महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

डॉ- जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल बनाम मुख्यमंत्री (2021): इंद्रा साहनी वाद के निर्णय के बावजूद कई राज्यों की ओर से आरक्षण के दायरे का विस्तार कर नियमों का उल्लंघन किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल इंद्रा साहनी मामले में दिये गए निर्णय की पुष्टि की, बल्कि आरक्षण की सीमा के उल्लंघन का हवाला देते हुए अधिनियम की धारा 4(1)(A) और धारा 4(1)(B) को भी रद्द कर दिया, जिसमें मराठों के लिये शैक्षणिक संस्थानों में 12% और सार्वजनिक रोजगार में 13% आरक्षण का प्रावधान किया गया था।

मुकेश कुमार और अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य तथा अन्य 2020: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) या अनुच्छेद 16(4A) के तहत आरक्षण या पदोन्नति का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि वे परिस्थितियों के अनुसार आरक्षण प्रदान करने के प्रावधानों को सक्षम करते हैं।

जरनैल सिंह वाद 2018: सर्वोच्च न्यायालय ने एम. नागराज वाद 2006 जो पदोन्नति से सम्बन्धित था, के फैसले को एक उच्च पीठ को संदर्भित करने से इनकार कर दिया तथा निर्णय को बदल कर कहा राज्यों को SC/ST समुदायों के पिछड़ेपन का मात्रत्मक डेटा प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है।

एम. नागराज वाद 2006: यह पदोन्नति में आरक्षण से सम्बन्धित वाद था, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने पदोन्नति हेतु अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के आरक्षण में क्रीमी लेयर की अवधारणा को लागू करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने इंद्रा साहनी मामले (1992) में अपने पूर्व निर्णय को बदल दिया तथा एससी/एसटी (जो ओबीसी पर लागू था, को क्रीमी लेयर की अवधारणा से बाहर कर दिया था।

पी. ए. इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2005: इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया था कि राज्य पेशेवर कॉलेजों समेत सहायता प्राप्त कॉलेजों में अपनी आरक्षण नीति को अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक पर नहीं थोप सकता है तथा निजी शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन लाया गया।