Question : ‘‘बहुत हाल ही के वर्षों में राज्यों के राज्यपाल की भूमिका प्रशासनिक प्रकृति की होने की अपेक्षा कूटनीतिक अधिक होती दिखाई दी है।’’ उपयुक्त उदाहरणों के साथ इस कथन पर टिप्पणी कीजिए।
(2015)
Answer : भारतीय संविधान में केंद्र में जो स्थिति राष्ट्रपति को प्राप्त है राज्यों में वही भूमिका राज्यपालों की होती है। राज्यपाल की स्थिति के संबंध में सामान्य तौर पर दो विरोधी दृष्टिकोण प्रचलित रहे हैं इसमें से प्रथम- राज्यपाल को राज्य का केवल संवैधानिक अध्यक्ष माना गया है एवं द्वितीय- राज्य के प्रशासन में राज्यपाल की भूमिका एक संवैधानिक अध्यक्ष की अपेक्षा बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।
राज्यपाल एक संवैधानिक अध्यक्ष होता है जिसे अपने सभी कार्य मंत्रिपरिषद ....
Question : संघ से राज्यों को उत्तरदायित्वों के न्यागमन (डेवोल्यूशन) और निधियों के स्थानांतरण के उपागम और प्रविधि में हुए अभिनव परिवर्तनों पर टिप्पणी कीजिए।
(2015)
Answer : भारत का वर्तमान संविधान देश में संघीय शासन की स्थापना करता है। भारत राज्यों का संघ है और संघवाद के सिद्धान्तों के अनुसार ही देश में द्विस्तरीय शासन की व्यवस्था की गई है। संविधान संघीय एवं राज्य सरकार दोनों को पृथक-पृथक शक्तियां प्रदान करता है। संघ तथा राज्य सरकारें अपने-अपने क्षेत्रें में संविधान के अनुसार निर्धारित सीमाओं के अंदर अपनी-अपनी शक्तियों का प्रयोग करती है।
संघ और राज्यों के बीच विधायी, कार्यकारी एवं वित्तीय संबंध होते ....
Question : “राज्य के राज्यपालकीय स्थिति, ‘राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत के वापस लेने’ और ‘हटाए जाने के बाध्यकारी कारणों’ के बीच धुंधले क्षेत्र में आराम से स्थित है।” हाल के कुछ उदाहरणों के साथ इस पर चर्चा कीजिए?
(2014)
Answer : नया चुनाव, नया जनादेश न सिर्फ वर्तमान सरकार को सत्ता से बाहर जाने का रास्ता दिखाता है अपितु उन राज्यपालों के लिए भी खतरे की घंटी होती है जो इस पद को अपने राजनीतिक संपर्कों या अन्य कारणों से प्राप्त करते हैं या इस संवैधानिक पद का प्रयोग केन्द्र में स्थित राजनीतिक पार्टी के हितों के लिए करते हैं।
अनुच्छेद 156 के अनुसार, राज्यपाल का कार्यकाल पदग्रहण से 5 वर्ष की अवधि के लिए होता है ....
Question : क्या राज्यपाल के कार्यालय को समाप्त करने की आवश्यकता है? गठबंधन सरकारों के संदर्भ में परीक्षण करें।
(2013)
Answer : चौथे आम चुनाव के बाद भारत की राजनीतिक स्थिति में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। इन चुनावों के बाद विभिन्न राज्यों में राज्यपाल की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ क्योंकि भारतीय संघ के लगभग आधे राज्यों में विरोधी दलों की सरकारों की स्थापना हुई। मार्च 1967 से लेकर मार्च 1972 तक के मध्य इन पांच वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में 24 बार सरकारों का पतन हुआ व 15 बार राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया ....
