Question : चर्चा कीजिए कि सार्वजनिक वरण थियोरी, दक्ष और प्रभावी प्रशासन की दृश्य-कल्पना में, किस प्रकार ‘परिचालन’ (स्टीयरिंग) की संकल्पना को प्रोन्नत करती है और ‘खेवाई’ (रोइंग) की संकल्पना का महत्व कम कर देती है।
(2015)
Answer : सार्वजनिक वरण सिद्धान्त के द्वारा प्रशासन के नौकरशाही स्वरूप की आलोचना करते हुए सार्वजनिक वस्तुओं तथा सेवाओं की समुचित व्यवस्था हेतु संस्थागत बहुलवाद की संभावना पर विशेष चर्चा की जाती है। इस समुदाय के अनुसार जनता को विभिन्न सार्वजनिक वस्तुएं एवं प्रशासनिक सेवाएं प्रदान करने के लिए अनेक प्रकार की बहुल संगठनात्मक व्यवस्थाओं का प्रयोग किया जाना है ताकि संगठनों के बीच प्रतियोगिता की भावना को प्रोत्साहित किया जा सके, जिससे जनता को उचित कीमत ....
Question : ‘‘प्रत्यायोजित विधिनिर्मण एक आवश्यक बुराई है।’’ टिप्पणी कीजिए।
(2015)
Answer : किसी भी देश में लोक प्रशासन का मुख्य आधार तथा कार्यक्षेत्र दोनों ही कानून या विधि से संबंधित होते हैं। वैसे भी आधुनिक शासन व्यवस्थाओं के पास कानून की सर्वोच्च शक्ति है जो मानव व्यवहार, समाज, राज्य तथा अर्थव्यवस्था सहित प्रशासन को एक निश्चित दिशा में ले जाने का प्रयास करती है।
प्रत्यायोजित विधान प्रशासनिक विधि के क्षेत्र में एक लोकप्रिय तथा अनिवार्य विषयवस्तु है। चूंकि अभी भी प्रशासनिक विधि तथा प्रत्यायोजित विधान की प्रकृति, क्षेत्र, ....
Question : क्या आप इस विचार से सहमत हैं कि मध्य-1970 का चमत्कारी उपागम, नेतृत्व की चिरसम्मत (क्लासिकल) विशेषक (ट्रेट) थियोरी का एक ‘‘नया रूपांतर’’ है? कारण प्रस्तुत कीजिए।
(2015)
Answer : नेतृत्व वह क्रिया है, जिसके माध्यम से कोई व्यक्ति उद्देश्यों के लिए व्यक्तियों को स्वेच्छा से कार्य करने हेतु प्रभावित करता है। नेतृत्व व्यक्तियों के व्यवहार को उत्तमता की ओर निर्देशित करता है, जिसके द्वारा वे किसी संगठित प्रयत्न में संलग्न लोगों या उसकी क्रियाओं का मार्गदर्शन करते हैं।
प्राचीन तथा यूनानी सभ्यता से प्रभावित लक्षणवादी विचारधारा को महान आदमी सिद्धान्त भी कहा जाता है क्योंकि इस विचारधारा के अंतर्गतयह माना जाता है कि नेताओं में ....
Question : ‘‘वैश्वीकरण ने राज्य की प्रकृति और अभिलक्षण को पारंपरिक प्रशासनिक कल्याणकारी राज्य से बदल कर एक ‘कॉर्पोरेट राज्य’ बना दिया है।’’ इस संदर्भ में, लोक प्रशासन की प्रकृति में आए परिवर्तनों का विश्लेषण कीजिए।
(2015)
Answer : वैश्विकरण से आशय विश्व के सभी देशों का आपस में जुड़ाव और एक दूसरे को प्रभावित करने से होता है। 1991 के बाद भारत सरकार के L.P.G(Liberalization, Privatization Globelization) व्यवस्था अपनाने के बाद भारत का विश्व के समस्त देशों के साथ जुड़ाव हुआ, जिससे भारतीय व्यवस्था प्रभावित हुई। वैश्विकरण ने राज्य की प्रकृति और अभिलक्षण को पारम्परिक प्रशासनिक कल्याणकारी राज्य से बदलकर एक कार्पोरेट राज्य बना दिया। कार्पोरेट राज्य से आशय-21वीं सदी ....
