हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा ‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य’ नामक रिपोर्ट जारी की गई, जो मानसिक स्वास्थ्य पर 21वीं सदी की सबसे बड़ी समीक्षा रिपोर्ट है।
चुनौतियां
आर्थिक बोझः मानसिक विकार न केवल मानसिक विकलांगता का कारण बनते हैं, बल्कि देश पर आर्थिक बोझ भी डालते हैं। अस्थाई विकलांगता व्यक्ति की आय को प्रभावित करती है तथा चिकित्सा का खर्च भी व्यक्ति को वहन करना पड़ता है।
जागरूकता की कमीः भारत में कम साक्षरता के कारण मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी पाई जाती है तथा गरीबी इस समस्या को और बढ़ा देती है।
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमीः भारत में अपर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के पीछे मुख्य कारण मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी है। भारत में मनोचिकित्सकों की संख्या प्रति 100 हजार लोगों पर केवल 0.3 है।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंचः 2016 के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित 83 प्रतिशत लोगों तक प्रभावी उपचार की पहुंच नहीं थी। शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में उचित मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करना अधिक कठिन है।
अधिक जनसंख्या बोझः भारत की आबादी लगभग 1.3 अरब है तथा इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए ‘मानसिक स्वास्थ्य देखभाल’ सुनिश्चित करना चुनौतीपूर्ण है, अतः इसके लिए एक व्यापक रणनीति की आवश्यकता है।
निष्कर्ष: भारत जैसे विकासशील देश को मानसिक स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सेवा तक सभी लोगों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए नए स्वास्थ्य संस्थानों की स्थापना और पेशेवरों की संख्या में वृद्धि करने जैसे दीर्घकालिक उपाय करने चाहिए, अन्यथा वर्ष 2030 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को 6 ट्रिलियन USD के बराबर हानि होने की उम्मीद है।