आज भारतीय इतिहास के पुनर्लेऽन की आवश्यकता है, क्योंकि मुख्यधारा का भारतीय इतिहास लेखन बहुत ही संकीर्ण और तथ्यों के बजाय अनावश्यक वाद-विवाद पर ज्यादा टिका हुआ है, लेकिन इतिहास के पुनर्लेखन में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान देना आवश्यक है।
इतिहास लेखन के साथ पहली परेशानी परिप्रेक्ष्य की है। इतिहास को जनमानस के दृष्टिकोण से लिखा जाना चाहिए, न कि शासकों के। यह एक त्रासदी है कि भारत के इतिहास को विदेशी राजवंशों के इतिहास के रूप में लिखा गया और यहां के लोग मात्रा फुटनोट्स में रह गए। विशेष रूप से मध्ययुगीन युग इतिहास तुर्क, अफगान, मुगलों आदि की राजनीति और युद्धों के बारे में है, न कि उनके विरुद्ध भारतीयों के प्रतिरोध के बारे में।
दूसरा मुद्दा इतिहास के कालक्रम का है, जो हड़प्पा युग से लेकर वैदिक युग और फिर मौर्यवंश के अधीन प्रथम साम्राज्य के उदय तक आता है और फिर गुप्त साम्राज्य और हर्षवर्द्धन से होते हुए दिल्ली सल्तनत, मुगलों और अंग्रेजों तक पहुंच जाता है। इसमें भारत की राजनीतिक और भौगोलिक विविधता की अनदेखी है तथा उत्तर भारत का दबदबा है। दक्षिण में चोल, सातवाहनों और यहां तक कि विजयनगर साम्राज्य को काफी हद तक अनदेखा किया गया है। इतिहास में चालुक्यों, गुर्जर-प्रतिहारों, कश्मीरी राजवंशों, काकतीय, राष्ट्रकूटों, पाल साम्राज्य, ओडिशा के गंगा और असम के अहोमों का भी ज्यादा उल्लेख नहीं है। इन राजवंशों और साम्राज्यों ने सदियों तक यूरोपीय देशों से बड़े क्षेत्रों पर शासन किया, लेकिन विडंबना देखिए कि अधिकतर भारतीय इनका नाम तक नहीं जानते। पाठ्यपुस्तकों में पूर्वोत्तर के इतिहास का उल्लेख न होना दुर्भाग्यपूर्ण है।
इतिहास लेखन में दलित-आदिवासी जातियों और जनजातियों के इतिहास का अभाव तीसरा मुद्दा है। अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां भारतीय आबादी का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा हैं और किसी भी इतिहास लेखन को बिना उनकी उपस्थिति के प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। शूद्र और यहां तक कि दलित जातियों से आने वाले शासकों की समृद्ध पंक्ति भी पाठ्यपुस्तकों में अनुपस्थिति है। राजा सुहेलदेव जैसे राजाओं का भी मुख्यधारा के इतिहास में कोई स्थान नहीं है। आदिवासी समाज, राजनीति, आध्यात्मिक परंपराओं, आदिवासी राज्यों और संस्कृति के बारे में छात्रा शायद ही कुछ पढ़ते हों।
चौथी समस्या यह है कि भारत का इतिहास न केवल त्रुटिपूर्ण परिप्रेक्ष्य से लिखा गया है, बल्कि वह बेहद कमजोर धरातल पर आधारित है। भारतीय इतिहास लेखन में वैचारिक बहसें और विचारधारा की लड़ाई अधिक हैं और पुरातत्व, तथ्य एवं डाटा बहुत कम हैं। हम संस्कृत, तमिल, कन्नड़, पाली और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों के सैकड़ों ग्रंथों के आधिकारिक अनुवाद करने में भी विफल रहे हैं।
पांचवां मुद्दा यह है कि इतिहास केवल राजनीतिक इतिहास से कहीं अधिक होता है। इतिहास लेखन में पर्यावरणीय इतिहास, सामाजिक इतिहास, आर्थिक इतिहास, प्रौद्योगिकी का इतिहास और ज्ञान, कला एवं साहित्य, उत्पादन प्रक्रियाओं, उद्योग आदि विषयों को अधिक से अधिक वरीयता देने की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता है कि भारत के इतिहास लेखन को गंभीरता से लिया जाए। इसके लिए सर्वप्रथम पुरातत्व अनुसंधान में बड़े स्तर पर निवेश करना होगा। हम चाहे जितना प्राचीन सभ्यता होने का दंभ भरें, लेकिन हकीकत यह है कि इसकी प्राचीनता को सिद्ध करने के लिए पुरातत्व और अन्य साक्ष्यों का अभाव है।