पट्टचित्र पेंटिंग

जून, 2022 में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने वेटिकन सिटी में संत पोप फ्रांसिस से मुलाकात की और उन्हें एक पट्टचित्र पेंटिंग (Pattachitra painting) भेंट की।

प्रमुखबिंदु : पट्टचित्र शैली की पेंटिंग ओडिशा के सबसे पुराने और सबसे लोकप्रिय कला रूपों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि इस चित्रशैली की उत्पत्ति 12वीं शताब्दी में हुई थी।

  • पट्टचित्र कपड़े के एक टुकड़े पर किया जाने वाला एक चित्र है। पट्टाचित्र का नाम संस्कृत के शब्द ‘पट्ट’ से बना है, जिसका अर्थ कैनवास (कपड़े के एक टुकड़े) से है।
  • यह चित्रशैली पूर्वी भारतीय राज्यों ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में विद्यमान है।
  • हालांकि इस चित्रशैली का केंद्र पुरी के आस-पास का क्षेत्र है। इसके लगभग सभी चित्रकार समुदाय पुरी जिले के एक छोटे से गाँव रघुराजपुर से ताल्लुक रखते हैं।

पट्टचित्र शैली की कलात्मक विलक्षणता

ये चित्रशैली हिंदू पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं और ये विशेष रूप से जगन्नाथ और वैष्णव संप्रदाय से प्रेरित है।इसका रूप श्री जगन्नाथ के पंथ और पुरी में मंदिर परंपराओं से निकटता से संबंधित है।

  • इन चित्रों में प्रयुक्त होने वाले सभी रंग प्राकृतिक होते हैं। रंग बनाने के लिए पेड़ के गोंद, सीप और कालिख आदि सामग्री का उपयोग किया जाता है। चित्रकारों द्वारा पारंपरिक तरीके से रंगों का निर्माण किया जाता है।
  • इस चित्र शैली में लोक और शास्त्रीय दोनों तत्वों का मिश्रण है, हालाँकि इसका झुकाव लोक रूपों की ओर अधिक है। इस चित्र शैली की पोशाक शैली में मुगल प्रभाव विद्यमान है।
  • धिया बढ़िया (जगन्नाथ के मंदिर का चित्रण), कृष्ण लीला (एक बच्चे के रूप में अपनी शक्तियों को प्रदर्शित करते हुए भगवान कृष्ण के रूप में जगन्नाथ का प्रदर्शन), दशावतार पट्टी (भगवान विष्णु के दस अवतार) आदि इस चित्रशैली के माध्यम से दर्शाए गए सबसे लोकप्रिय विषय हैं|