरीर में ‘आत्मा’ का होता है जिस प्रकार मानव शरीर में से आत्मा को निकाल दिया जाये, तो मृत मानव शरीर का कोई उपयोग नहीं रहता है, ठीक उसी प्रकार व्यवसाय रूपी शरीर से यदि वित्त को हटा दिया जाये, तो व्यवसाय की समस्त क्रियाएँ मृत शरीर की तरह ही अपने आप रुक जायेंगी।
भारतीय सीमाएं एवं सीमा प्रबंधन
सीमावर्त्ती क्षेत्र विविध प्रभावों के अधीन हैं। किसी देश की परिधि अत्यंत संवेदनशील होती है। उन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। ऐसा करने में चूक का नतीजा देश की सुरक्षा और समृद्धि के लिए गंभीर हो सकता है। एक व्यवस्थित, शांतिपूर्ण, अपेक्षाकृत खुली सीमा-व्यवस्था सुरक्षा और समृद्धि के स्रोत हैं। यही कारण है कि दुनिया के कई क्षेत्रों में व्यापार और मानव यातायात के लिए सीमाओं को अपेक्षाकृत खुली और मुक्त रखने का प्रयास किया जाता है। सीमाएं पड़ोसियों को परिभाषित करती हैं और उनके साथ संबंधों को प्रभावित करती हैं। भारत एक सभ्यतापरक राज्य है। इसके सांस्कृतिक पदचिह्न इसकी सीमाओं से बहुत आगे तक जाते हैं। दुर्भाग्य से, भारत के विभाजन के साथ, जो आकार बना, उसने भारत को भौगोलिक रूप से छोटा कर दिया। हालांकि खींची गई सीमाएं बनावटी और अराजक थीं। पाकिस्तान को दो-राष्ट्र सिद्धांत के एक खतरनाक आधार पर और इससे उत्पन्न भारी हिंसा के बाद बनाया गया था। इसलिए भारत-पाकिस्तान सीमा की विरासत आज भी जटिल एवं रक्तरंजित बनी हुई है।
मनी लॉन्ड्रिग
‘मनी लॉन्ड्रिंग’ शब्द की उत्पत्ति सबसे पहले संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई है क्योंकि अमेरिका में माफिया अन्य लोगों से जबरन वसूली करने का काम करते हैं और साथ ही में अवैध तरीके से जुआ, स्मगलिंग करके बहुत अधिक धन की कमाई कर लेते थे और इसके बाद उस धन को वैध तरीके से सरकार के सामने पेश कर देते थे। इस प्रक्रिया को करने के लिए उस स्थान पर अमेरिका के माफिया मनी लॉन्ड्रिंग शब्द का इस्तेमाल करते थे। इसलिए मनी लॉन्ड्रिंग शब्द का इस्तेमाल अवैध तरीके से कमाए गए काले धन को वैध तरीके से कमाए गए धन को दिखाने के लिए किया जाता है। मनी लॉन्ड्रिंग एक ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल अवैध रूप से प्राप्त धनराशि को छुपाने के लिए होता है। मनी लॉन्ड्रिंग का इस्तेमाल करते हुए अवैध रूप से कमाए गए धन को ऐसे कामों में लगाया जाता है, जिसके बारे में मुख्य रूप से जांच करने वाली एजेंसियां भी छानबीन नहीं कर पाती है, इसलिए धन की हेरा-फेरी करने वाले व्यक्ति को "लाउन्डरर" (The launderer) कहा जाता है।
शासन निर्णय लेने और निर्णय लागू किये जाने की प्रक्रिया है। शासन का उपयोग कई संदर्भों में किया जा सकता है जैसे कि कॉर्पोरेट शासन, अंतरराष्ट्रीय शासन, राष्ट्रीय शासन और स्थानीय शासन।
25 दिसंबर, 2021 को सुशासन दिवस के अवसर पर सरकार द्वारा ‘सुशासन सूचकांक 2021’ जारी किया गया है। इस सूचकांक को प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) द्वारा तैयार किया गया है। इस साल की शुरुआत में चैंडलर गुड गवर्नमेंट इंडेक्स (Chandler Good Government Index - CGGI) में भारत 49वें स्थान पर था। सुशासन सूचकांक में राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को चार श्रेणियों में में बांटा गया है। ये श्रेणी हैं- (i) अन्य राज्य - समूह ए; (ii) अन्य राज्य - समूह बी; (iii) पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्य; और (iv) केंद्र-शासित प्रदेश।
