पैराडिप्लोमैसी द्धस्थानिक कूटनीतिऋ और भारत: अवसर व चुनौतियां

पैराडिप्लोमैसी (स्थानिक कूटनीति) को भारतीय नीति निर्माण प्रक्रिया के केंद्र-बिंदु में लाने का श्रेय वर्तमान की केंद्र सरकार को दिया जा सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रगाढ़ बनाने का यह विचार नया नहीं है।

पैराडिप्लोमैसी की संकल्पना पहली बार 1990 में एक अमेरिकी विद्वान जॉन किनकैड ने की थी, जिन्होंने एक लोकतांत्रिक संघीय प्रणाली के भीतर स्थानीय सरकारों के लिए एक विदेश नीति की भूमिका की रूपरेखा बनाई थी।

अर्थ

  • इसे राष्ट्रीय कूटनीति, महाद्वीपीय कूटनीति, क्षेत्रीय कूटनीति और उपराष्ट्रीय कूटनीति के रूप में भी जाना जाता है।
  • पैराडिप्लोमेसी दो या दो से अधिक देशों के सरकारी अधिकारियों के बीच आधिकारिक संबंधों को संदर्भित करता है। यह पैरलल डिप्लोमेसी से अलग होता है।
  • पैररल डिप्लोमेसी निजी नागरिकों या व्यक्तियों के समूहों, जिन्हें कभी-कभी गैर राज्य कार्यकर्त्ता कहा जाता है, के बीच गैर सरकारी, अनौपचारिक और अनाधिकारिक संपर्कों और गतिविधियों को संदर्भित करती है। इसे ट्रैक 2 डिप्लोमेसी या बैकचैनल डिप्लोमेसी भी कहा जाता है।

विकास में योगदान

  • भारत में वर्ष 1967 के बाद से गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय दलों के उदय तथा केंद्र राज्य सम्बन्धों में तकरार के साथ-साथ केंद्र का राज्यों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार के उभार ने राज्यों को वैकल्पिक मॉडल की ओर आकर्षित किया है।
  • आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के साथ-साथ डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसे सरकारी पहल और आसियान स्मार्ट सिटी नेटवर्क तथा सुशासन के कारण विदेशी निवेश के द्वारा पैरा डिप्लोमेसी को बढ़ावा मिला है।

पैराडिप्लोमेसी संबंधी चिंताएं

  • इसमें नीतियों में सामंजस्य का अभाव दिखता है, क्योंकि देश में उपस्थित विभिन्न प्रकार के मत के कारण केन्द्रीय स्तर पर द्विपक्षीय सम्बन्धों को प्रभावित करने वाली एक सुसंगत राष्ट्रीय विदेश नीति के निर्माण में समस्या उत्पन्न होती है।
  • राष्ट्रीय विदेश नीति पर राज्यों का बढ़ता प्रभाव तथा राज्यों के बीच विशाल सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा भौगोलिक विविधता का मौजूद होना।

आगे की राह

  • इस नीति की सफलता हेतु केंद्र सरकार को चाहिए कि उपराष्ट्रीय इकाई के साथ सामंजस्य की स्थापना करें तथा राष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा में सीमावर्ती राज्यों की भूमिकाओं की पहचान करना आवश्यक है।
  • पैरा डिप्लोमैसी में न केवल भारतीय राज्य के संघीय ढांचे को और मजबूत बनाने की क्षमता है, बल्कि यह क्षेत्रीय सरकारों को सीमा पार संबंधों के संचालन में उनकी क्षमता अर्जित करने में सहयोग देने के जरिये भारतीय विदेश नीति की धारा में भी आमूलचूल परिवर्तन ला सकती है।