हाल ही में, प्रौद्योगिकी विकास कोष (TDF) के तहत अभिनव रक्षा परियोजनाओं के वित्तपोषण की सीमा को वर्तमान 10 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 50 करोड़ रुपये प्रति परियोजना कर दिया गया है।
आवश्यकता
चुनौतीपूर्ण रणनीतिक परिवेशः इसमें भारत के संपूर्ण भूभाग का एक विस्तृत क्षेत्र शामिल है। यह पश्चिमी प्रशांत से लेकर हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) तक और पाकिस्तान से लगी पश्चिमी सीमाओं से लेकर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर गतिरोध तक फैला हुआ है।
युद्ध के बदलते परिदृश्यः भविष्य में युद्ध साइबर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित स्वचालित हथियारों से लड़े जायेंगे। इसमें लक्ष्य का सटीक निर्धारण और अनुकूलन योग्य शिक्षण तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। इन कार्यों में श्रेष्ठता ही भविष्य के युद्धों का परिणाम निर्धारित करेगी।
आयात पर निर्भरता घटानाः स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2017-21 के बीच भारत सऊदी अरब के साथ विश्व के सबसे बड़े हथियार आयातक के रूप में उभरा है।
इस योजना की प्रमुख विशेषताएं |
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रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा |
MSMEs और स्टार्ट- अप्स को प्रोत्साहन |
बेहतर वित्त प्रणाली |
यह योजना मेक इन इंडिया के एक भाग के रूप में रक्षा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू की गयी है। |
यह योजना सार्वजनिक उद्योगों विशेष रूप से MSMEs और स्टार्ट अप्स की भागीदारी को बढ़ावा देगी। इससे रक्षा उपयोग के लिए अग्रणी तकनीकी को बढ़ावा देने हेतु एक पारितंत्र सृजित किया जा सकेगा। |
यह योजना कुल परियोजना लागत के 90 प्रतिशत तक के लिए वित्त प्रदान करती है। साथ ही, यह इस उद्योग को अन्य उद्योगों / शैक्षिक संस्थाओं के साथ मिलकर काम करने की अनुमति देती है। |
चुनौतियां
अनुसंधान एवं विकास में निवेश की कमीः भारत रक्षा बजट का लगभग 6% रक्षा अनुसंधान एवं विकास पर व्यय कर रहा है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन क्रमशः लगभग 12% और 20% ऽर्च कर रहे हैं।
निजी क्षेत्रक की भागीदारी का अभावः विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की भागीदारी का अभाव है। ये आधुनिकीकरण के लिए अनुकूल प्रौद्योगिकी (Niche Technology) विकसित करने और आवश्यक समाधान प्रदान करने में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।
निर्णय लेने की धीमी प्रक्रियाः रक्षा संबंधी खरीद और विकास के लिए कई मार्ग उपलब्ध होने के बावजूद, उत्पादन शुरू होने से पहले उत्पादन और अधिग्रहण अनुबंधों को अंतिम रूप देने में करीब 7 से 9 वर्ष लग जाते हैं।