शासन की गुणवत्ता को सुधारने में भ्रष्टाचार एक बड़ी बाधा है। जबकि स्पष्ट रूप से मानव लालच भ्रष्टाचार का प्रणेता है। यह भारत में भ्रष्टाचार की बढ़ती प्रवृत्ति में योगदान करने के लिये जिम्मेदार है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा जारी भ्रष्टाचार बोध सूचकांक-2019 के अनुसार, भारत की रैंकिंग 78 से नीचे गिर कर 80 हो गई है। स्वामी विवेकानंद के अनुसार, "जब तक महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं होगा, विश्व कल्याण के बारे में सोचना असंभव है। जिस प्रकार एक पक्षी के लिये केवल एक पंख पर उड़ना असंभव होता है’’।
किसी राष्ट्र की स्थिति का आकलन करने का एक तरीका यह है कि वहाँ की महिलाओं की स्थिति का अध्ययन किया जाए। चूँकि महिलाएँ कुल आबादी का लगभग 50% हैं, इसलिये सरकारी संस्थानों एवं अन्य संबद्ध क्षेत्रों में पर्याप्त रूप से महिलाओं का प्रतिनिधित्त्व बढ़ाया जाना चाहिये। अर्थात् सुशासन सुनिश्चित करने के लिये महिलाओं का सशक्तीकरण आवश्यक है। महात्मा गांधी के अनुसार, जब पंचायती शासन स्थापित हो जाएगा, तब लोकमत ऐसे अनेक कार्य कर दिखाएगा जहाँ हिंसा का कोई स्थान नहीं होगा। पंचायती राज संस्थान (Panchayati Raj Institution- PRI) भारत में ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (Rural Local Sefl-government) की एक प्रणाली है। स्थानीय स्वशासन का अर्थ है स्थानीय लोगों द्वारा निर्वाचित निकायों के माध्यम से स्थानीय मामलों का प्रबंधन। किंतु वर्तमान में यह प्रक्रिया निधियों के अपर्याप्त हस्तांतरण के कारण सुशासन की राह में बाधा बन रही है।
स्थानीय स्वशासन
प्राचीन काल से ही गांव आत्मनिर्भर इकाइयां रही हैं। ग्राम स्वराज (ग्राम स्वशासन) की अवधारणा पर, गांधी जी ने कहा था, ‘ग्राम स्वराज की मेरी कल्पना यह है कि ग्राम पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी अहम् जरूरतों के लिए अपने पड़ोसियों पर निर्भर नहीं करेगा, परंतु अन्य दूसरी जरूरतों के लिए, जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा, परस्पर सहयोग से काम लेगा’। ग्राम सशक्तिकरण की गांधीवादी धारणा को साकार करने की दिशा में एक कदम 1992-93 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियमों के पारित होने के साथ उठाया गया।
संसद
भारत की संघीय व्यवस्थापिका संसद है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रपति, लोकसभा एवं राज्यसभा आते हैं। संसद भारत देश की विधि निर्माण का सर्वोच्च निकाय है। भारत ने शासन की संसदीय प्रणाली को अपनाया गया है। भारतीय संसद में राष्ट्रपति के साथ दो सदनात्मक प्रणाली मौजूद है। जिसमें राज्य सभा(राज्यों की परिषद्) एवं लोक सभा (लोगों का सदन) शामिल है। व्यावहारिक रूप में राज्य सभा को उच्च सदन एवं लोक सभा को निम्न सदन कहा जाता है। किन्तु संविधान में कहीं भी इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया।
न्यायपालिका
भारत में इंग्लैंड की संसदीय प्रणाली को आधार बनाकर संसदीय सरकार की स्थापना की गयी है, परंतु इंग्लैंड के संसदीय सर्वोच्चता के सिद्धान्त के बजाय भारत में संविधान की सर्वोच्चता को स्वीकार किया गया है। भारतीय संविधान के अधीन संघ एवं राज्य दोनों के लिए न्याय की एक ही प्रणाली है, जिसके शीर्ष पर भारत का उच्चतम न्यायालय अथवा सर्वोच्च न्यायालय है। उच्चतम न्यायालय के नीचे विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालय हैं और प्रत्येक उच्च