हिमालय पारिस्थिकी तंत्र

भारत में जल संसाधनों, जलवायु, अर्थव्यवस्था तथा कृषि प्रतिरूप के निर्धारण में हिमालय अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। हिमालय पारिस्थितिक तंत्र में होने वाले असंतुलन का स्पष्ट प्रभाव इन सभी क्षेत्रों पर देखने को मिलता है। इसके संरक्षण की दिशा में अनेक प्रयास किए गए हैं; किंतु संस्थाओं के मध्य समन्वय के अभाव, पर्याप्त धन की अनुपलब्धता तथा राजनैतिक तटस्थता के कारण अपेक्षित लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सका है। इस दिशा में जन जागरूकता, सहभागिता तथा नीतियों के उचित क्रियान्वयन के माध्यम से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।

राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पोषणीय मिशन के कार्यात्मक क्षेत्र

  • हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने का राष्ट्रीय मिशन (राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पोषणीय मिशन /National Mission on Sustaining the Himalayan Ecosystem) एकमात्र क्षेत्र-विशिष्ट मिशन है और इसे हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की स्वास्थ्य स्थिति का लगातार आंकलन करने के लिए समयबद्ध तरीके से एक स्थायी राष्ट्रीय क्षमता विकसित करने हेतु तैयार किया गया है। मिशन के कार्यात्मक क्षेत्र निम्न हैं:
    1. हिमालयी ग्लेशियर और संबंधित जल-संबंधी परिणाम
    2. प्राकृतिक खतरों की भविष्यवाणी और प्रबंधन
    3. जैव विविधता संरक्षण और संरक्षण
    4. वन्य जीवन संरक्षण
    5. पारंपरिक ज्ञान समाज और उनकी आजीविका
    6. हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के निर्वाह से संबंधित शासन के मुद्दों की सहायता के लिए विज्ञान और महत्वपूर्ण सहकर्मी मूल्यांकन के विनियमन में क्षमता
    7. उत्तराखंड की बहाली और पुनर्वास प्रक्रिया में सहायता।

हिमालय पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण

  • सुरक्षित हिमालय परियोजना
  • हिमालयन कॉन्क्लेव
  • हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की पोषणीयता
  • ट्रांस-हिमालय के पारिस्थितिकी पर्यावरण संरक्षण पर संगोष्ठी।

सरकार द्वारा पहल

  • सरकार ने जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC), जलवायु अनुकूल कृषि पर राष्ट्रीय पहल (NICRA) और जलवायु परिवर्तन के लिए राष्ट्रीय अनुकूलन कोष (NAFCC) के तहत सतत कृषि पर राष्ट्रीय मिशन (NMSA) जैसे कई कार्यक्रम शुरू किए हैं।
  • सरकार द्वारा प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) योजना के द्वारा कृषि क्षेत्र में कार्बन फुटप्रिंट कम करना।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के द्वारा कम कार्बन-गहन कृषि को बढ़ावा देना।
  • भूमि उपयोग के संदर्भ में, डीकार्बोनाइजेशन के लिए प्रमुख तत्व वनों की कटाई को रोकना, अवक्रमित वनों का कायाकल्प करना।
  • ग्रीन इंडिया राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत 2030 तक 2.5-3 बिलियन टन कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य।
  • जैव ईंधन के लिए राष्ट्रीय नीति/एसएटीएटी योजना के द्वारा 15 मिलियन टन बायो-सीएनजी का मध्यम अवधि का लक्ष्य निर्धारित किया है।