अर्थव्यवस्था का विकार्बनीकरण

डिकार्बोनाइजेशन या विकार्बनीकरण (Decarbonisation) एक व्यापक प्रक्रिया है, जिसके तहत जैव-ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना; स्वच्छ वायु प्रौद्योगिकियों को अपनाना; हाइड्रोजन एवं कार्बन कैप्चर जैसी ऊर्जा दक्षता की नेक्स्ट जनरेशन तकनीकों को लागू करना तथा जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए व्यापक वित्तीय रूपरेखा को निर्मित करने जैसे कदम शामिल हैं।

  • अर्थव्यवस्था के विकार्बनीकरण हेतु देश में एक व्यापक रणनीति की आवश्यकता है। इस रणनीति के तहत अर्थव्यवस्था को क्षेत्रवार वर्गीकृत करके विकार्बनीकरण की प्रक्रिया को चरणबद्ध रूप में लागू किया जाना चाहिए।

विकार्बनीकरण रणनीति की आवश्यकता

  • वर्तमान समय में विश्व का लगभग प्रत्येक देश एक समयबद्ध ‘शुद्ध-शून्य’ कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य को प्राप्त करने की नीति पर सहमत हो गया है। इन देशों द्वारा डिकार्बोनाइजेशन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपनी क्षमता के अनुसार आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
  • भारत सरकार ने अपनी नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) आधारित बिजली की लागत में तेजी से कमी करते हुए नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को पुनः परिभाषित किया है।
  • सरकार द्वारा वर्ष 2015 में 2022 तक 175 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। इस प्रतिबद्धता के पश्चात भारत ने वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को 450 गीगावाट क्षमता तक बढ़ा दिया है।
  • भारत को अपने लक्ष्यों की पूर्ति में अनेक वित्तीय एवं नीतिगत बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में एक कारगर एवं समन्वित डिकार्बोनाइजेशन रणनीति लक्ष्यों को कुशलतापूर्वक प्राप्त करने में सहायक हो सकती है।

चुनौतियां

  • सर्वप्रथम, जीवाश्म ईंधन, परंपरागत ऊर्जा उत्पादन, भारी उद्योग एवं वाहन निर्माण क्षेत्रें में लंबे समय से कार्यरत श्रमिकों के समक्ष रोजगार संबंधी संकट उत्पन्न हो सकते हैं। क्योंकि डिकार्बोनाइजेशन की रणनीति में तकनीकी रूपांतरण के सर्वाधिक प्रभाव इन्हीं क्षेत्रों पर देखने को मिलेंगे।
  • भारत के लिए वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा में बने रहने के लिए स्टील, पेट्रोकेमिकल्स, एल्युमीनियम, सीमेंट और उर्वरक जैसे भारी उद्योगों को ऊर्जा के दूसरे विकल्पों पर स्थानांतरित करना चुनौतीपूर्ण है।