दीर्घोपयोगी विकास आयोग (CSD)

मिशनः सतत विकास के लिये बना डिविजन (Division for sustainable development, DSD) नेतृत्व प्रदान करता है एवं यह यूनाइटेड नेशन्स के सतत विकास पर बने सिस्टम के भीतर कुशलता का एक अधिकृत स्रोत है। यह दीर्घोपयोगी विकास के संयुत्तफ़ राष्ट्र आयोग (CSD) के लिये वास्तविक सचिवालय के तौर पर सतत विकास का प्रचार करता है एवं अन्तरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी सहयोग तथा क्षमता निर्माण प्रदान करता है।

संयुक्त राष्ट्र के एजेंडा 2030 में कुल 17 लक्ष्योंका निर्धारण किया गया था जो इस प्रकार से हैं:

  1. गरीबी के सभी रूपों की पूरे विश्व से समाप्ति।
  2. भूख समाप्ति, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा।
  3. सभी उम्र के लोगों में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा।
  4. सस्ती, विश्वसनीय, टिकाऊ और आधुनिक ऊर्जा तक पहुँच सुनिश्चित करना।
  5. सभी के लिये निरंतर समावेशी और सतत आर्थिक विकास, पूर्ण और उत्पादक रोजगार और सभ्य काम को बढ़ावा देना।
  6. लचीली बुनियादी ढांचे, समावेशी और सतत औद्योगीकरण को बढ़ावा।
  7. देशों के बीच और भीतर असमानता को कम करना।
  8. समावेशी और न्यायसंगत गुणवत्ता युक्त शिक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही सभी को सीखने का अवसर देना।
  9. लैंगिक समानता प्राप्त करने के साथ ही महिलाओं और लड़कियों को सशक्त करना।
  10. सभी के लिये स्वच्छता और पानी के सतत प्रबंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
  11. सुरक्षित, लचीला और टिकाऊ शहर और मानव बस्तियों का निर्माण।
  12. स्थायी सतत विकास के लिये महासागरों, समुद्र और समुद्री संसाधनों का संरक्षण और उपयोग।
  13. स्थायी खपत और उत्पादन पैटर्न को सुनिश्चित करना।
  14. जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से निपटने के लिये तत्काल कार्रवाई करना।
  15. सतत विकास के लिये वैश्विक भागीदारी को पुनर्जीवित करने के अतिरिक्ति कार्यान्वयन के साधनों को मजबूत बनाना।
  16. सतत उपयोग को बढ़ावा देने वाले स्थलीय पारिस्थितिकी प्रणालियों, सुरक्षित जंगलों और जैव विविधता के बढ़ते नुकसान को रोकने का प्रयास करना।
  17. सतत विकास के लिये शांतिपूर्ण और समावेशी समितियों को बढ़ावा देने के साथ ही सभी स्तरों पर इन्हें प्रभावी, जवाबदेही बनाना, ताकि सभी के लिये न्याय सुनिश्चित हो सके।

सहस्राब्दि विकास लक्ष्य

  1. भुखमरी तथा गरीबी को खत्म करना।
  2. सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा हासिल करना।
  3. लिंग समानता तथा महिला सशक्तिकरण को प्रचारित करना।
  4. शिशु-मृत्यु दर घटाना।
  5. मातृत्व स्वास्थ्य को बढ़ावा देना।
  6. एचआईवी/एड्स, मलेरिया तथा अन्य बीमारियों से निजात पाना।
  7. पर्यावरण सततता।
  8. वैश्विक विकास के लिये संबंध स्थापित करना।