हाल के समय में विश्व को बिजली और ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा है। यद्यपि अलग-अलग देशों में इस संकट के कारण अलग-अलग रहे हैं, फिर भी जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने और व्यवहार्य विकल्पों की तलाश आरम्भ कर दी गई है। इस संदर्भ में परमाणु ऊर्जा एक वृहत अवसर उपलब्ध करा सकती है।
भारत में नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन की स्थितिः वर्तमान में भारत में 6,780 मेगावाट की कुल स्थापित क्षमता वाले 22 परिचालन रिएक्टर हैं। तारापुर (महाराष्ट्र) में स्थापित किये गए देश के पहले दो रिएक्टर आयात किए गए थे। लेकिन तमिलनाडु के कलपक्कम में 220 मेगावाट क्षमता का दबावयुक्त भारी जल रिएक्टर (PHWR) पहला पूरी तरह से स्वदेशी परमाणु ऊर्जा संयंत्र था।
चुनौतियां
अपर्याप्त परमाणु स्थापित क्षमताः वर्ष 2008 में परमाणु ऊर्जा आयोग ने अनुमान लगाया था कि भारत में वर्ष 2050 तक 650 GW स्थापित क्षमता होगी; वर्तमान स्थापित क्षमता मात्र 6.78 गीगावॉट है।
सार्वजनिक वित्तपोषण की कमीः परमाणु ऊर्जा को कभी भी ऐसी अत्यधिक सब्सिडी प्राप्त नहीं हुई जैसी अतीत में जीवाश्म ईंधन को प्राप्त हुई थी और वर्तमान में नवीकरणीय ऊर्जा को प्राप्त हो रही है। सार्वजनिक वित्तपोषण के अभाव में परमाणु ऊर्जा के लिये भविष्य में प्राकृतिक गैस और नवीकरणीय ऊर्जा से मुकाबला करना कठिन होगा।
भूमि अधिग्रहणः भूमि अधिग्रहण और परमाणु ऊर्जा संयंत्र (NPP) के लिये स्थान का चयन भी देश में एक बड़ी समस्या है। तमिलनाडु में कुडनकुलम और आंध्र प्रदेश में कोव्वाडा जैसे परमाणु ऊर्जा संयंत्रें को भूमि अधिग्रहण संबंधी चुनौतियों के कारण देरी का सामना करना पड़ा है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभावः जलवायु परिवर्तन से परमाणु रिएक्टर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाएगा। विश्व में लगातार गर्म होते जा रहे ग्रीष्मकाल के दौरान पहले से ही कई परमाणु ऊर्जा संयंत्रें को अस्थायी रूप से बंद करने की स्थिति बनती रही है।
परमाणु अपशिष्टः परमाणु ऊर्जा का एक अन्य दुष्प्रभाव इससे उत्पन्न होने वाले परमाणु अपशिष्ट की मात्र है। परमाणु अपशिष्ट का जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ सकता है, और आनुवंशिक समस्याएँ पैदा कर सकता है।