सिन्धु कालीन स्थापत्य कला: सिंधु स्थापत्य कला की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है, सुनियोजित नगर-निर्माण योजना। इसका आधार था- प्रमुख सड़कें। ये सड़कें उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम की ओर समकोण पर काटती थी।
मुद्रा कलाः इस काल में सेलखड़ी की मुहरें बनाई जाती थीं। खुदाई में मुहरें ढालने के सांचे और ठप्पे मिले हैं। उन पर विभिन्न पशु-पक्षियों की आकृतियां चित्रित है। उनमें से पशुओं से घिरे हुए योगीश्वर शिव की मुद्रा उल्लेखनीय है।
मृद्भांड कलाः सिंधु सभ्यता के नगरों में मिट्टी, अभ्रक की हंड़िया, प्याले तथा तश्तरियां मिले हैं। मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा के अधिकांश बर्तन हल्के रंगों से रंगे हैं, कुछ थोड़े से काले एवं भूरे रंग के बर्तन भी मिले हैं।
स्थापत्य कला के प्राचीन स्कूल
मौर्यकालीन स्थापत्य कला: भारतीय स्थापत्य के एक महत्त्वपूर्ण चरण की शुरुआत मौर्यों के शासन के साथ होती है। मौर्यों की भौतिक समृद्धि तथा नई धार्मिक चेतना ने भारत को हर क्षेत्र में सफलता दिलवाई। यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटोर का राजदूत मेगास्थनीज मौर्यों के दरबार में आया। मेगास्थनीज ने चन्द्रगुप्त मौर्य के महल को स्थापत्य की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। चंद्रगुप्त मौर्य का महल विशाल था और लकड़ी का बना हुआ था।
स्थापत्य कलाः मेगास्थनीज के अनुसार गंगा और सोन नदी के संगम पर बसे पाटलिपुत्र नगर का आकार एक समानांतर चतुर्भुज के समान था। नगर चारों ओर से काष्ठ की बनी दीवार से घिरा था, जिसमें 570 बुर्ज तथा चौंसठ द्वार थे।
शैल गुहाएं: मौर्य सम्राट अशोक तथा उसके पौत्र दशरथ की सात शैल गुहाएं मिली है, जिनमें चार बराबर पहाड़ी में हैं और तीन नागार्जुनी पहाड़ी में। सामूहिक रूप से इन्हें ‘सतघर’ कहते हैं। इन गुहाओं में बराबर पहाड़ी में स्थित लोमेश ऋषि तथा सुदामा गुहाएं विशेष उल्लेखनीय हैं। नागार्जुनी गुहाओं में गोपी गुहा सबसे विशाल है।
प्रस्तर स्तंभः मौर्य काल की सर्वोत्कृष्ट कृतियां अशोक के एकाश्मक प्रस्तर स्तंभ है। ये स्तंभ संकिसा, निग्गलिसागर (लुम्बिनी), वैशाली, सारनाथ, सांची, कोसल, रामपुरवा, प्रयाग, लौरिया नंदनगढ़, टोपरा इत्यादि स्थानों से प्राप्त हुए हैं। इन स्तंभों की मुख्य विशेषता चमकीला पॉलिश है।
एकाश्म वेदिकाः सारनाथ में अशोक के स्तूप के चारों ओर एक पाषाण वेदिका प्राप्त हुई है।
पशु आकृतियां: स्तंभों के शीर्ष की पशु मूर्तियों और धौली (उड़ीसा) की हाथी की मूर्ति का विशेष महत्व है।
लोक कलाः लोक कला की परंपरा उत्तरी भारत, बिहार तथा उड़ीसा से मिले स्वतंत्र रूप से स्थापित मूर्तियों में दृष्टिगत होती है। इनमें से अधिकांशतः यक्ष-यक्षिणियों की है, जो अपने साथ विशिष्ट अभिघटन कला की परंपरा संजोये हुए है। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय परखम (मथुरा जिला) के निकट बड़ौदा से प्राप्त विशाल यक्ष मूर्ति एवं दूसरी परखम से ही प्राप्त यक्ष मूर्ति है।
मौर्योत्तर स्थापत्य कला: शुंग-सातवाहन काल में कला का काफी विकास हुआ। इस काल के स्थापत्य कला के प्रमुख उपांग हैः गिरि गुफा एवं स्तूप।
गिरि गुफाएं: इस काल में पत्थर की चट्टानों को काटकर गुहाओं का निर्माण किया गया।
गुप्तकालीन स्थापत्य कला: इस काल की कला की दो प्रमुख विशेषताएं प्रतीत होती है। प्रथम, विदेशी प्रभाव से मुक्त होकर इस काल में मौलिक रूप से भारतीय कला का विकास हुआ। दूसरा, कलाकारों ने सौन्दर्य प्रदर्शन और अलंकरण में विदेशी के बदले भारतीय अभिप्रायों को स्थान दिया।
स्थापत्य कलाः गुप्तकालीन स्थापत्य कला के पांच रूप हैं: गुहावास्तु, मंदिर, स्तूप, विहार और स्तंभ।
