न्यूनतम समर्थन मूल्य(MSP): मुद्दे और चुनौतियाँ

न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी, किसी फसल के लिए निर्धारित वो न्यूनतम कीमत है जिस पर सरकार, किसानों से उनकी उपज खरीदती है ताकि किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम उचित मूल्य मिलता रहे, जिससे उन्हें हानि न उठानी पड़े। , भारत में एमएसपी की अवधारणा को लक्ष्मीकांत झा समिति की सिफारिशों पर 1965 में लागू किया गया था। यह ‘कृषि लागत और मूल्य आयोग’ की सिफारिश पर जारी किया जाता है

महत्व

  • यह किसानों को पर्याप्त पारिश्रमिक प्रदान करने में सहायता करता है,
  • बफर स्टॉक को खाद्यान्न आपूर्ति प्रदान करता है
  • पीडीएस और अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम का समर्थन करता है।
  • एमएसपी से संबंधित कृषि फसलों की कीमतों में स्थरीकरण आता है।
  • एमएसपी के माध्यम से भारत खाद्यान्न उत्पादन में आत्मपूर्णता (Self sufficiency) की स्थिति को प्राप्त कर पाया है।
  • सामाजिक न्याय के कदम के रूप में भी देखा जा सकता है। इसके माध्यम से निर्धन किसानों की सहायता की जा सकती है।

चुनौतियाँ:

  • 23 फसलों के लिये MSP की आधिकारिक घोषणा के विपरीत, ज्यादातर केवल दो—चावल और गेहूँ की खरीद की जाती है क्योंकि इन्हीं दोनों खाद्यान्नों का वितरण NFSA के तहत किया जाता है।
  • इसके कारण किसान अन्य फसल एवं बागवानी उत्पादों की खेती के लिये हतोत्साहित होते हैं।
  • पंजाब और हरियाणा जैसे अधिक गेहूँ और चावल उत्पादन वाले राज्यों को एमएसपी व्यवस्था से सबसे अधिक लाभ उठाते है।
  • जागरूकता की कमी के कारण देश में मात्र 6% किसान ही MSP का लाभ प्राप्त करते हैं।
  • MSP-आधारित खरीद प्रणाली मध्यस्थों/बिचौलियों, कमीशन एजेंटों और APMC अधिकारियों पर निर्भर है, जिसे छोटे किसान नकारात्मक रूप से प्रभावित हैं।
  • नीति आयोग ने एमएसपी के कमियों को दूर करने के लिए निम्नलिखित तीन योजनाओं का सुझाव दिया है-
    • बाजार आश्वासन योजना (एमएएस): इस योजना के तहत, यदि बिक्री मूल्य, मॉडल कीमत से कम है, तो किसानों को कुछ शर्तों और सीमाओं के साथ एमएसपी और वास्तविक मूल्य के बीच अंतर का मुआवजा दिया जाएगा
    • मूल्य की कमी भुगतान योजना (PDPS) के तहत, किसानों को चुनिंदा फसलों के लिए सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और उनके वास्तविक बाजार मूल्यों के बीच के अंतर के लिए पारिश्रमिक देने का प्रस्ताव है।
    • निजी खरीद और स्टॉकिस्ट योजना (PPPS): इस योजना के तहत खरीद कार्यों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रायोगिक तौर पर संचालित किया जाएगा। राज्यों के पास निजी स्टॉकिस्टों को शामिल करते हुए चयनित जिलों/APMC में पायलट आधार पर योजना को लागू करने का विकल्प होगा