ऊपरी पुरापाषाण काल : पूर्व-ऐतिहासिक चित्रों को आम तौर पर चट्टानों पर बनाया जाता था और इन चट्टानों पर किये गए चित्रकारी को ‘पेट्रोग्लिफ्स’ कहा जाता था।
मध्यपाषाण काल : ऊपरी पुरापाषाण काल की तुलना में, इस अवधि के दौरान चित्रों का आकार भी छोटा हो गया।
ताम्रपाषाण काल : इस अवधि में हरे और पीले रंग का उपयोग करने वाले चित्रों की संख्या में वृद्धि देखी गई।
भित्ति चित्रकला : वास्तविक भित्तिचित्र पद्धति में दीवार की सतह जब गीली होती है तब चित्र बनाए जाते हैं ताकि रंगद्रव्य दीवार की सतह में अन्दर गहराई तक चले जाएं । जबकि भारतीय चित्रकला के अधिकांश मामलों में चित्रकला की जिस अन्य पद्धति का पालन किया गया था उसे सांसारिक या भित्तिचित्र के रूप में जाना जाता है । यह चूने के पलस्तर से की गई सतह पर चित्रकला करने की एक पद्धति है जिसे पहले सूखने दिया जाता है और फिर चूने के ताजे पानी से भिगोया जाता है । इस प्रकार से प्राप्त सतह पर कलाकार अपनी रचना का सृजन करता है । भारत में भित्ति चित्रों के उदाहरण निम्वत हैं
लघु चित्रकारी: लघु चित्रकारी (Miniature painting) भारतीय शास्त्रीय परम्परा के अनुसार बनाई गई चित्रकारी शिल्प है। “समरांगण सूत्रधार” नामक वास्तुशास्त्र में इसका विस्तृत रूप से उल्लेख मिलता है। कागज पर लघु चित्रकारी करने के लिए सबसे पहले आधार रंग बनाया जाता है। इसके लिए कागज पर खड़िया मिट्टी (चॉक मिट्टी) के चार से पांच स्तर चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इसके बाद चित्रकारी में रंगों को समतल करने के लिए दबाव के साथ उसे रगड़ा जाता है। पृष्ठभूमि बनाने के बाद पोशाक की ओर ध्यान दिया जाता है। अंत में आभूषणों और चेहरे सहित अन्य अंगों की रचना की जाती है। पुरी कलाकृति निर्मित हो जाने के बाद उनमें रंग भरे जाते हैं।
पाल शैली: भारत में लघु चित्रकला के सबसे प्राचीन उदाहरण पूर्व भारत के पाल वंश के अधीन निष्पादित बौद्ध धार्मिक पाठों और ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी ईसवी सन् के दौरान पश्चिम भारत में निष्पादित जैन पाठों के सचित्र उदाहरणों के रूप में विद्यमान हैं।पाल द्वारा सचित्र पाण्डुलिपियों के जीवित उदाहरणों में से अधिकांश का संबंध बौद्ध मत की वज्रयान शाखा से था।
पश्चिमी भारतीय शैली (बारहवीं से सोलहवीं शताब्दी) : चित्रकला की पश्चिम भारतीय शैली गुजरात, राजस्थान और मालवा क्षेत्र में प्रचलित थी । पश्चिम भारत में कलात्मक क्रियाकलापों का प्रेरक बल जैनवाद था। जैनवाद को चालुक्य वंश के राजाओं का संरक्षण प्राप्त था जिन्हों ने 961 ईसवी सन् से लेकर तेरहवीं शताब्दी के अन्त तक गुजरात और राजस्थान के कुछ भागों तथा मालवा पर शासन किया।
मुगल काल की लघु चित्रकारी : मुगल साम्राज्य की स्थापना हो जाने के पश्चात् चित्रकला की मुगल शैली की शुरुआत सम्राट अकबर के शासनकाल में 1560 ईसवी सन् में हुआ था । उनके शासन के प्रारम्भ में दो फारसी अध्यापकों मीर सयद अली और अब्दुतल समद खान की देखरेख में एक शिल्पशाला की स्थापना की गई थी, जिन्हें मूल रूप से सम्राट अकबर के पिता हुमायूं ने नौकरी दी थी। मुगल शैली का विकास चित्रकला की स्वदेशी भारतीय शैली और फारसी चित्रकला की सफाविद शैली के एक उचित संश्लेषण के परिणामस्वरूप हुआ था।