Question : “मुख्य सचिव को मिलने वाली सफलता एवं प्रतिष्ठा का आनंद बहुत सीमा तक उसके कार्य परिवेश का निर्माण करने वाले लोगों के विभिन्न समूहों एवं संस्थाओं के साथ उसके मधुर संबंधों पर निर्भर करता है।” इस कथन का और अपने प्रकार्यों के निवार्ह में मुख्य सचिव की भूमिका के लिए इसकी प्रासंगिकता का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।
(2012)
Answer : राज्य स्तर पर मुख्य सचिव का पद अत्याधिक महत्वपूर्ण है। मुख्य सचिव राज्य सरकार के मंत्रिमण्डल का सचिव होता है।
मंत्रिमण्डल सचिव के रूप में वह मंत्रिमण्डल की कार्यसूची तैयार करता है, बैठकों की व्यवस्था करता है तथा मंत्रिमण्डल के बैठक में लिए गए निर्णयों का अभिलेखन करता है। मंत्रिमण्डल के निर्णयों की सूचना राज्य के विभिन्न प्राधिकारी को प्रेषित करता है। सचिवालय एक ऊपरी कार्यालय है, जो नीति-निर्माण और विधायिका सम्बन्धों, स्मृति एवं कार्य-निष्पादन, सदन ....
Question : ‘विवेकगत क्षेत्र में राज्यपाल का प्राधिकार अप्रतिबंधित नहीं है। यदि उसका दुरुपयोग किया जाता है, तो राष्ट्रपति उसको रोक सकते हैं, और यदि आवश्यक हुआ तो राष्ट्रपति उसको बरखास्त भी कर सकते हैं।’ राज्यपाल के पद के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
(2012)
Answer : भारत में राज्यपाल का पद संवैधानिक पद है। इस पद के साथ कई विवाद जुड़े रहे हैं और इन विवादों का कारण राज्यपाल पद से जुडे़ संवैधानिक व व्यवहारिक पहलू हैं। भारत के राष्ट्रपति की तुलना में राज्यपाल को केवल राजनय की शक्तियां व सैन्य शक्तियां नहीं दी गयी हैं, लेकिन संघ सरकार के समान ही राज्य में मुख्यमंत्री नियुक्त करना है, जो बहुमत प्राप्त दल के नेता को मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करने ....
Question : “भारत में राज्य तथा स्थानीय स्तर पर होने वाले प्रशासनिक सुधारों की वास्तविक समस्या यह है कि वे ऊपर से आरोपित हैं।” विवेचना कीजिए।
(2011)
Answer : किसी भी व्यवस्था को कार्यकुशल एवं प्रासंगिक बनाए रखने के लिए प्रशासनिक सुधार एक आवश्यक तत्व है, लेकिन प्रशासनिक सुधार को लेकर भारतीय राजनीति एवं प्रशासन दोनों का टालमटोल वाला रवैया रहा है।
अगर हम बात राज्य या स्थानीय स्तर पर होने वाले प्रशासनिक सुधारों की करें तो सुधार हेतु अधिकांश सुझाव या कानून केन्द्र सरकार के द्वारा बनाए जाते हैं। केन्द्र सरकार विधेयक पारित कर राज्यों एवं स्थानीय निकायों को निर्देश देती है।
इसका दुष्परिणाम यह ....
Question : कहा जाता है कि केन्द्र से राज्यों को संसाधनों के अंतरण के लिए अनेक सरणियों के प्रचलन ने परिसंघीय राजकोषीय व्यवस्थाओं की समस्याओं में वृद्धि कर दी है। इस पर चर्चा कीजिए।
(2010)
Answer : भारत की शासन प्रणाली को अर्द्धसंघीय कहा जाता है, क्योंकि इसमें शासन के कुछ कार्यों में केन्द्र को अधिक वरीयता है तो कुछ में राज्यों को। किन्तु अधिकांश विषयों में केन्द्र अधिक प्रभावी है। इसी प्रकार का एक विषय है वित्त व्यवस्था का। जिसमें संघ की वित्तीय स्थिति राज्यों की तुलना में सशक्त है। कर की अवशेष शक्तियां संघ को दी गई हैं। अनुच्छेद 293 में यदि राज्य संघ से ऋण ले चुके हैं, तो ....
