प्रत्यायोजित विधान

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में यह निर्णय दिया है कि केंद्र और राज्यों के प्रत्यायोजन विधानों की शक्तियां, मूल कानून (Parent Act) द्वारा दी गई शत्तिफ़यों से अधिक नहीं हो सकती है। यदि ऐसा होता है, तो यह अधिकारातित (Ultra Vires) है और उन्हें प्रभावी नहीं होने दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार प्रत्यायोजित विधान को मूल कानून के दायरे से बाहर नहीं जाना चाहिए तथा इसे संसदीय कानून का प्रतिस्थापक न होकर उसका पूरक होना चाहिए।

प्रत्यायोजित विधान

  • इस प्रक्रिया के माध्यम से कार्यकारी प्राधिकरण को कानून बनाने के लिए मूल कानून द्वारा शक्तियां प्रदान की जाती हैं। ये कानून उस मूल कानून की आवश्यकताओं को लागू करने और प्रशासित करने के लिए बनाए जाते हैं।

प्रत्यायोजित विधान की अमान्यता

  • मौलिक अधिकारों के उल्लघंन पर।
  • भारतीय संविधान के किसी प्रावधान के उल्लघंन पर।
  • मूल अधिनियम के मूल प्रावधानों के प्रतिकूल होने पर।
  • अगर बनाए गए नियम की विधायी क्षमता कार्यपालिका के पास न हो।
  • बिना उचित कारण के विधान को प्रत्यायोजित कर दिया गया हो।
  • प्रत्यायोजित विधान अगर भूतलक्षी हो।
  • अगर विधयिका अपने किसी अनिवार्य विधायी कार्यों का प्रत्यायोजन करती है।

प्रमुख मुद्दा

  • प्रत्यायोजित विधान की निम्न संवीक्षा
  • लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध
  • कार्यपालिकाद्वारा शासन करने की शक्तियों का दुरुपयोग
  • कार्यों का अतिव्यापन।

न्यायिक निर्णय

  • विमुद्रीकरण पर न्यायालय ने केंद्र सरकार के प्रत्यायोजित विधान को वैध माना है।
  • सेंट जोंस टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टिटयूट बनाम क्षेत्रीय निदेशक एनसीटीई 2003 वाद में सुओरिम कोर्ट ने माना था कि प्रत्यायोजित विधान एक आवश्यक बुराई है।
  • डी. एस. गरेवाल बनाम पंजाब राज्य और अन्य वाद में कोर्ट के अनुसार अनुच्छेद 312 प्रत्यायोजित विधान से संबंधित है।

आगे की राह

  • प्रत्यायोजित विधान संबंधी विवादों के समाधान हेतु आवश्यक है कि संसद की प्रक्रियाओं में संशोधन किया जाना चाहिए तथा सांसद द्वारा अधीनस्थ विधान को विशेष आधार पर अगर विश्लेषण हेतु भेजा जाए तब उस पर समयबद्ध तरीके से इसके बारे में सूचित किया जाना चाहिए।