पर्यावरण प्रभाव आंकलन

पर्यावरण प्रभाव आंकलन एक पर्यावरणीय निर्णय संबंधी उपकरण है, जो पर्यावरण, समाज, अर्थव्यवस्था और मानव स्वास्थ्य पर विकास परियोजनाओं के संभावित लाभकारी और प्रतिकूल दोनों प्रकार के प्रभावों के बारे में सूचना प्रदान करता है।

उद्देश्य

इसका उद्देश्य विकास परियोजना की योजना बनाते समय पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया के माध्यम से सतत विकास सुनिश्चित करना है।

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन को एक उपकरण के रूप में परिभाषित करता है, जिसका उपयोग निर्णय लेने से पहले किसी भी परियोजना के पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों की पहचान करने के लिए किया जाता है।
  • इसका मूल उद्देश्य किसी भी परियोजना के नियोजन और डिजाइन के एक प्रारंभिक चरण में ही पर्यावरणीय प्रभावों का पता लगाना है।
  • इसके अंतर्गत प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के तरीकों और साधनों को खोजना, स्थानीय पर्यावरण के अनुरूप परियोजनाओं को आकार देना और निर्णयकर्ताओं को भविष्योन्मुखी विकल्प प्रस्तुत करना है।
  • किसी परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन में परियोजना के समग्र प्रदर्शन को निर्धारित करने में समान रूप से महत्वपूर्ण प्रत्येक चरण के साथ कई और चरण एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।
  • आमतौर पर, ईआईए प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि समय और संसाधन पर्यावरणीय दृष्टि से प्रस्तावों के अनुरूप हों।
  • भारत में पर्यावरण प्रभाव आंकलनः पर्यावरण पर स्टॉकहोम घोषणा (1972) पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने जल (1974) और वायु (1981) प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए। लेकिन वर्ष 1984 में भोपाल गैस रिसाव आपदा के बाद देश ने पर्यावरण न्याय (Environmental justice) सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 1986 में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक समग्र अधिनियम बनाया।

लाभ

  • पर्यावरण की सुरक्षा, संसाधनों का इष्टतम उपयोग एवं परियोजना के समय तथा लागत की बचत।
  • सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने, निर्णय निर्माण कर्ताओं को सूचित करने तथा पर्यावरण की दृष्टि से अच्छी परियोजनाओं के लिए आधार तैयार करने में सहायता करके संघर्षों को कम करता है।
  • एक परियोजना के सभी चरणों में, अन्वेषण एवं योजना से, निर्माण, संचालन, डीकमीशनिंग एवं साइट बंद होने से परे लाभ देखा गया।