Question : ‘‘पी.पी.प. (PPP) अत्यधिक पार्टियों और अत्यधिक हितों की सेवा करती है--- जिस कारण से फोकस ओझल हो जाता है।’’ इस कथन के संदर्भ में, लोक-निजी भागीदारी (पी.पी.पी.) में शामिल पार्टियों और उनके परस्पर विरोधी लक्ष्यों की पहचान कीजिए।
(2015)
Answer : लोक-निजी भागीदारी से आशय सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र का आपस में मिलकर किसी कार्य को करने से होता है। पी.पी.पी. अत्याधिक पार्टियों और अत्यधिक हितों की सेवा करती है क्योंकि पी.पी.पी. में एक से अधिक पार्टियां भागीदार होती हैं तथा उन सभी के अपने-अपने हित होते हैं तथा सभी पार्टियां अपने-अपने हितों के सम्पोषण हेतु प्रयासरत रहती है, जिसका परिणाम यह होता है कि जिस उद्देश्य की प्राप्ति हेतु पी.पी.पी. मॉडल को अपनाया जाता है ....
Question : “शासन थियोरी और शासकीयता (गवर्नमेन्टलिटी) के अभिप्राय (नोशन) के अभिसरण (कन्वर्जेन्स) के अनेक बिंदु हैं, परंतु वे समांतर रेखाओं में चलते हैं।” टिप्पणी कीजिए।
(2014)
Answer : गवर्नेंस का अभिप्राय है निर्णय लेने की प्रक्रिया या वह प्रक्रिया जिसके द्वारा निर्णयों को क्रियान्वित किया जाता है। यह किसी साम्राज्य पर निर्णय लेने और बातचीत करने की प्रक्रिया में सभी संबंधित पक्षों, नियमों, सामाजिक संमस्याओं को समाहित करता है।
गवर्नमेंटेलिटी शब्द का प्रारंभ दार्शनिक माइकल फाउकाल्ट के द्वारा किया गया और यह उस प्रक्रिया को इंगित करता है जिससे राज्य अपने लोगों को नियंत्रित करता है।
यह वह प्रक्रिया भी है जिसमें लोगों को स्वयं ....
Question : “नव लोक प्रबंधन और उत्तर-नव लोक प्रबंधन सुधार पहलों ने प्रबंधकीय, राजनीतिक, प्रशासनिक, विधिक, संव्यावसायिक और सामाजिक जवाबदेही के बीच के संतुलन को प्रभावित किया है।” विश्लेषण कीजिए।
(2014)
Answer : सुधार एक अनवरत प्रक्रिया है और लोक प्रशासन के सेट में तो यह आवश्यक भी है 1990 के दशक में नव लोक प्रबंधन का उदय हुआ यह सम्पूर्ण विश्व में परिवर्तन का दौर था। पुरानी मान्यताएं, प्रथाएं एवं रिवाज बदल रहे थे। अब लोग सरकार को भाई-बाप एवं अन्नदाता के स्वरूप में नही वरन एक समर्थक एवं व्यवस्था प्रबंधक के रूप में देखना चाहते थे अर्थात सरकार की भूमिका को बदलता चाहते थे। नव लोक ....
Question : “‘विकास प्रशासन’ शब्द का इस्तेमाल केवल मोटे अर्थों में उपागमों और दृष्टिकोणों की विविधता चिन्हित करने के लिए किया जा सकता है।” चर्चा कीजिए।
(2014)
Answer : दूसरे विश्व युद्ध के बाद उपनिवेशवादी शोषण के अंधकार को चीरकर नवीन राष्ट्रों का उदय हुआ और इन राष्ट्रों ने सामाजिक पुनर्गठन की जटिल प्रक्रिया आरंभ कर दी। तीसरे विश्व के देशों के इतिहास की इस संधि बेला में सामाजिक-आर्थिक रूपान्तरण की प्रक्रिया के दौरान सरकार द्वारा लिये गये प्रत्यक्ष प्रयासों के रूप में ‘विकासपरक प्रशासन’ की शुरुआत हुई।
विकासपरक प्रशासन का मुख्य विषय विकासात्मक गतिविधियां होती हैं किंतु इसे प्रशासनिक विकास की भी आवश्यकता होती ....
