परिवहन क्षेत्र का विकार्बनीकरण

परिवहन क्षेत्र कार्बन उत्सर्जन में प्रमुख योगदानकर्त्ता है। केवल सड़क परिवहन के माध्यम से लगभग 33% पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन होता है। भारत वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश के परिवहन क्षेत्र का विकार्बनीकरण किया जाना अत्यंत आवश्यक है। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का एक व्यापक बाजार है और देश इस अवसर का लाभ उठाकर जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरण के प्रति की गई अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा कर सकता है।

  • भारत में एक तरफ जहां इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहित किया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ परंपरागत ऊर्जा पर आधारित परिवहन साधनों के बाजार में तीव्र गति से विस्तार हो रहा है। वर्ष 2019 में भारत में वाहन पंजीकरण की वृद्धि दर (10%) उच्चतम स्तर पर दर्ज की गई थी और यह विश्व में पांचवां सबसे बड़ा कार निर्माता देश था।
  • परिवहन साधनों से होने वाला उत्सर्जन शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है। सरकारी अनुमानों के अनुसार वाहनों से होने वाला उत्सर्जन, ‘पार्टिकुलेट मैटर 2.5’ (PM 2.5) में 20.30% योगदान देता है।

आवश्यकता

  • ऊर्जा दक्षता ब्यूरो के अनुसार भारत में परिवहन क्षेत्र की खपत कुल ऊर्जा खपत का 18% है। यह लगभग 94 मिलियन टन तेल ऊर्जा (MTOE) खर्च करने के बराबर है। यदि भारत को ऊर्जा की खपत के वर्तमान स्तर को बनाए रखना है तो उसे परिवहन क्षेत्र की मांग को पूरा करने के लिए वर्ष 2030 तक वार्षिक रूप से लगभग 200 MTOE ऊर्जा आपूर्ति की आवश्यकता होगी।
  • इलेक्ट्रिक वाहन, ऊर्जा मांग, ऊर्जा भंडारण और पर्यावरणीय स्थिरता को बनाए रखने में भी योगदान करेंगे। साथ ही यदि बिजली क्षेत्र को डिकार्बुराइज (Decarburize) किया जाए, तो इलेक्ट्रिक वाहन वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में भी अपना योगदान दे सकते हैं।
  • इलेक्ट्रिक वाहनों द्वारा ‘अल्ट्रा-लो-टेलपाइप उत्सर्जन’ (Ultra-low-tailpipe emissions), यानी वायु प्रदूषकों का शून्य उत्सर्जन किया जाता है, साथ ही इनमें शोर भी अत्यंत कम होता है।

सरकार की प्रमुख पहल

  • फेम-इंडिया योजना
  • बैटरी स्वैपिंग नीति, 2020
  • PLI योजना के तहत प्रोत्साहन
  • फोरम फॉर डीकार्बोनाइजिंग ट्रांसपोर्ट
  • वाहन स्क्रैपिंग नीति
  • गो इलेक्ट्रिक अभियान
  • भारत स्टेज-VI (BS-VI) उत्सर्जन मानदंडों को अपनाना।