Question : तर्क दिया जाता है कि भोपाल गैस आपदा और उसके प्रति अनुक्रिया प्ररूप, कार्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, स्थानीय, राज्यीय एवं केन्द्रीय स्तरों पर शासन, और विधिक रक्षोपायों एवं दायित्वों के तंत्रें से संबंधित बहु-सुभेद्यताओं को प्रतिबिंबित करते हैं। इस आकलन पर टिप्पणी कीजिए।
(2010)
Answer : दिसंबर 1984 को हुई विश्व की इस भींषणतम औद्योगिक त्रसदी में 15 हजार लोग मारे गये थे तथा पांच लाख से अधिक प्रभावित हुए थे। हाल ही में भोपाल गैस त्रसदी के सम्बन्ध में फैसला आया वो भी निचली अदालत का। इस वीभत्स कांड ने कार्पोरेट सेक्टर के काले चेहरे तथा उसकी उच्च राजनीतिक-प्रशासनिक गठजोड़ को उजागर किया है तथा अपर्याप्त कानून के कारण मामूली सजा व जुर्माने ने कई सुभेद्यताओं को उजागर किया है।
कार्पोरेट ....
Question : “राज्य स्तर पर और स्थानीय स्तर पर क्रियान्वित किये जा रहे विकास के अनेक कार्यक्रम या तो संघ सरकार के द्वारा आरम्भ किये गये हैं या उसके द्वारा वित्तीयत हैं। इसने भारतीय परिसंघवाद की प्रकृति को रूपान्तरित कर दिया है” इस आकलन का समालोचना सहित परीक्षण कीजिए।
(2009)
Answer : भारतीय संघ में विकास की परियोजनाओं, प्रोजेक्ट्स को बनाने में केंद्र एवं राज्य दोनों की भूमिका रहती है। इसका प्रमुख कारण सामाजिक-आर्थिक विकास जैसे विषय की समवर्ती सूची में होता है। अतः इस पर केंद्र और राज्य दोनों स्तरों की सरकारों द्वारा सत्ताभ्यास किया जाता है, लेकिन राज्यों की प्रायः यह शिकायत रहती है कि संघ का मौलिक भाव ही राज्यों की स्वतंत्र स्थिति है। ऐसे में केंद्र अनावश्यक इनके क्षेत्रधिकार का अतिक्रमण करता है, ....
Question : क्या राज्य सेवाओं को अखिल भारतीय सेवाओं और केन्द्रीय सेवाओं के मुकाबले नुकसान रहता है, राज्य सेवाओं की भूमिका, सक्षमता तथा प्रभाव में वृद्धि करने के उपाय बताओ।
(2009)
Answer : भारत में हमने संघात्मक शासन व्यवस्था को अपनाया है, जिसमें केन्द्र और राज्य नामक दो ईकाइयां होती हैं। इन दोनों इकाइयों का स्पष्ट क्षेत्रधिकार भी संघ सूची व राज्य सूची के रूप में निर्धारित किया गया है और इन इकाइयों के प्रशासनिक व्यवस्था के संचालन हेतु केन्द्र और राज्य के लिए केन्द्रीय सेवायें और राज्य सेवायें बनाई गई हैं। साथ ही अखिल भारतीय सेवा नामक सेवा दोनों स्तरों पर अपना योगदान प्रदान करती है। अखिल ....
Question : "इक्कसवीं शताब्दी की कानून और व्यवस्था की समस्यायों का उन्नीसवीं शताब्दी के विधानों और संरचनाओं के माध्यम से निपटारा नहीं किया जा सकता है” राज्य स्तर पर कानून और व्यवस्था के तंत्र का रचनांतरण करने के लिए सुझाव दीजिए।
(2009)
Answer : किसी भी संगठन की कार्यपद्धति तथा तकनीकों में समय के साथ परिवर्तन की मांग सदैव अनुभव की जाती रही हैं। भारत में स्वतंत्रता के बाद भी ब्रिटिश लीगेसी के प्रभाव में हम आज भी ब्रिटिश तौर-तरीकों और तकनीकों को संचालित करते आ रहे हैं। उस दौर का पुलिसिया राज्य और आज का विकासवादी राज्य भला एक ही कार्यपद्धति, तकनीक द्वारा कैसे संचालित किया जा सकता है?
