सीमा विवादः भारत और चीन के बीच करीब 4,000 किलोमीटर की सीमा लगती है। चीन के साथ भारत और भूटान दो ऐसे मुल्क हैं, जो उलझे हुए हैं। भूटान में डोकलाम क्षेत्र को लेकर विवाद है तो वहीं भारत में लद्दाख से सटे अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश को लेकर विवाद जारी है।
दलाई लामा और तिब्बतः ड्रैगन देश को इस बात से भी चिढ़ है कि भारत, तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को शरण दिए हुए है। चीन ने तिब्बत में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण राजमार्ग के निर्माण कार्य को पूर्ण कर लिया है। इस राजमार्ग के निर्माण से चीन सुगमतापूर्वक भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश की सीमा के निकट स्थित सुदूरवर्ती क्षेत्रें तक (अर्थात् दोनों राष्ट्रों के मध्य विवादित क्षेत्रें तक) पहुंच प्राप्त कर सकता है।
तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (Tibet Autonomous Region- TAR) 1950 के दशक में तिब्बत पर आधिपत्य के तुरंत पश्चात, चीन ने तिब्बत को कई भू-खंडों में विभाजित कर दिया था। जिस भाग को चीन द्वारा तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) के रूप में संदर्भित किया जाता है, वह तिब्बत के पठार का लगभग आधा हिस्सा ही है। TAR प्रांतीय स्तर चीन के पांच स्वायत्त क्षेत्रें में से एक है, जिसे क्षेत्रीय नृजातीय स्वायत्तता के आधार पर संचालित किया जाता है।
यारलुंग जैगंबो नदी पर बांध निर्माणः चीन द्वारा भारत, नेपाल और तिब्बत के ट्राई-जंक्शन के निकट तिब्बत में यारलुंग जांगबो (ब्रह्मपुत्र) नदी पर नए बांध का निर्माण कर रहा है, जो भारत के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। चीन का यह बांध वर्ष 2021 में यारलुंग जांगबो के निम्न क्षेत्र में 70 गीगावाट विद्युत उत्पादन के लिए एक बड़े बांध के निर्माण की योजना की घोषणा के बाद उठाया गया है। यह चीन के ‘थ्री गोर्जेज बाँध’ द्वारा उत्पादित विद्युत क्षमता से करीब तीन गुना अधिक है, जो स्थापित क्षमता के मामले में सबसे बड़ा जलविद्युत संयंत्र है।
यारलुंग जांगबो ब्रह्मपुत्र नदी ब्रह्मपुत्र नदी को चीन में यारलुंग त्संग्पो के नाम से जाना जाता है।
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स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्सः ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ भारत को घेरने के लिहाज से चीन द्वारा अपनाई गई एक अघोषित नीति है। इसमें चीन द्वारा भारत के समुद्री पहुंच के आसपास के बंदरगाहों और नौसेना ठिकानों का निर्माण किया जाना शामिल है।
नदी जल विवादः ब्रह्मपुत्र नदी के जल के बंटवारे को लेकर भी भारत और चीन के बीच में विवाद है। चीन द्वारा ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी इलाके में कई बांधों का निर्माण किया गया है। हालांकि जल बंटवारे को लेकर भारत और चीन के बीच में कोई औपचारिक संधि नहीं हुई है।
भारत को एनएसजी का सदस्य बनने से रोकनाः परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य बनने में भी चीन भारत की मंसूबों पर पानी फेर रहा है। नई दिल्ली ने जून 2016 में इस मामले को जोरदार तरीके से उठाया था। तत्कालीन विदेश सचिव रहे एस. जयशंकर ने एनएसजी के प्रमुख सदस्य देशों के समर्थन के लिए उस समय सियोल की यात्रा भी की थी।
भारत के खिलाफ आतंकवाद का समर्थनः एशिया में, चीन भारत को अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है और साथ ही OBOR प्रॉजेक्ट में चीन को पाक की जरूरत है।
पाकिस्तान-चीन गठजोड़ः पाकिस्तान में चीन ने बड़े पैमाने पर निवेश कर रखा है। चीन-पाक आर्थिक गलियारा और वन बेल्ट वन रोड परियोजना कहीं न कहीं भारत को घेरने की नीति पर आधारित है।
व्यापार असंतुलनः वैसे तो चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन दोनों देशों के बीच एक बड़ा व्यापारिक असंतुलन भी है और भारत इस व्यापारिक घाटे का बुरी तरह शिकार है।
बेल्ट एंड रोड इनिसिएटिवः चीन की सालों पुरानी ‘सिल्क रोड’ से जुड़ा हुआ है। इसी कारण इसे ‘न्यू सिल्क रोड’ और One Belt One Road (OBOR) नाम से भी जाना जाता है। BRI परियोजना की शुरुआत चीन ने साल 2013 में की थी। इस परियोजना में एशिया, अफ्रीका और यूरोप के कई बड़े देश शामिल हैं। इसका उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, गल्फ कंट्रीज, अफ्रीका और यूरोप के देशों को सड़क और समुद्री रास्ते से जोड़ना है। भारत, चीन की इस परियोजना का शुरू से ही विरोध करता है।