Question : “हम किसी चीज को निष्पादन लेखापरीक्षा कहते हैं, तो उसका अर्थ यह होता है कि हम उसमें ऐसे प्रमुख अभिलक्षणों को समाविष्ट कर लेते हैं, जो उसको जांच के अन्य रूपों से अलग पहचान प्रदान करते हैं।” निष्पादन मापन के प्रमुख मापों या संकेतों का उल्लेख करते हुए इस पर चर्चा कीजिए।
(2014)
Answer : ‘‘परफॉर्मेंस ऑडिटः कन्ट्रीब्यूटिंग टू एकाउंटीबिलिटी इन डेमोक्रेटिक गवर्नमेंट’’ पुस्तक जो कि Jeremy Lonsdale, Peter Wilkins और Tom Ling द्वारा लिखी गई है, में उपरोक्त वाक्य की चर्चा की गई है। यदि सामान्य रूप से देखा जाए तो निष्पादन लेखा परीक्षा का संबंध उपलब्धियों के मूल्यांकन से है। यह खर्चों के बदले प्रशासन के कार्य को मापता है। लेकिन वर्तमान समय में या मुख्यतः यूरोपीय देशों जैसे-यूके नीदरलैंड, फिनलैण्ड, स्पेन ....
Question : “प्रशासन का ब्रितानी दर्शन, प्रशासन विज्ञान के नैतिकता के साथ एकीकरण पर आधारित है।” विश्लेषण कीजिए।
(2014)
Answer : ‘प्रशासन का ब्रितानी दर्शन’ रासमण्ड एम-थॉमस की 90 के दशक में प्रकाशित एक पुस्तक का शीर्षक है। इसमे उन्होंने 1900-19 के मध्य के ब्रिटेन एवं अमेरिका के व्यापार एवं पब्लिक सेक्टर प्रबंध के विचार एवं व्यवहार की तुलना की है।
प्रशासन का ब्रितानी दर्शन, पारम्परिक बुद्धिमता वाले सिद्धांतों, संगठन के शास्त्रीय सिद्धांतों, मानव संबध आंदोलन एवं नौकरशाही के ढांचे को चुनौनी देता है एवं कहता है कि यह नैतिकता के साथ एकीकरण है।
लोक प्रशासन में 1837 ....
Question : ‘‘नव लोक प्रबंधन शायद न तो जोशीले लोगों के वायदों के अनुसार रक्षक रहा है, और न ही आलोचकों की चिंताओं के अनुसार दानव रहा है।’’ चर्चा कीजिए।
(2013)
Answer : नवीन लोक प्रबंध के क्षेत्र में नवीन युग का सूत्रपात करने वाले ऑसबर्न और गैबलर की कृति “रिइनवेंटिंग गवर्नमेंट” को इस क्षेत्र में युगान्तकारी माना जाता है।
इसमें नवीन लोक प्रबंध के लिए कुछ विशेष उपाय सुझाए गए जैसे- उत्प्रेरक सरकार, सामुदायिक स्वामित्व की सरकार, ग्राहकोन्मुखी सरकार, उद्यमी सरकार, पूर्वानुमान करने वाली, विकेंद्रित तथा बाजारोन्मुखी सरकार।
पश्चिमी देशों की सरकारों ने लोक प्रबंध के इस नवीन प्रतिमान को सफलतापूर्वक अपनाने हेतु व्यवहार में कुछ बदलाव लाने का ....
Question : इस विचार पर चर्चा कीजिए कि ‘‘न्यायाधिकरणों को कार्यपालिका से उसी मात्र में स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए कि जितनी उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को प्राप्त है, विशेषकर उन न्यायाधिकरणों को जो उच्च न्यायालयों के प्रकार्यों पर निगरानी रखते हैं।’’
(2013)
Answer : 1976 में 42वां संविधान संशोधन द्वारा न्यायाधिकरणों की स्थापना की व्यवस्था की गई जो केंद्रीय सरकार, राज्य सरकारों स्थानीय सरकारों या सरकारी निगमों के अधीन लोक सेवाओं में कार्य करने वाले अधिकारियों की भर्ती और सेवा की अन्य शर्तों से संबंधित विवादों का न्यायिक निर्णय कर सके। सर्वोच्च न्यायालय को छोड़कर शेष सभी न्यायालयों को उन सभी विषयों पर जो संविधान की धारा 323, तथा 323 बी में लिखे गये हैं, के अधिकार क्षेत्र का ....
