21वीं सदी में भारतीय आर्थिक कूटनीति

अंतर-राज्यीय संबंधों के संचालन में आर्थिक साधनों के माध्यम से एक देश द्वारा अपनी आर्थिक सुरक्षा तथा सामरिक हितों को पूरा करने को ही आर्थिक कूटनीति कहते हैं।

भारत की आर्थिक कूटनीति के उद्देश्य

  • विदेशी पूंजी निवेश, नई तकनीकी तथा नये प्रबंधन कौशल की प्राप्ति।
  • अर्थव्यवस्था के विकास में तेजी व निरंतरता हेतु आवश्यक वस्तुओं, सेवाओं, तकनीकों तथा ऊर्जा संसाधनों की आपूर्ति को सुनिश्चित करना।
  • द्विपक्षीय तथा बहुपक्षीय आधार पर आपसी लाभकारी आर्थिक व विकास साझेदारी को बढ़ाना।
  • वर्तमान विश्व की प्रमुख चुनौतियों जैसे, वित्तीय संकट, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक गरीबी, ऊर्जा तथा खाद्य सुरक्षा के समाधान व प्रबन्धन में सक्रिय भागीदारी।

चुनौतियां

  • विभिन्न मंत्रलयों के बीच सहयोग की कमी।
  • क्षमता संबंधी बाधाएं आर्थिक और सामरिक लक्ष्यों के एकीकरण को प्रभावित करती हैं।
  • सरकार और व्यवसायों के बीच जुड़ाव का अभाव।
  • अपर्याप्त विकास सहायता कार्यक्रम।
  • विवाद निपटान तंत्र की कमी और कठोर कर व्यवस्था।
  • भारतीय प्रवासी के साथ लगातार कमजोर जुड़ाव।

सरकार द्वारा पहल

  • सरकारी संस्थानों और व्यापार एसोसिएशन के बीच सम्बन्ध निर्माण-
    • कैबिनेट स्तर पर नियमित अंतर-मंत्रलयी बैठकों की सुविधा प्रदान करना।
    • सरकार और व्यापार संघों के बीच अधिक लगातार संवाद की सुविधा।

बाजार का एकीकरण और व्यापार

  • व्यापार को बढ़ावा देने के लिए वित्त मंत्रलय या वाणिज्य मंत्रलय के भीतर स्थित एक आर्थिक इंटेलिजेंस इकाई बनाना।
  • द्विपक्षीय स्थानीय मुद्रा स्वैप समझौतों के उपयोग को बढ़ावा देकर रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण करना।
  • भारत के भीतर तथा सीमावर्ती देशों में भी उच्च क्षमता वाली सड़क और रेल नेटवर्क के निर्माण, ताकि भारतीय सामानों के निर्यात को सुगम बनाया जा सके।

क्षेत्रीय और वैश्विक लिंक का विस्तार करना

  • भारतीय प्रवासियों के साथ बेहतर संवाद स्थापित करने के लिए कुशल अधिकारी की नियुक्ति।
  • बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ विभिन्न समझौतों के माध्यम से बाजार तक पहुंच प्राप्त करना।
  • आर्थिक कूटनीति में शामिल होने के लिए शीर्ष भारतीय नेताओं को प्रोत्साहित करना।
  • विशिष्ट बाजारों के साथ आर्थिक जुड़ाव का प्रयासों करना।
  • अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार।
  • बहुपक्षीय आर्थिक मंच की स्थापना।