जियो-इंजीनियरिंग CO2 उत्सर्जन में कमी का विकल्प नहीं है, और इसे कभी भी पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सकता। साथ ही जियो-इंजीनियरिंग सामाजिक, नैतिक, नीतिशास्त्रीय, राजनीतिक, कानूनी और शासन संबंधी मुद्दों की जटिलताओं में उलझी हुई है। इसलिए हमारा ध्यान अपनी अर्थव्यवस्थाओं को कार्बन से मुक्त करने, टिकाऊ व्यवहार प्रथाओं की वकालत करने और जलवायु परिवर्तन हेतु मजबूत लचीलापन बनाने पर होना चाहिए।
जियो-इंजीनियरिंग तकनीक के व्यावहारिक अनुप्रयोगः हवा से ब्व्2 के निवारण के लिए पेड़ों और पौधों की क्षमता में वृद्धि, कार्बन-अवशोषण तकनीक (carbon-capture technology) के साथ बिजली संयंत्रों में बड़ी मात्रा में लकड़ी जलाना, कार्बन को मिट्टी में दबाने/ढकने के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी का कोयला बनाना, मवेशियों को चराने के लिए घास के मैदानों को इस तरह से तैयार किया जाना कि मैदान एक विशाल कार्बन सिंक में बदल जाए तथा वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने वाले शैवाल के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए आयरन के साथ महासागरों को उर्वरित करना आदि।