महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय व पहल

सीबीआई बनाम अनूप जैन कुलकर्णी 1992: उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 22 खंड 2 के अधीन गिरफ्रतारी के मामले में विस्तृत मार्गदर्शन सिद्धांत प्रस्तुत किया। उच्चतम न्यायालय ने यह अभि्ानिर्धारित किया कि जब किसी व्यक्ति को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 57 के अधीन गिरफ्रतार किया जाता है तो उसे 24 घंटे के अधीन नजदीक के मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

  • न्यायिक मजिस्ट्रेट उसे 15 दिन तक पुलिस की न्यायिक अभिरक्षा में रऽने का आदेश दे सकता है। 15 दिन की समाप्ति के पश्चात उसे केवल न्यायिक अभिरक्षा में ही रखा जा सकता है।

अशोक कुमार बनाम दिल्ली प्रशासन 1982: इस मामले में कहा गया था कि निवारक निरोध का प्रावधान समाज को सुरक्षा प्रदान करने के लिए किया गया है। इस कानून का उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके किए गए कृत्य के लिए दंडित करना नहीं है, बल्कि उसे किसी कृत्य को करने से पहले उसे अवरुद्ध करना और ऐसा करने से उसे रोक देना है।

राम मनोहर लोहिया बनाम बिहार राज्य 1966: इस मामले में शीर्ष न्यायालय ने रेखांकित किया था कि केवल सबसे गंभीर कृत्यों के लिए ही निवारक निरोध को उचित ठहराया जा सकता है।