Question : नव-उदारवादी काल में, लोक प्रशासन आंतरिक जवाबदेही के उपकरणों से कम और बाह्य जवाबदेही के उपकरणों से ज़्यादा नियंत्रित होता है। सविस्तार स्पष्ट कीजिए।
(2013)
Answer : लोक प्रशासन पर नियंत्रण दो प्रकार से होता है- आंतरिक नियंत्रण एवं बाह्य नियंत्रण। आंतरिक नियंत्रण प्रशासन तंत्र के भीतर से काम करता है, और यह इस तंत्र का ही भाग होता है। प्रशासन पर आंतरिक नियंत्रण बजट व्यवस्था, कार्मिक प्रबंधन, कार्यकुशलता नियंत्रण, व्यवसायिक मानक, प्रशासनिक नेतृत्व, श्रेणीबद्ध क्रम, पूछ-ताछ और खोज-बीन तथा वार्षिक गोपनीय रिकॉर्ड के माध्यम से होता है। यह अपने साथ स्वयंर्स्फूत ढंग से और तंत्र के चलने के साथ लगातार कार्यरत ....
Question : ‘‘वैश्वीकृत लोक प्रशासन में, पद-सोपान जितनी नैतिक समस्याओं का समाधान निकालता है, उससे ज़्यादा समस्याओं को वह पैदा कर देता है---।’’ टिप्पणी कीजिए।
(2013)
Answer : लोक प्रशासन के सर्वव्यापी नियमों के विकास के क्रम में पदसोपान के नियम का प्रतिपादन किया गया तथा अपेक्षा की गयी कि इस नियम के क्रियान्वयन के माध्यम से संगठनात्मक कार्यकुशलता को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन आगे चलकर परिवर्तित परिस्थितियों के संदर्भ में सर्वव्यापी नियमों को चुनौती मिली और पदसोपान के प्रासंगिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाये गये।
लोक कल्याणकारी राज्य के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रशासन में संवेदनशीलता तथा मूल्य उन्मुखता, नियम कानूनों ....
Question : पारंपरिक लोक प्रशासन ने ‘‘एक मूलतः असमाधेय समस्या - प्रभावी होने के लिए पर्याप्त मज़बूत प्रशासन बनाने लेकिन इतना भी मज़बूत नहीं कि जवाबदेही के लिए खतरा हो जाए - किस प्रकार से हल कर ली थी’’?
(2013)
Answer : राजनीति-प्रशासन द्विभाजन के प्रारंभ से ही लोक प्रशासन के अलग होने के साथ ही इसके अस्तित्व और प्रभावशीलता में सुधार आया। राजनीति-प्रशासन पृथक्करण के साथ ही शास्त्रीय सिद्धांत और वैज्ञानिक प्रबंधन सिद्धांत का विकास हुआ। जिसमें नये-नये सिद्धांत गढे़ गये और जिनका लक्ष्य सांगठनिक समस्या को खत्म करना और उत्पादकता बढ़ाने के लिए संगठन में दक्षता, मितव्ययिता एवं प्रभावशीलता लाना था।
जैसे-जैसे लोक प्रशासन का विकास हुआ, इसने प्रशासन में विद्यमान समस्याओं को रेखांकित किया और ....
Question : संरचनात्मक सिद्धान्त, कमोबेश रूप से, दक्षता, प्रभाविता और उत्पादिता के क्लासिकी सिद्धांतों में स्थापित है। स्पष्ट कीजिए।
(2013)
Answer : शास्त्रीय सिद्धांत संगठन को इसके उद्देश्यों तथा औपचारिक ढांचों के रूप में देखता है। यह अधिकतर कार्य नियोजन, संगठन की तकनीकी आवश्यकताएं, प्रबंधन के सिद्धांत और विवेकशील तथा तार्किक व्यवहार की अपेक्षा पर अधिक बल देता है। शास्त्रीय सिद्धांत संगठन में दक्षता लाने से संबंधित था ताकि उत्पादकता बढ़ाई जा सके तथा मानव संसाधन के अपव्यय को रोका जा सके।
शास्त्रीय चिंतकों ने संगठनों की अदक्षता एवं अपव्यय को कम करने एवं निष्पादन उन्मुख कार्य संस्कृति ....