न्यायालय के नीचे अधीनस्थ न्यायालय भारतीय लोकतंत्र ‘विधि के शासन के सिद्धांत के अनुसार संचालित होता है, जिसका तात्पर्य है कि ‘कोई भी कानून से ऊपर नहीं है’। भारत का संविधान भारतीय न्यायपालिका को भारतीय लोकतंत्र के अभिभावक और संरक्षक की भूमिका प्रदान करता है। न्यायपालिका एक प्रहरी की भूमिका का निष्पादन करती है, जो किसी भी प्रकार के स्वैच्छिक/मनमाने उल्लंघनों के विरुद्ध मूल और विधायी अधिकारों का परीक्षण एवं प्रवर्तन करती है; परंतु अनेक ऐसे कार्यक्षेत्र रहे हैं, जिनमें स्वयं न्यायपालिका की कार्यवाहियां ही इससे असंगत होने के कारण संदेहास्पद हो गई हैं और इस प्रकार न्यायपालिका की जवाबदेहिता पर सवाल उठाया है।
निर्वाचन आयोग
संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत संपूर्ण चुनाव प्रक्रिया का पर्यवेक्षण, चुनाव न्यायाधिकरणों की स्थापना एवं तत्संबंधी अन्य मामलों की देखभाल के लिए एक स्वतंत्र निकाय के रूप में निर्वाचन आयोग की स्थापना की गयी है। निर्वाचन आयोग को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचनों के लिए मतदाता सूची तैयार कराने और चुनाव के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का अधिकार प्राप्त है; परंतु वर्ष 2019 में संपन्न हुए 17वीं लोकसभा चुनाव में भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की भूमिका विभिन्न कार्यों के कारण विवाद में रहा।
ई-प्रशासन
ई-गवर्नेंस का अर्थ है, किसी देश के नागरिकों को सरकारी सूचना एवं सेवाएँ प्रदान करने के लिये संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी का समन्वित प्रयोग करना। सूचना-प्रौद्योगिकी के प्रयोग से सरकार को जनता एवं अन्य अभिकरणों को सूचनाओं के प्रसार हेतु प्रक्रिया को दक्ष, त्वरित एवं पारदर्शी बनाने तथा प्रशासनिक गतिविधियों के निष्पादन में सुविधा रहती है। प्रशासन में सूचना प्रौद्योगिकी का समन्वित प्रयोग करना ई-गवर्नेंस का पर्याय है। लोक प्रशासन में इस प्रकार का प्रयोग सर्वप्रथम सन् 1969 में अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा कुछ कम्प्यूटरों को लोकल एरिया नेटवर्क से जोड़कर किया गया था।
संस्कृति एक पारिभाषिक शब्द है। इसकी शब्दगत व्युत्पत्ति है सम्+कृ+क्तित्र संस्कृति; अर्थात् कृ धातु से क्तिन प्रत्यय और सम् उपसर्ग लगाने से ‘संस्कृति’ शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है- परिमार्जन अथवा परिष्कार। भारतवर्ष प्राचीन देश है। अपनी भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक इकाई के रूप में भारतीय संस्कृति का समस्त मानवीय उपलब्धियों के अध्ययन में प्रमुख स्थान है।
इसकी संस्कृति में राष्ट्रीय जीवन का उत्थान-पतन के साथ ही, विविधता के स्वरूप में समन्वयवादी चेतना भी व्याप्त है। प्राचीनता के आधार पर भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक है। भारतीय संस्कृति मिस्र, यूनान, रोम, सुमेर आदि से प्राचीन है।
हमारी संस्कृति में आज भी वैदिक परम्परा जो हजारों वर्ष पूर्व थी, उसके गुण विद्यमान हैं। इस सनातन अस्तित्व की दृष्टि से भारतीय संस्कृति अनोखी है।
इसी विषय पर इकबाल की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं - ‘यूनान, मिस्र और रोम, सब मिट गए जहाँ से कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’।
