भारत के पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण

पारम्परिक ज्ञान, विभिन्न स्थानीय समुदायों के अधिकार वाला वह ज्ञान है, जो उन्होंने पारम्परिक एवं वर्तमान दैनंदिन गतिविधियों के माध्यम से संचित किया है। किसी समुदाय तथा उसकी सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के स्थानीय पर्यावरण के साथ जुड़े हुए संबंध इस ज्ञान के आधार होते हैं। पारंपरिक ज्ञान उन प्रथाओं को संदर्भित करता है, जो स्थानीय समुदायों द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित, संरक्षित और उपयोग किए गए हैं।

  • हालांकि बायोप्रोस्पेक्टिंग द्वारा औषधीय उत्पादों की खोज कई मायनों में फायदेमंद है, लेकिन फार्मास्युटिकल फर्मों द्वारा अपनाए गए तरीकों और अनुप्रयोगों की कई मंचों पर आलोचना की गई है। इस संबंध में, एक देश के लिए दवा कंपनियों द्वारा दवा के पारंपरिक ज्ञान बचाने के लिए उसको पेटेंट करा कर उसका संरक्षण करना एक वेहतर विकल्प हो सकता है।

जैव पूर्वेक्षण के परिणाम

  • फार्मास्युटिकल फर्म और बायोटेक्नोलॉजी कंपनियां स्वदेशी समुदायों, जिन्होंने दवाओं के लिए पारंपरिक पौधों की किस्मों का चयन, रखरखाव और सुधार किया है, को मान्यता दिए बिना पेटेंट उत्पादों को विकसित करने के एकमात्र उद्देश्य के साथ जैविक संपदा और स्वदेशी ज्ञान का दोहन कर रही हैं।
  • फार्मास्युटिकल फर्मों पर अक्सर स्थानीय लोगों को ज्ञान और वित्तीय लाभों तक पहुंच से वंचित करके धोखा देने का आरोप लगाया जाता है।
  • कई मामलों में, पारंपरिक ज्ञान के स्रोत वाले देशों का पर्याप्त मुआवजा प्रदान करने हेतु कोई स्पस्ट नियम नहीं है।

भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी (टीकेडीएल) की स्थापना कर अंतरराष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों में भारतीय पारंपरिक ज्ञान को गलत पेटेंट से बचाने और शोषण को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।
  • भारतीय पेटेंट कार्यालय ने पारंपरिक ज्ञान (टीके) से संबंधित आविष्कार में नवीनता और आविष्कारशील कदम का विश्लेषण करने के लिए पेटेंट परीक्षक की मदद करने के लिए पारंपरिक ज्ञान और जैविक सामग्री से संबंधित पेटेंट आवेदनों के प्रसंस्करण के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं।
  • भारत सरकार ने प्रभावी रूप से 2,00,000 स्थानीय उपचारों को ‘सार्वजनिक संपत्ति’ के रूप में लाइसेंस दिया है, जिसका उपयोग कोई भी कर सकता है; लेकिन कोई भी ‘ब्रांड’ के रूप में नहीं बेच सकता है।

आगे की राह

  • वस्तुतः यह ज्ञान प्राकृतिक पर्यावरण के साथ आदान प्रदान के विस्तृत इतिहासों वाले लोगों द्वारा अनुरक्षित एवं विकसित ज्ञान, जानकारी, व्यवहारों एवं प्रतिनिधित्वों का संचित निकाय होता है। बोधों, व्याख्याओं एवं अर्थों की व्यवहार कुशलता से युक्त यह समुच्च एकक सांस्कृतिक समूह का अभिन्न अंग होता है; जिसमें भाषा, नामकरण एवं वर्गीकरण की प्रणालियां, संसाधनों के उपयोग की विधियाँ धार्मिक अनुष्ठान, आध्यत्मिकता और विश्व के प्रति दृष्टि आदि विषय सम्मिलित होते हैं।