अंग्रेजी शासन के दौरान 19वीं सदी में कानून और व्यवस्था ....
Question : भारत के किसी एक राज्य में शासन और विकास के बीच संबंध पर उदाहरण पेश करते हुए चर्चा करें।
(2009)
Answer : शासन और उसके द्वारा अपनाये जाने वाले तौर-तरीकों से होने वाले विकास में एक प्रगाढ़ संबंध पाया जाता है। शासन की प्रक्रिया में अधिक प्रजातांत्रिक, अधिक उत्तरदायी तथा जबाबदेहिता के साथ शासन प्रक्रिया का संचालन किया जाता है ताकि शासन की मशीनरी को और जनोन्मुखी बनाया जा सके।
इस प्रकार आज उदारीकरण, वैश्वीकरण तथा निजीकरण के चलते हमने संचार का बेहतर लाभ उठाते हुए शासन को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह बनाने का प्रयास तो किया ही है, ....
Question : ‘मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक कार्यपालक होता है, जिसकी प्रभाविता का अधिकार संबंध उसके अपने व्यक्तित्व विशेषकों और केंद्रीय नेतृत्व के साथ समीकरण से होता है’ संगत उदाहरण पेश करते हुए बात को सुस्पष्ट कीजिए।
(2008)
Answer : मुख्यमंत्री राज्य का वास्तविक प्रधान होता है। राज्य में राज्यपाल उत्तरदायी मन्त्रिपरिषद् की सहायता से शासन को चलाता है, जिसका अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है। भारत में राज्यों के शासन के लिए संसदीय ढांचे की व्यवस्था की गई है। राज्य में मुख्यमंत्री बहुमत दल का नेता ही नहीं वरन् राज्य का नायक और मुख्य प्रवक्ता भी होता है। राज्य में मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्य का राज्यपाल करता है। मुख्यमन्त्री की नियुक्ति करते समय दो मापदण्ड मुख्य ....
Question : राज्य और उपराज्य स्तरों पर, योजनाकरण प्रक्रम में समस्याओं पर चर्चा कीजिए।
(2008)
Answer : संघीय प्रशासनिक व्यवस्था में भारत में योजना का निर्माण और क्रियान्वयन केंद्र के साथ ही राज्यों की भी जिम्मेदारी है। केंद्रीय योजना आयोग देश के लिए एक राष्ट्रीय योजना का निर्माण करता है तथा संघीय प्रदेशों की सरकारें अपने-अपने राज्य से संबंधित योजनाओं को बनाती हैं। राज्य स्तर पर नियोजन तंत्र योजना का प्रारूप बनाकर उसे केंद्रीय सरकार ने योजना आयोग और राज्य विधान मंडल में प्रस्तुत करता है।
यद्यपि राज्य योजना का निर्माण सरकार का ....
Question : योजनाकरण में, संघ-राज्य संबंधों में तनावकारी क्षेत्र कौन से हैं?
(2008)
Answer : भारत में केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाए रखना एक जटिल समस्या बन कर उभरी है। आर्थिक नियोजन ने देश की संघीय व्यवस्था को अत्याधिक प्रभावित किया है।
अधिकांश राज्य योजना आयोग द्वारा बनाई गई योजनाओं को अपने ऊपर बलपूर्वक थोपने की शिकायत करते हैं। चूंकि राज्यों की योजना की आकृति तय करते समय कोई निश्चित मानदण्ड नहीं अपनाया जाता है और वे राज्य, जिनकी आय के स्त्रोत अधिक है, महत्वाकांक्षी योजनाओं का निर्माण कर लेते हैं, ....
Question : "अनेक न्यायिक निर्णयों के कारण, राज्यों में राज्यपाल अब केन्द्रीय स्तर पर ‘राज्य सत्ता में दल’ के एजेंट के रूप में नहीं देखे जाते हैं।" मूल्यांकन कीजिए।
(2007)
Answer : संविधान भारत को राज्य के संघ के रूप में स्वीकार करता है, यह राज्यों का संघ सम्पूर्ण प्रभुतासम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य की परिकल्पना पर निर्मित किया गया है। भारत के अधिकार में ऐसे राज्य, संघ राज्य क्षेत्र तथा ऐसे अन्य क्षेत्र समाहित हैं, जो भारतीय शासन द्वारा किसी समय अर्जित किये गये हैं। वर्तमान में भारत में 28 राज्य एवं 7 केन्द्रशासित प्रदेश सम्मिलित हैं। संविधान के अनुच्छेद 370 द्वारा जम्मू एवं कश्मीर को विशिष्ट संवैधानिक ....