भारत भौगोलिक विभिन्नताओं का देश है। एक ओर उत्तर में हिमालय द्वारा बनी सीमा जो अन्य एशिया देशों से उसे अलग करती है, तो दूसरी ओर दक्षिण में समुद्र भारत के स्वरूप का निर्धारण करता है, जो देश को सांस्कृतिक प्रसार का व्यापक दृष्टिकोण तथा अवसर प्रदान करता है। भारत की धरती ऐसी है, जिसमें बाह्य जातियाँ और प्रभाव एक बार आने के बाद यहीं घुल-मिल जाते हैं।
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। प्रत्येक देश की अलग पहचान उसकी संस्कृति के कारण होती है। चूंकि प्रत्येक देश के नागरिकों का व्यवहार उनकी संस्कृति द्वारा निर्धारित मूल्यों के अनुरूप होता है, जो कि सम्पूर्ण राष्ट्र के व्यक्तित्व का प्रदर्शन करते है।
संसार में भारतीय संस्कृति का सबसे उच्च स्तर का होना स्वीकार किया गया है, जिसका मूलाधार यहाँ की संस्कृति के शाश्वत एवं चिरस्थायी मूल्य है। भारतीय संस्कृति मनुष्य और समाज के मध्य संबंध का एक सुव्यवस्थित आदर्श है, जिसमें परिवर्तनों को स्वीकार करने की अदम्य क्षमता है।
भारतीय विरासत
किसी व्यक्ति का अपनी धरोहर से संबंध उसी प्रकार का है, जैसे एक बच्चे का अपनी माँ से संबंध होता है। हमारी धरोहर हमारा गौरव है और ये हमारे इतिहास-बोध को मजबूत करते हैं। हमारी कला और संस्कृति की आधारशिला भी हमारे विरासत स्थल ही हैं। इतना ही नहीं हमारी विरासतें हमें विज्ञान और तकनीक से भी रूबरू कराती हैं, ये मनुष्यों तथा प्रकृति के मध्य जटिल संबंधों को दर्शाती है और मानव सभ्यता की विकास गाथा की कहानी बयां करती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51। (F) में स्पष्ट कहा गया है कि अपनी समग्र संस्कृति की समृद्ध धरोहर का सम्मान करना और इसे संरक्षित रखना प्रत्येक भारतीय नागरिक का कर्तव्य है। भारत की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत इसकी 5000 वर्ष पुरानी संस्कृति एवं सभ्यता से आरंभ होती है। डॉ- ए- एल- बाशम ने अपने लेख ‘भारत का सांस्कृतिक इतिहास’ में यह उल्लेख किया है कि ‘जबकि सभ्यता के चार मुख्य उद्गम केंद्र पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ने पर, चीन, भारत, फर्टाइल क्रीसेंट तथा भूमध्य सागरीय प्रदेश, विशेषकर यूनान और रोम है, भारत को इसका सर्वाधिक श्रेय जाता है क्योंकि इसने एशिया महादेश के अधिकांश प्रदेशों के सांस्कृतिक जीवन पर अपना गहरा प्रभाव डाला है।
त्योहार व उत्सव
भारतीय संस्कृति में पर्वों का विशेष स्थान है। यहाँ तक कि इसे त्योहारों की संस्कृति कहना गलत नहीं होगा। साल भर कोई न कोई पर्व या उत्सव चलता ही रहता है। हर ऋतु में, हर महीने में कम से कम एक प्रमुख त्योहार अवश्य मनाया जाता है। कुछ उत्सव किसी अंचल में मनाए जाते हैं तो कुछ को पूरे देश में अलग-अलग नामों से बनाया जाता है। हमारे पर्व-त्योहार हमारी संवेदनाओं और परंपराओं का जीवंत रूप हैं, जिन्हें मनाना या यूं कहें कि बार-बार मनाना, हर साल मनाना, हर भारतीय को अच्छा लगता है। पूरी दुनिया में भारत ही एक ऐसा देश है, जहां मौसम के बदलाव की सूचना भी त्योहारों से मिलती है। इन मान्यताओं, परंपराओं और विचारों में हमारी सभ्यता और संस्कृति में अनगिनत सरोकार छुपे हैं। जीवन के अनोखे रंग समेटे हमारे जीवन में रंग भरने वाली हमारी उत्सवधर्मिता की सोच मन में उमंग और उत्साह के नए प्रवाह को जन्म देती है।
चित्रकला
