सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसारसार्वजनिक पद पर आसीन लोगों को आत्म-प्रतिबंध का प्रयोग करना चाहिये और ऐसी बातें नहीं करनी चाहिये, जो अन्य देशवासियों के लिये अपमानजनक हों।

  • न्यायालय के अनुसार यदि कोई सार्वजिनक अधिकारी ऐसा भाषण देता है, जिसका किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो संबद्ध व्यक्ति के पास हमेशा इसके निपटान हेतु नागरिक उपाय होता है। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 19(2) चाहे जो भी कहे, देश में एक संवैधानिक संस्कृति है; जहां एक अंतर्निहित सीमा है या जिम्मेदार पदों पर आसीन लोगों के भाषण अथवा अभिव्यक्ति पर कुछ प्रतिबंध हैं।
  • अनुच्छेद 19(2) देश की संप्रभुता और अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता आदि के हित में भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के प्रयोग पर उचित प्रतिबंध लगाने के लिये राज्य की शक्तियों से संबंधित है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों और उनके पुलिस बलों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A के तहत सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर मुकदमा चलाने से रोकने का आदेश दिया।

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश केवल धारा 66A के तहत लगाए गए आरोप पर लागू होगा और किसी मामले में अन्य अपराधों पर लागू नहीं होगा।