Question : सामन्तवादी समाज में और पूंजीवादी समाज में, कार्य के सामाजिक संगठन के बीच विभेदन कीजिए।
(2015)
Answer : प्रत्येक समाज की परिस्थितियां चूंकि एक-सी नहीं रहती इसलिए कार्य के स्वरूप में परिवर्तन होता रहता है। सामंतवादी व्यवस्था में काश्तकार जो भूमि जोतता था, उस पर फसल लेता था, उसका मालिक नहीं होता था जबकि पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व होना था। सामंती समाज में सामंत, काश्तकारों से किराया वसूल किया करते थे और काश्तकारों हेतु किराया देना परंपरा व कानूनी बाध्यता दोनों थी। परंतु पूंजीवाद समाज लाभ ....
Question : तृतीयक क्षेत्रक के बढ़ते हुये महत्व ने हाल में कार्य के औपचारिक संगठन को कमजोर बना दिया है। इस कथन का परीक्षण कीजिए।
(2015)
Answer : विकसित या विकासशील देशों में आज तृतीयक क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ता चला जा रहा है। तृतीयक क्षेत्र अर्थात् सेवा क्षेत्र विकास के लिए जरूरी एक अहम घटक बन चुका है। यह न केवल आवश्यकताओं की पूर्ति का एक सहज घटक बन चुका है बल्कि इससे समाज की गतिशीलता भी प्रभावित हुई है।
सेवा क्षेत्र औपचारिक संगठनों के लिए एक बेहतर विकल्प बन कर उभरा है और इससे औपचारिक संगठनों में कमजोरी आई है- जो कि ....
Question : श्रम और समाज पर वैश्वीकरण के सामाजिक प्रभाव की परीक्षा कीजिए।
(2013)
Answer : नब्बे का दशक आरम्भ होने पर औद्योगिक नीति बदल गयी। इस नीति में:
Question : कार्य के औपचारिक एवं अनौपचारिक संगठन श्रमिकों की गतिशीलता को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
(2012)
Answer : हाल के कुछ वर्षों में श्रमिकों की गतिशीलता में व्यापक वृद्धि हुई है। बाजार अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से परिवर्तित हो रही वर्त्तमान परिस्थिति में श्रमिकों का औपचारिक तथा अनौपचारिक संगठनों की ओर गतिशीलता बढ़ गयी है। औपचारिक संगठनों का निर्माण निर्धारित कार्य प्रणालियों, नियमों के अनुरूप चलते हुए किसी उद्देश्य के लिए किया जाता है। यह संगठन संस्थागत उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक सिद्ध होता है तथा श्रमिकों के हितों की उपेक्षा होने ....
Question : औद्योगिक प्रजातंत्र
(2012)
Answer : औद्योगिक प्रजातंत्र एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत श्रमिकों को जवाबदेही के निर्वहन, निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल तथा कार्य क्षेत्र में उनकी अधिकार एवं सत्ता को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है। औद्योगिक प्रजातंत्र एक संगठनात्मक प्रारूप की तरह है, जो उत्पादन प्रणाली में श्रमिकों की व्यापक भागीदारी को हर तरह से सुनिश्चित करने का प्रयास करता है। इस प्रकार के औद्योगिक प्रजातंत्र वाले प्रारूप में श्रमिक व्यवस्था के निर्माण, संचालन तथा ....
Question : औपचारिक संगठन क्या है? ‘अधिकारी-तंत्र की वृद्धि के परिणामस्वरूप सामाजिक संगठन के वृहद् स्तरों पर शक्ति का अत्यधिक केन्द्रीकरण हुआ है।’ व्याख्या कीजिए।
(2011)
Answer : जब कुछ लोग किसी बड़े उद्देश्य को ध्यान में रखकर किसी संगठन का निर्माण करते हैं व जिनमें सदस्यों की स्थिति उनके कार्य क्षेत्र, उनके अधिकार एवं दायित्व तथा अन्य सदस्यों के साथ संबंधों का निर्धारण कर दिया जाता है और इन निर्धारित नियमों तथा कार्य प्रणालियों का कठोरता से पालन किया जाता है, तो इस प्रकार के संगठन को औपचारिक संगठन कहते हैं।
औपचारिक संगठन संस्थागत उद्देश्यों को प्राप्त करने में सर्वाधिक सहायक सिद्ध होता ....
