राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप

गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2019: यह विधेयक गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 में संशोधन करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत जांच अधिकारी को उन संपत्तियों को जब्त करने से पहले पुलिस महानिदेशालय से मंजूरी लेनी होती है, जो आतंकवाद से संबंधित हो सकती हैं।

  • विधेयक के अनुसार, अगर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के अधिकारी द्वारा जांच की जा रही है तो ऐसी संपत्ति की जब्ती से पहले NIA के महानिदेशक से पूर्व मंजूरी लेनी होगी।
  • गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम का उद्देश्य भारत में गैरकानूनी गतिविधियों के संघों की रोकथाम करने के साथ ही भारत की अखंडता और संप्रभुता के खिलाफ निर्देशित गतिविधियों से निपटने के लिए शक्तियां उपलब्ध कराना था।

आतंरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (मीसा) 1971: इसे राजनीतिक विरोधियों, मजदूर संघों के विरुद्ध आपातकाल के दौरान प्रयोग में लाया गया था, जो सरकार को चुनौती दे रहे थे। 1978 के 44वें संविधान संशोधन के तहत इसे समाप्त कर दिया गया।

प्रिवेंटिव डिटेंसन अधिनियम 1950: यह राष्ट्र विरोधी तत्वों को राष्ट्र की सुरक्षा और रक्षा के प्रति शत्रुतापूर्ण कार्य करने से रोकता है, इसे 1969 में समाप्त कर दिया गया। इसमें पुलिस किसी भी व्यक्ति को इस शक पर गरिफ्रतार कर सकती है कि वह कोई अपराध कर सकता है या उसमें शामिल हो सकता है।

इस एक्ट की सबसे खास बात तो यह है कि इसमें पुलिस हिरासत में या गिरफ्रतार किये गए व्यक्ति को कारण बताने की जरूरत नहीं पड़ती और 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की भी बाध्यता नहीं होती।

44वां संविधान संशोधन अधिनियमः वर्ष 1978 के 44वें संशोधन अधिनियम ने एक सलाहकार बोर्ड की राय प्राप्त किये बिना नजरबंदी की अवधि को तीन से घटाकर दो महीने कर दिया है। हालांकि यह प्रावधान अभी तक लागू नहीं किया गया है, इसलिये तीन महीने की मूल अवधि अभी भी जारी है।