चित्रकला का प्रचार चीन, मिस्र, भारत आदि देशों में अत्यंत प्राचीन काल से है। मिस्र से ही चित्रकला यूनान में गई, जहाँ उसने बहुत उन्नति की। ईसा से 1400 वर्ष पहले मिस्र देश में चित्रों का अच्छा प्रचार था। लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में 3000 वर्ष तक के पुराने मिस्री चित्र हैं। भारतवर्ष में भी अत्यंत प्राचीन काल से यह विधा प्रचलित थी। इसके अनेक प्रमाण मिलते हैं। रामायण में चित्रों, चित्रकारों और चित्रशालाओं का वर्णन है। विश्वकर्मीय शिल्पशास्त्र में लिखा है कि स्थापक, तक्षक, शिल्पी आदि में से शिल्पी को ही चित्र बनाना चाहिए। प्राकृतिक दृश्यों को अंकित करने में प्राचीन भारतीय चित्रकार कितने निपुण होते थे, इसका कुछ आभास भवभूति के उत्तररामचरित के देखने से मिलता है, जिसमें अपने सामने लाए हुए वनवास के चित्रों को देख सीता चकित हो जाती हैं। यद्यपि आजकल कोई ग्रंथ चित्रकला पर नहीं मिलता है, तथापि प्राचीन काल में ऐसे ग्रंथ अवश्य थे। कश्मीर के राजा जयादित्य की सभा के कवि दोमोदर गुप्त आज से 1100 वर्ष पहले अपने कुट्टनीमत नामक ग्रंथ में चित्रविद्या के ‘चित्रसूत्र’ नामक एक ग्रंथ का अल्लेख किया है।
मूर्तिकला
प्राचीन विश्व में कला के क्षेत्र में भारत का प्रतिष्ठित स्थान है। जहाँ एक ओर यवन मानव शरीर की दैहिक सुंदरता, मिस्र के लोग अपने पिरामिड की भव्यता और चीनी लोग प्रकृति की सुंदरता को दर्शाने में सर्वोपरि थे, वहीं भारतीय अपने अध्यात्म को मूर्तियों में ढालने का प्रयास करने में अद्वितीय थे; वह अध्यात्म जिसमें लोगों के उच्च आदर्श और मान्यताएँ निहित थी। पाषाण काल में भी मनुष्य अपने पाषाण उपकरणों को कुशलतापूर्वक काट-छाँटकर या दबाव तकनीक द्वारा आकार देता था, परंतु भारत में मूर्तिकला अपने वास्तविक रूप में हड़प्पा सभ्यता के दौरान ही अस्तित्व में आई।
स्थापत्य कला
भारत का वास्तुकला अपने इतिहास, संस्कृति और धर्म में निहित है। भारतीय वास्तुकला ने समय के साथ प्रगति की और पूरे कई वर्षों से दुनिया के अन्य क्षेत्रों के साथ भारत के वैश्विक भाषण के परिणामस्वरूप कई प्रभावों को आत्मसात कर दिया। भारत में प्रचलित वास्तुशिल्प विधियां इसकी स्थापित इमारत परंपराओं और सांस्कृतिक बातचीत के बाहर की जांच और कार्यान्वयन का परिणाम है। भारत के स्थापत्य की जड़ें यहाँ के इतिहास, दर्शन एवं संस्कृति में निहित हैं। भारत की वास्तुकला यहाँ की परम्परागत एवं बाहरी प्रभावों का मिश्रण है। भारतीय वास्तु की विशेषता यहाँ की दीवारों के उत्कृष्ट और प्रचुर अलंकरण में है। इनमें वास्तु का जीवन से संबंध क्या, वास्तव में आध्यात्मिक जीवन ही अंकित है। न्यूनाधिक उभार में उत्कीर्ण अपने अलौकिक कृत्यों में लगे हुए देश भर के देवी-देवता तथा युगों पुराना पौराणिक गाथाएँ, मूर्तिकला को प्रतीक बनाकर दर्शकों के सम्मुख अत्यंत रोचक कथाओं और मनोहर चित्रों की एक पुस्तक सी खोल देती है।
नृत्यकला
भरतमुनि की कृति नाट्यशास्त्र में नृत्यकला का अत्यन्त प्राचीनतम उल्लेख मिलता है। वर्तमान में नृत्य की कई शैलियां भारत के विभिन्न प्रदेशों में प्रचलित हैं- कत्थक, कथकली, मणिपुरी, भरतनाट्यम, ओडिसी आदि। नृत्य के दो स्वरूप है- प्रथम महादेव के अनुचर तण्डु द्वारा प्रचारित तांडव नृत्य एवं दूसरा वाणदुहिता ऊषा द्वारा प्रचारित सुकुमार कोमल तथा श्रृंगार-रसोद्दीपक नृत्य लास्य। भारत में नृत्य की परंपरा प्राचीन समय से रही है। हड़प्पा सभ्यता की खुदाई से नृत्य करती हुई लड़की की मूर्ति पाई गई है, जिससे साबित होता है कि उस काल में भी नृत्यकला का विकास हो चुका था। भरत मुनि का नाट्य शास्त्र भारतीय नृत्यकला का सबसे प्रथम व प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। इसको पंचवेद भी कहा जाता है।