Question : स्वयं-सहायता समूह (एस.एच.डी.) का कार्य एक अनौपचारिक संगठन के रूप में
(2011)
Answer : ग्रामीण क्षेत्रें में तेजी से उभरते स्वयं सहायता समूहों के जरिए ग्रामीण महिलाओं में बचत को बढ़ावा मिला है। ग्रामीण क्षेत्रें में स्वयं सहायता समूहों को सुदृढ़ कर उनके माध्यम से निधनों की निर्धनता निवारण के लिए अब एक राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की शुरुआत की गई है।
इस मिशन के तहत ग्राम स्तर पर स्वयं सहायता समूहों को फेडरेशन या संगठन के रूप में गठित कर उनके माध्यम से लाभप्रद स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराकर ....
Question : ‘‘नव प्रौद्योगिकी क्रांति के आगमन के साथ श्रमिक वर्ग में काफी घटती हुई है और गैर-शारीरिक श्रम में श्रमिक बल में बढ़ती हुई है।’’ समालोचनापूर्वक परीक्षण कीजिए।
(2010)
Answer : कार्ल मार्क्स ने औद्योगिक श्रमिक वर्ग में बढ़ते समरूपता की भविष्यवाणी की है। मार्क्स का मानना है कि औद्योगिक इकाईयों में तकनीकी विकास के कारण मानवीय कुशलता पर आधारित श्रम की आवश्यकता खत्म की जाएगी।
परिणामस्वरूप दस्तकारी वर्ग एवं छोटे व्यापारी वर्ग क्रमशः विलुप्त हो जायेंगे और मशीनीकरण के प्रभाव के कारण अधिकतर श्रमिक वर्ग अकुशलता को भी खत्म कर देगा, जिसका परिणाम सभी जगह मजदूरी के घटते रूप में दिखाई देगा। मार्क्स के अनुसार पूंजीवादी ....
Question : उद्योग में कार्य प्रथम के सामाजिक संगठन के रूप में एल्टन मेयो द्वारा मानवीय संबंध-विचार-संप्रदाय
(2010)
Answer : मानवीय संबंध विचार का संबंध ऐसे प्रक्रम से है जो किसी संगठन से जुड़े व्यक्तियों को एक खास वातावरण में संतुलित रूप से उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है, जिससे अत्यधिक संतोष की प्राप्ति हो सके साथ ही व्यापारिक संस्था का उद्देश्य भी पूरा हो। यह एक ऐसा माध्यम है, जिसमें काम करने वाले लोगों का एवं व्यापारिक संस्था दोनों का आपसी सहयोग होता है।
यह प्रक्रम इस उद्देश्य पर कार्य करता है कि ....
Question : अनौपचारिक क्षेत्रक में श्रम का स्तरीकरण
(2010)
Answer : एक आकलन के अनुसार भारत का असंगठित क्षेत्र, लगभग 90 प्रतिशत श्रमिक बल को एवं 97 प्रतिशत महिला श्रमिक को रोजगार प्रदान करता है। यह असंगठित क्षेत्र केवल मामूली रूप से जीविकोपार्जन का अवसर प्रदान करता है। इस क्षेत्र पर सरकार का नियंत्रण भी नहीं होता है एवं इसे अभी तक भारत में उद्योग का दर्जा प्राप्त नहीं है। यह क्षेत्र कम मजदूरी, अनियंत्रित कार्य वातावरण एवं सामाजिक सुरक्षा के अभाव आदि के द्वारा जाना ....
Question : औद्योगीकरण और परिवार के प्रकार्यों में परिवर्तन।
(2009)
Answer : सामान्यतः यह माना जाता है कि पूर्व औद्योगिक समाजों में नातेदारी संबंधों से आबद्ध विस्तृत या संयुक्त परिवारों की बहुलता थी, जो उत्पादन की एक इकाई के रूप में कार्य करता था।
यह समाज एक कृषि प्रधान समाज था, जहां व्यापक स्तर पर श्रम की आवश्यकता होती थी, जिसकी पूर्ति नातेदारी संबंधों से आबद्ध विस्तृत परिवारों द्वारा किया जाता था। चूंकि इस समाज में जटिल श्रम विभाजन एवं विशेषीकरण का अभाव था तथा व्यक्ति की अर्जित ....
Question : आलोचकों के इस आरोप कि इमानुऐल वालर्स्टाइन की आश्रयता थियोरी अतिसरलतावादी और गलत है, पर टिप्पणी कीजिए।
(2009)
Answer : अविकसित एवं विकासशील देशों का तकनीकी एवं आर्थिक सहायता के क्षेत्रें में विकसित देशों की निर्भरता को सामाजिक विकास के सदंर्भ में निर्भरता (आश्रयता) की अवधारणा द्वारा स्पष्ट किया जाता है। विकासशील देशों की विकसित देशों पर इस निर्भरता और इस संदर्भ में विकसित देशों की वर्तमान नीतियों के कारण विकासशील देशों में ऐसी धारणा उत्पन्न हुयी है कि विकसित देश आर्थिक सहायता और विशेषज्ञों की सलाह के बहाने उनका शोषण कर रही है।
निर्भरता सिद्धांत ....