Question : राज्य सूची को आवंटित प्रत्येक विषय पर एक अलग से केन्द्रीय मंत्रलय या विभाग है। क्या इसका अर्थ संघ सरकार की सर्वोच्चता है या कि विकास प्रशासन पर बल है? विश्लेषण कीजिए।
(2007)
Answer : संविधान के अनुसार भारत को ‘राज्यों का संघ’ कहा गया है। भारतीय संघवाद की अपनी एक विशिष्ट अनुपम स्थिति है। संविधान केन्द्र में एक शक्तिशाली शक्ति की व्यवस्था करता है और केन्द्र राज्य सम्बन्धों के प्रत्येक विषय पर केन्द्र की सर्वोच्चता को प्रमाणित भी करता है। वस्तुतः संविधान केन्द्र को एक शक्तिशाली संरक्षक की भूमिका में प्रस्तुत करता है। संविधान के भाग 11, 12 एवं 13 में केन्द्र राज्य सम्बन्धों का वृहद वर्णन है।
राज्य ....
Question : "सैक्स के व्यवसाय में महिलाओं के कल्याण के लिये संघ और राज्यों द्वारा कौन-कौन से उपाय किये गये हैं?
(2006)
Answer : महिलाओं के सैक्स उत्पीड़न संबंधी अवैध व्यापार को जो इनके अधिकारों के हनन का सबसे घृणित रूप है, से निपटने के लिये अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1986 बनाया गया है। यौन उत्पीड़न के शिकार शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक रूप से टूट जाते हैं। इसका बचाव तथा पुनर्वास, सरकार तथा सभ्य समाज के सामने एक बड़ी चुनौती है। वेश्यावृत्ति जो एक सामाजिक बुराई के रूप में अति प्राचीनकाल से प्रचलित है। यह स्त्री अथवा पुरूष द्वारा ....
Question : बाल श्रमिकों को सुरक्षित करने और बच्चों के दुरूपयोग को रोकने के लिये संघ तथा राज्य सरकारों द्वारा कौन-कौन से मुख्य कदम उठाये गये हैं?
(2006)
Answer : किसी भी जनतंत्र में हरेक बच्चा अनमोल माना जाता है और बच्चों के विकास की संपूर्ण जिम्मेदारी सरकार की होती है। देश की कुल जनसंख्या का लगभग 34 प्रतिशत बच्चे हैं।
इसके बावजूद यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि राजनीतिक दलों और मीडिया के एजेंडे में बच्चों से जुड़े स्वास्थ्य, शिक्षा, साक्षरता और पोषण जैसे मुद्दों को शायद ही कभी जगह मिलती है। कहना न होगा कि समाज का यह तबका न केवल देश का बहुमूल्य मानव ....
Question : भारत के केंद्र-राज्य संबंधों की मुख्य समस्या राजकोषीय संघवाद में मार्गविरोध हैं। टिप्पणी कीजिये।
(2006)
Answer : संघवाद, जो केंद्र राज्य संबंधों को आकार प्रदान करता है तथा जिसके परिणामस्वरूप अनोखी समस्यायें उत्पन्न होती हैं, वह क्षेत्रीय आकांक्षाओं एवं देशव्यापी आवश्यकताओं के मध्य सम्यक् स्थापित करने की एक राजनीतिक योजना है तथा इससे एक आवश्यक निष्कर्ष यह भी निकलता है कि यह सम्यक् स्थिर या कठोर न होकर नमनीय व गतिशील है। इस संघात्मक व्यवस्था में केंद्र और राज्यों की सरकारों के बीच विधायी और प्रशासनिक शक्तियों का ही विभाजन नहीं होता ....