रक्षा क्षेत्र का स्वदेशीकरण

हाल ही में, एक संसदीय पैनल ने रक्षा क्षेत्र के स्वदेशीकरण की दर अत्यंत मंद होने के कारण रक्षा अनुसंधान पर भारत द्वारा किए जा रहे व्यय को लेकर चिंता व्यक्त की है।

रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण पर ध्यान देने की आवश्यकता क्यों है?

सुरक्षा चिंताएं: चीन और पाकिस्तान के साथ अनसुलझे क्षेत्रीय विवाद, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में घुसपैठ तथा वामपंथी उग्रवाद के बढ़ते खतरे के मद्देनजर रक्षा सामग्री की खरीद के साथ-साथ स्वदेशीकरण पर भी अधिक धन खर्च करने की आवश्यकता है।

क्षेत्रीय शक्तिः हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रमुऽ सुरक्षा प्रदाता के रूप में कार्य करने के लिए, भारत को उन्नत रक्षा हार्डवेयर और प्रौद्योगिकी के विकास के मामले में भी आत्मनिर्भरता हासिल करने की आवश्यकता है।

क्षमता निर्माणः भारत के सशस्त्र बलों में मौजूदा खामियों के मद्देनजर युद्ध के विभिन्न क्षेत्रें, जैसे- थल, जल और नभ हेतु उन्नत तथा परिष्कृत हथियार प्रणाली के विकास पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

उन्नत प्रौद्योगिकीः सशस्त्र बलों के युद्ध-लड़ने की क्षमता, नए हथियारों के विकास (हाइपरसोनिक मिसाइल) तथा हथियारों एवं उपकरणों में प्रयोग की जाने वाली सॉलिड फ्रयूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक के निरंतर संवर्द्धित एवं अपडेट की आवश्यकता है। ये एक कुशल बुनियादी ढांचे की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।

रक्षा स्वदेशीकरण हेतु सरकारी पहलें

ऑफसेट पोर्टलः रक्षा ऑफसेट नीति का मुख्य उद्देश्य भारतीय रक्षा उद्योग को विकसित करने में मदद करना है।

रक्षा खरीद प्रक्रिया (DPP), 2016: रक्षा उपकरणों के स्वदेशी डिजाइन और विकास को बढ़ावा देने के लिए पूंजी अधिग्रहण की नई श्रेणी “इंडियन-IDDM खरीद (स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और विनिर्मित)” की शुरूआत की गई है।

प्रौद्योगिकी विकास कोष (TDF): इसका उद्देश्य रक्षा अनुप्रयोगों के संदर्भ में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी क्षमता बढ़ाने के लिए सार्वजनिक/निजी उद्योगों की भागीदारी को प्रोत्साहित करना है।

रक्षा औद्योगिक गलियारा (DICs): इसे उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में आर्थिक विकास और रक्षा क्षेत्र के उद्योगों के विकास हेतु एक इंजन के रूप में कार्य करने के लिए स्थापित किया गया है।