Question : सामाजिक परिवर्तन के अध्ययन में प्रतिरूप चरों की प्रासंगिकता।
(2008)
Answer : पारासन्स ने अपने सामाजिक व्यवस्था के दो मुख्य प्रकारों का उल्लेख किया है- (i) परम्परागत सामाजिक व्यवस्था (ii) आधुनिक सामाजिक व्यवस्था। इन दोनों ही प्रकार की व्यवस्थाओं में स्थायित्व एवं संतुलन बनाये रखने की दृष्टि से कुछ निश्चित प्रतिमान विकसित हो जाते हैं। समाज में लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इन प्रतिमानों के अनुरूप ही व्यवहार करें।
जब तक लोग ऐसा करते रहते हैं, तब तक समाज में स्थायित्व एवं संतुलन बना ....
Question : आर्थिक विकास के सामाजिक नियामक दर्शाइये। विकासशील समाजों के पिछड़ेपन एवं गरीबी का विश्लेषण करते हुए किसी एक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य की चर्चा भी कीजिए।
(2007)
Answer : आर्थिक विकास के बिना सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन सम्भव नहीं है, जब कि दूसरा दृष्टिकोण यह है कि समाज के भीतर संस्थाओं में होने वाले परिवर्तन आर्थिक विकास को सम्भव बनाते हैं। फ्रैन्किल के अनुसार, आर्थिक विकास एवं सामाजिक परिवर्तन एक दूसरे पर निर्भर हैं, अर्थात् प्रत्येक एक का कारण है तो दूसरा उसका परिणाम। उदाहरण के लिए जब कृषि से उद्योग में परिवर्तन होता है (सीमेन्ट उद्योग, चीनी उद्योग, कागज उद्योग या स्टील उद्योग) ....
Question : पूर्व औद्योगिक व्यवस्था के लक्षण।
(2007)
Answer : पूर्व औद्योगिक आर्थिक प्रणाली मुख्यतः कृषक समाज की विशेषताओं को अभिव्यक्त करती है। राबर्ट रेडफील्ड ने कृषक समाज की अवधारणा के माध्यम से ग्रामीण समाज अथवा औद्योगिक पूर्व समाज की आंतरिक एवं बाह्य संरचना को समझाने का प्रयत्न किया है। रॉबर्ट रेडफील्ड ने कृषक समाज की पांच विशेषताओं का उल्लेख किया हैः
Question : जीवन का बदलता ढांचा।
(2007)
Answer : जीवन का बदलता ढांचा एक प्रक्रिया है, जिसमें एक निश्चित समयावधि में घटनाओं की एक श्रृंखला होती है। इसमें निरंतरता की भावना विद्यमान होती है। घटनाओं के विशिष्ट क्रम के कारण सामाजिक संस्थाओं की भूमिका में परिवर्तन होता है, जो परिवर्तित परिस्थितियों में अधिक प्रभावशाली होता है। जीवन के बदलते ढांचे के संदर्भ में औद्योगीकरण, पश्चिमीकरण और आधुनिकीकरण मुख्य तत्व हैं। औद्योगीकरण से लोगों की जीवन शैली में परिवर्तन हुआ है। महिलाओं की आर्थिक भूमिका ....
Question : आर्थिक विकास के सामाजिक निर्धारक।
(2005)
Answer : आर्थिक विकास में सामाजिक कारकों का अभूतपूर्व योगदान होता है। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक साधन, मानवीय साधन, पूंजी, तकनीक ज्ञान, संगठन, राज्य की नीति, विकास की इच्छा, सामाजिक संस्थाएं, परम्पराएं एवं व्यवहार, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां आदि सभी आर्थिक व्यवहार को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले सामाजिक निर्धारक निम्नांकित हैं-
Question : नव पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अधिकारी तंत्र।
(2004)
Answer : नव पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में अधिकारी तंत्र का महत्व निश्चित रूप से है। यह अर्थव्यवस्था मूल रूप से विभिन्न नियमों एवं कानूनों के तहत संचालित होती है। आज के अधिकांश देश, चाहे वह विकसित देश हो, अविकसित हो व विकासशील, अधिकारी तंत्र की महत्ता को स्वीकार करते है। दूसरे शब्दों में, ‘वेबर ने अधिकारी तंत्र की उपयोगिता एवं महत्ता को आधुनिक समाज की प्रमुख विशेषता के रूप में वर्णन किया है। वेबर ने अधिकारी तंत्र को ....
