मेवाड़ शैली: मेवाड़ी चित्रकला की अवधि साहिबदीन के साहित्यिक ग्रंथों – रसिकप्रिया, रामायण और भागवत पुराण के चित्रण पर केंद्रित है।
किशनगढ़ शैली: किशनगढ़ की पेंटिंग सबसे रोमांटिक किंवदंतियों – सावंत सिंह और उनकी प्यारी बनी - ठनी, और जीवन व मिथकों, रोमांस व भक्ति के अंतर्संबंध से जुड़ी हैं।
बूंदी शैली: बूंदी और कोटा के जुड़वां राज्यों को सामूहिक रूप से हाडोती के रूप में जाना जाता है।
अंबर-जयपुर शैली: इसे ‘धुंदर’ स्कूल भी कहा जाता है और उनके शुरुआती प्रमाण राजस्थान के बैराट में दीवार चित्रों से मिलते हैं।
मारवाड़ शैली: मारवाड़ में चित्रकला के प्रारम्भिक उदाहरणों में से एक 1623 ई. में वीरजी नाम के एक कलाकार द्वारा मारवाड़ में पाली में चित्रित की गई रागमाला की एक शृंखला है जो कुमार संग्राम सिंह के संग्रह में है ।
बसोली शैली: पहाड़ी क्षेत्र में चित्रकला का प्रारम्भिक केन्द्र बसोली था, जहां राजा कृपाल पाल के संरक्षणाधीन एक कलाकार जिसे देवीदास नाम दिया गया था, 1694 ईंसवी सन् में रसमंजरी चित्रों के रूप में लघु चित्रकला का निष्पादन किया था।
गुलेर शैली: बसोली शैली के अन्तिम चरण के पश्चात चित्रकलाओं के जम्मू समूह का उद्भव हुआ जिसमें मूल रूप से गुलेर से संबंध रखने वाले और जसरोटा में बस जाने वाले एक कलाकार नैनसुख द्वारा जसरोटा (जम्मू् के निकट एक छोटा स्थान) के राजा बलवन्त सिंह की प्रतिकृतियां शामिल हैं ।
कांगड़ा स्कूल: कांगड़ा शैली का विकास गुलेर शैली से हुआ । इसमें गुलेर शैली की आरेखण में कोमलता और प्रकृतिवाद की गुणवत्ता जैसी प्रमुख विशेषताएं निहित हैं । चित्रकला के इस समूह को कांगड़ा शैली का नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ये कांगड़ा के राजा संसार चन्द की प्रतिकृति की शैली के समान है ।
कांगड़ा शैली की चित्रकलाओं का श्रेय मुख्य रूप से नैनसुख परिवार को जाता है।