गुहावास्तुः ब्रा“मण धर्म के प्राचीनतम् गुहा मंदिर गुप्त काल में निर्मित किए गए। ये मध्य प्रदेश के उदयगिरि की पहाड़ियों में हैं, जिनका निर्माण चट्टानों को काटकर किया गया था। इसके अतिरिक्त अजंता एलोरा, औरंगाबाद एवं बाघ की कुछ गुफाएं भी इस काल की है। अजन्ता की 29 गुफाओं में सिर्फ दो, सं. 19 और 26 का संबंध इस काल से है।
मंदिरः मंदिरों के अवशेषों से वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलते हैं। वास्तव में मंदिरों का निर्माण गुप्तकाल में ही प्रारंभ हुआ। मंदिरों (वैष्णव) का निर्माण सामान्यतः एक ऊंचे चबूतरे पर होता था, जिन पर चढ़ने के लिए चारों ओर से सीढ़ियां बनायी जाती थी। सबसे भीतर स्थित ‘गर्भगृह’ में मूर्ति की स्थापना की जाती थी।
स्तूपः स्थापत्य कला के रूप में स्तूपों का निर्माण प्राचीनकाल से होता रहा है। गुप्त राजाओं के युग में भी दो बौद्ध स्तूपों- सारनाथ का धामेख स्तूप और राजगृह स्थित जरासंघ की बैठक का निर्माण किया गया।
बिहारः बिहार में बौद्ध भिक्षु निवास करते थे। गुप्तकालीन विहारों के ध्वंसावशेष सारनाथ और नालंदा से मिले हैं। सारनाथ के विहार नं. 3 तथा 4 में प्राप्त सामग्रियों एवं गवाक्ष से इस बात की पुष्टि होती है।
स्तंभः गुप्तकालीन स्तंभ चार रूपों में उपलब्ध हैः कीर्ति-स्तंभ, ध्वज-स्तंभ, स्मारक-स्तंभ और सीमा-स्तंभ। इलाहाबाद का अशोक स्तंभ समुद्रगुप्त की प्रशस्ति या कीर्ति का वर्णन करता है। मेहरोली का लौह स्तंभ गुप्त काल के स्तंभ निर्माण कला का सुंदर उदाहरण है।
मूर्तिकलाः गुप्तकाल में मूर्तिकला का भी काफी विकास हुआ। इस काल की अधिकांश मूर्तियां हिन्दू देवी-देवताओं से संबंधित हैं। गुप्तकाल की तीन बुद्ध मूर्तियां महत्वपूर्ण हैं: सारनाथ की बुद्ध मूर्ति, मथुरा की बुद्ध मूर्ति तथा सुल्तानगंज की बुद्ध मूर्ति। इनमें से सारनाथ स्थित बुद्ध मूर्ति ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ मुद्रा में है।
चालुक्य स्थापत्य कलाः महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एलोरा नामक पहाड़ी पर हिन्दू गुहा मंदिर प्राप्त होते हैं। इनका निर्माण राष्ट्रकूट राजाओं के शासन काल (7वीं तथा 8वीं शदी) में किया गया। एलोरा का ‘कैलाश मंदिर’ अपनी उत्कृष्टतम शैली के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसका निर्माण कृष्ण प्रथम ने किया था।
स्थापत्य कलाः बादामी के चालुक्यों ने अपने शासनकाल के दौरान स्थापत्य कला के क्षेत्र में काफी संख्या में मंदिर निर्माण करवाया। बादामी में पाषाण को काटकर चार स्तंभयुक्त मंडप बनाये गये हैं। इनमें से तीन हिन्दू एवं एक जैन धर्म से संबंधित है। ऐहोल को ‘मंदिरों का नगर’ कहा जाता है। अधिकांश मंदिर विष्णु तथा शिव के हैं। ऐहोल के हिन्दू गुहा मंदिरों में सबसे सुंदर ‘लाड़खान’ का सूर्य मंदिर है। उत्तरी शैली में बना ‘पापनाथ का मंदिर’ और दक्षिणी शैली में निर्मित ‘विरूपाक्ष’ एवं ‘संगमेश्वर मंदिर’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
पल्लव स्थापत्य कला : पल्लव शासकों ने गुहा मंदिरों (मंडप) एवं एकाश्मक मंदिरों का निर्माण करवाया। इस काल की शैलियां निम्नलिखित हैः
चोल स्थापत्य कला : चोल कालीन प्रारंभिक मंदिरों में तिरुकट्टलाई का सुन्दरेश्वर मंदिर, भरतमलाई का विजयालय चोलेश्वर मंदिर प्रसिद्ध है। इसमें चोलेश्वर मंदिर सर्वाधिक उत्कृष्ट है। तंजावुर में स्थित राजराज प्रथम द्वारा निर्मित चोल स्थापत्य कला का चरमोत्कर्ष राजराजेश्वर अथवा वृहदेश्वर मंदिर को माना जाता है।
होयसल स्थापत्य कला : होयसल राजवंश का संबंध कर्नाटक से था। हेलेबिड तथा बेलुर उनकी गतिविधियों के केन्द्र के रूप में उभरे। यहां के मंदिरों में उत्तरी तथा दक्षिणी शैलियों का सम्मिश्रित प्रभाव है। विमान, शिखर और गर्भगृह इन मंदिरों की विशेषताएं हैं।
राजपूतकालीन स्थापत्य कला