Question : आर्थिक विकास के सामाजिक निर्धारक।
(2003)
Answer : किसी भी देश में आर्थिक विकास को निर्धारित करने में अनेक कारकों की भूमिका निहित होती है जिसमें प्राकृतिक साधन, मानवीय साधन, पूंजी, तकनीकी ज्ञान, संगठन, राज्य की नीति, विकास की इच्छा, सामाजिक संस्थाएं परम्पराएं एवं व्यवहार, अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां इत्यादि। आर्थिक विकास के सामाजिक निर्धारक निम्नलिखित है:
Question : औद्योगीकरण और सामाजिक परिवर्तन
(2002)
Answer : आधुनिक समाज में औद्योगीकरण के फलस्वरूप सामाजिक प्रक्रिया में काफी परिवर्तन हुआ है। वर्तमान समय में औद्योगीकरण और सामाजिक परिवर्तन एक दूसरे से काफी अंतःसंबंधित हैं। मार्क्स ने सामाजिक परिवर्तन का सिद्धान्त औद्योगीकरण के फलस्वरूप दिया था। वास्तव में, मार्क्स के पूंजीवादी समाज की अवधारणा औद्योगीकरण की आस-पास घूमती है। परंतु मार्क्स ने पूंजीवादी समाज को अतार्किक माना है। डाइरेन्डार्फ ने भी सामाजिक परिवर्तन का मुख्य आधार औद्योगीकरण माना है। यहां पर इन बातों से ....
Question : विनिमय के प्रकार।
(2001)
Answer : विनिमय मुख्यतः दो प्रकार के अर्थों में लिया जाता है। पहला वस्तु विनिमय एवं दूसरा उत्सवी विनिमय। उपहारों का उद्देश्य उत्पादन के वितरण द्वारा व्यक्तिगत एवं सामूहिक संबंधों को स्थायित्व देना होता है। अण्डमानियों से लेकर विकसित समाजों तक हमें उपहार देने की प्रथा देखने को मिलती है। उपहार आर्थिक व सामाजिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। उपहार में आर्थिक दृष्टि से कीमती एवं उपयोगी वस्तुएं, प्रतिष्ठा की दृष्टि से उपयोगी वस्तुएं लेकिन व्यावहारिक और ....
Question : आर्थिक विकास के सामाजिक निर्धारक।
(2000)
Answer : किसी समाज की आर्थिक विकास में योगदान देने वाले कारक मुख्यतः प्राकृतिक संसाधन, पूंजी संग्रह, प्रौद्योगिकी ऊर्जा के साधन, मानव शक्ति, श्रम शक्ति, जनसंख्या की विशेषताएं और इसके आर्थिक संगठन, और सामाजिक वातावरण। जहां तक आर्थिक विकास के सामाजिक निर्धारक की बात है तो इसके अंतर्गत (i) मूल्य या विचारधारा, (ii) संस्थाएं अथवा नियामक ग्रंथियां, (iii) संगठन (नीतियां), (iv) धर्म।
मैक्स वेबर ने आधुनिक पूंजीवाद के विकास का कारण धार्मिक संस्थाओं को माना है। इसके अनुसार ....
Question : श्रम विभाजन और सामाजिक संरचना का विभेदन
(1999)
Answer : श्रम-विभाजन से तात्पर्य किसी भी स्थाई संगठन मे मिलजुल कर काम करने वाले व्यक्तियों, या समूहों द्वारा भिन्न, किंतु समन्वयात्मक क्रियाओं के सम्पादन से हैं श्रम-विभाजन के अंतर्गत विभाजित काम के प्रत्येक भाग को किसी पृथक व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह द्वारा सम्पादित किया जाता है। अतः समाज में किसी कार्य को सम्पादित करने वाले व्यक्तियों के बीच सम्पन्न की जाने वाली क्रियाओं एवं सेवाओं के वितरण एवं वैभिन्नकरण की प्रक्रिया श्रम-विभाजन कहलाती हैं इस ....
Question : पूर्व औद्योगिक आर्थिक व्यवस्था के अभिलक्षण
(1998)
Answer : पूर्व औद्योगिक आर्थिक प्रणाली मुख्यतः कृषक समाज की विशेषताओं को अभिव्यक्त करती है। राबर्ट रेडफील्ड ने कृषक समाज की अवधारणा के माध्यम से ग्रामीण समाज अथवा औद्योगिक पूर्व समाज की आंतरिक एवं बा“य संरचना को समझाने का प्रयत्न किया है। रॉबर्ट रेडफील्ड ने कृषक समाज की पांच विशेषताओं का उल्लेख किया है-