Question : लोक प्रशासन के 1900-1926 के राजनीति/प्रशासन द्विभाजन से, यू.एस.ए. में 1970 में लोक मामलों एवं प्रशासन के संप्रदायों की राष्ट्रीय संस्था (एन.ए.एस.पी.ए.ए.) के गठन के पश्चात् लोक प्रशासन के रूप में उदय की विभिन्न रूपावलियों के रूप में, आप लोक प्रशासन के विकास का किस प्रकार संरक्षण करेंगे?
(2012)
Answer : 1970 में अमेरिका में नेशनल एसोसिएशन ऑफ स्कूल ऑफ पब्लिक अफेयर एंड एडमिनिस्शट्रेन (NASPAA) की स्थापना हुयी। यह संस्था अमेरिका में अत्यधिक महत्वपूर्ण संस्था के रूप में उभरी और इस संस्था को कांग्रेस द्वारा चार्टर प्रदान किया गया। इन संस्थाओं में अमेरिका के उन सभी विश्वविद्यालयों व संस्थाओं को सदस्यता दी गयी है, जो लोक प्रशासन में शोध कर रहे हैं।
इस चरण में कई अन्य विकासों ने लोक प्रशासन को महत्वपूर्ण बना ....
Question : प्रशासनिक तंत्र में विश्वसनीयता की संकटावस्था पर केवल सरकार के पुनराधिकार के द्वारा ही काबू पाया जा सकता है। टिप्पणी कीजिए।
(2011)
Answer : प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त अकर्मण्यता एवं भ्रष्टाचार ने जनता में प्रशासन के प्रति विश्वसनीयता की कमी को उजागर किया है। सरकारी तंत्र में होने वाले सुधार की गति काफी धीमी है तथा जनता की अपेक्षाएं बहुत अधिक हैं। अतः अब यह समय की मांग है कि प्रशासनिक तंत्र में बड़े सुधार किए जाएं। इसी संदर्भ में हाल ही में इस प्रकार के सवाल भी उठे कि भारतीय व्यवस्था को ही बदल देना चाहिए, अर्थात् संसदीय ....
Question : लोक प्रशासन की विधा विशेष के विकास में मिन्नोब्रुक सम्मेलन I, II एवं III, इस विधा विशेष के पुर्नसंप्रत्ययीकरण और उसके परिवर्तनशील मूल्यों को प्रतिबिंबित करते हैं। स्पष्ट कीजिए।
(2011)
Answer : लोक प्रशासन का उदय सभ्यता के उदय के साथ ही हुआ, परंतु अध्ययन के विषय के रूप में उसका विकास 1887 के उपरांत आरंभ हुआ। तब से लेकर तृतीय मिन्नोब्रुक सम्मेलन 2008 तक इसमें कई परिवर्तन हो चुके हैं। मिन्नोब्रुक सम्मेलन का आयोजन 1968 के बाद से प्रत्येक 20 वर्ष के बाद किया जाता रहा है। इसका उद्देश्य लोक प्रशासन विषय के विद्वानों के विचार जानना तथा लोक प्रशासन को प्रासंगिक बनाए रखना रहा है।
प्रथम ....
Question : ‘‘नव लोक प्रबंधन निर्जिव हो गया है; शासन का अंकीय युग दीर्घायु हो।’’ टिप्पणी कीजिए।
(2010)
Answer : सत्तर के दशक के अंत में लोक प्रशासन के क्षेत्र में अनेक परिवर्तन हुए तथा अनेक अवधारणाओं का जन्म हुआ। वेबर के मॉडल पर आधारित नौकरशाही की कड़ी आलोचना हुई एवं लोक विकल्प उपागम के समर्थकों ने विकल्प के रूप में बाजार का समर्थन किया। नब्बे के दशक में वेबेरियन नौकरशाही को और अधिक चुनौतियां मिलने लगीं तथा सार्वजनिक क्षेत्र में प्रबंधन की गतिविधियों को शामिल करने की पुरजोर वकालत की गई।
इसी नई अवधारणा को ....
