काशी - तमिल संगमम

‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के भाग के रूप में और एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना को बनाए रखने के लिये भारत सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश के वाराणसी में ‘काशी तमिल संगमम’ का आयोजन किया गया।

  • एक माह (16 नवंबर से 19 दिसंबर) तक चले काशी-तमिल संगमम का उद्देश्य ज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं (उत्तर एवं दक्षिण की) को करीब लाना व हमारी साझा विरासत की समझ विकसित करने के साथ-साथ इन क्षेत्रों के लोगों के बीच संबंध को और मजबूत करना है।
  • ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, 2300 साल पहले भी तमिलनाडु के नगर-ग्रामों की गलियाँ काशी की महिमा बखानने वाले गीतों से गूँजती थीं। ऐतिहासिक तथ्यों का साक्ष्य लें तो कोई 2000 वर्ष पहले से ही तमिलजनों की काशी यात्रा का क्रम प्रारंभ हो चुका था।
  • ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, प्रथम तमिल संगम मदुरै में हुआ था, जो पांड्या राजाओं की राजधानी थी और उस समय अगस्त्य, शिव, मुरुगवेल आदि विद्वानों ने इसमें हिस्सा लिया था। इसके बाद द्वितीय संगम का आयोजन स्थल कपातपुरम था। भारतीय प्राच्य इतिहासकारों के अनुसार, कपातपुरम का संगम ही इतिहास का सबसे बड़ा संगम था और उसमें उत्तर एवं दक्षिण के विद्वानों ने संगति की थी।

सांस्कृतिक महत्त्वः 15वीं शताब्दी में मदुरै के आसपास के क्षेत्र पर शासन करने वाले राजा पराक्रम पांड्या भगवान शिव का एक मंदिर बनाना चाहते थे और उन्होंने एक शिवलिंग को वापस लाने के लिये काशी (उत्तर प्रदेश) की यात्रा की।

  • वहां से लौटते समय वे रास्ते में एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिये रुके और फिर जब उन्होंने यात्रा हेतु आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग ले जा रही गाय ने आगे बढ़ने से बिल्कुल मना कर दिया।
  • पराक्रम पांड्या ने इसे भगवान की इच्छा समझा और शिवलिंग को वहीं स्थापित कर दिया, जिसे बाद में शिवकाशी, तमिलनाडु के नाम से जाना जाने लगा।
  • जो भक्त काशी नहीं जा सकते थे, उनके लिये पांड्यों ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था, जो आज दक्षिण-पश्चिमी तमिलनाडु में तेनकासी के नाम से जाना जाता है और यह केरल के साथ इस राज्य की सीमा के करीब है।