Question : पिछले दो दशकों में संसार के लगभग सभी देशों ने अपनी प्रशासनिक प्रणालियों में रचनान्तरणों का अनुभव किया है। नव लोक प्रबंधन आंदोलन के संदर्भ में, विकसित और विकासशील देशों से उदाहरण देते हुए, इस प्रघटना को स्पष्ट कीजिए।
(2008)
Answer : बीसवीं सदी के आठवें दशक में विश्व स्तर पर राज्य और नौकरशाही की भूमिका में अनेक परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे और तथा इसका आरम्भ ग्रेट ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में रोनाल्ड रीगन की आर्थिक नीतियों से हुआ। इन आर्थिक नीतियों के अनुसार राज्य की भूमिका को सीमित किया जाना चाहिए तथा ऐसी परिस्थितियों का निर्माण किया जाना चाहिए, जिनमें अर्थव्यवस्था में स्वतंत्र बाजार शक्तियों को पनपने का अवसर मिल सके। अर्थव्यवस्था ....
Question : मनोबल का क्या अर्थ होता है? ऐसा विश्वास किया जाता है कि ‘मनोबल और उत्पादकता हाथ पकड़ साथ-साथ चलते हैं और जितना उच्च मनोबल होगा, उतनी उच्च उत्पादकता होगी।’ क्या आप इस बात से सहमत हैं?
(2007)
Answer : मनोबल अर्थात् मन का बल, अर्थात् मनुष्य के अन्तस में अवस्थित मानसिक शक्ति तथा उसकी आत्मा के विश्वास का द्योतक मनोबल ही है। मन को बल प्रदान कराने वाली क्रियाविधि ही मनोबल कहलाती है। यह किसी विशिष्ट समय में व्यक्ति या समूह द्वारा प्रदर्शित, आत्मविश्वास, उत्साह तथा दृढ़ता आदि की मात्रा से भी संदर्भित हो सकती है। मनोबल को संतुष्टि की वृत्ति, निरन्तरता की इच्छा का भी पर्याय कहा जा सकता है। यह किसी विशेषीकृत ....
Question : "लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन एक ही जींस की दो स्पीशीज हैं, परंतु उनके अपने-अपने विशेष मूल्य एवं तकनीकें भी हैं।" टिप्पणी कीजिए।
(2007)
Answer : सामान्यतः लोक प्रशासन में लोक सार्वजनिक अर्थात् जनता से जुड़ा होने के कारण ‘सरकारी’ का भावार्थ नहीं देता है। किंतु जब लोक प्रशासन की निजी प्रशासन से तुलना करते हैं तो स्वतः ही ऐसा मालूम पड़ता है कि लोक प्रशासन में लोक का अर्थ सरकारी से है, वास्तव में यह सत्य है। यह सही है कि लोक प्रशासन तथा निजी प्रशासन दोनों में प्रशासन शब्द समान रूप से प्रयुक्त होता है। दोनों ही किन्हीं उद्देश्यों ....
Question : यदि "लोक प्रशासन को हमारे जटिल समाज के शासन में एक प्रमुख विधि सम्मतकारी भूमिका निभानी है, तो उसके ज्यादा पूरी तरह से संकल्पनाकृत होने की आवश्यकता है।" चर्चा कीजिये।
(2006)
Answer : वर्तमान आधुनिक समाज में वैश्वीकरण, निजीकरण जैसी विकसित अवधारणायें एवं सकल घरेलू उत्पाद और अर्थव्यवस्था से अत्यधिक प्रभावित राजव्यवस्था और राज्य के द्वारा निर्मित नीतियां और लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण का आदर्श हैं। इस परिप्रेक्ष्य में लोक प्रशासन को अधिक विधिसम्मतकारी भूमिका के निर्वाह के लिये आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य शर्त बन जाता है कि वह ज्यादा से ज्यादा संकल्पनाओं को धारण करे, जो उसके लोकतांत्रिक स्वरूप को शब्द और आत्मा दोनों रूपों में परिपूर्णता दे ....