126वां संविधान संशोधान विधोयक, 2019

यह भारतीय संविधान का 104वां संशोधन है। इसके तहत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 334 में संशोधन किया गया तथा लोक सभा और विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षण की अवधि को 10 वर्ष और बढ़ाया गया है। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोक सभा और राज्य विधानसभाओं में 25 जनवरी, 2030 तक सीटों का आरक्षण बढ़ाने क प्रावधान किया गया है।

  • पूर्व में इस आरक्षण की समय सीमा 25 जनवरी, 2020 तक थी।
  • इस संविधान संशोधन विधेयक द्वारा संसद में एंग्लो इंडियन समुदाय के प्रदत्त आरक्षण को समाप्त कर दिया गया है। आरक्षण के तहत एंग्लो-इंडियन समुदाय के 2 सदस्य लोक सभा में प्रतिनिधित्व करते आ रहे थे।

दल परिवर्तन कानूनः दल परिवर्तन कानून 52वें संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था। इसे भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया है और सामान्यतः इस अधिनियम को ‘दल-बदल कानून’ कहा जाता है। इसके तहत चार अनुच्छेदों (अनुच्छेद 101, 102 और अनुच्छेद 190, 191) में परिवर्तन किया गया है।

91वें संविधान संशोधन अधिनियम 2003: इस अधिनियम द्वारा नियमित दल-बदल से निपटने के लिये दल परिवर्तन कानून को और अधिक प्रभावी बनाया गया। इसने उन प्रावधानों को हटा दिया, जो पार्टी में विभाजन के मामले में विधायकों को संरक्षण प्रदान करते थे। दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए गए किसी भी विधायक को कार्यकारी या मंत्री पद से भी अयोग्य घोषित करने का प्रावधान किया गया है।

संविधान की दसवीं अनुसूचीः साल 1985 में संविधान में 52वां संशोधन कर दसवीं अनुसूची जोड़ी गई थी। इसके तहत यह प्रावधान किया गया कि यदि संसद और राज्य विधायिका का कोई सदस्य पार्टी बदलता है तो उसे सदन से बर्खास्त किया जाएगा।

अनुच्छेद 105: इसमें संसदीय विशेषाधिकार का उल्लेख है, जिसका आशय यह है कि संसद के दोनों सदनों, उनकी समितियों और उनके सदस्यों द्वारा प्राप्त विशेष अधिकार, उन्मुक्तियां और छूट प्रदान है।

अनुच्छेद 105(2): सदन के सदस्य के अधिकार के तहत किसी भी व्यक्ति को सदन की कोई रिपोर्ट, चर्चा आदि प्रकाशित करने के लिये उत्तरदायी नहीं ठहराया जाएगा।

अनुच्छेद 118: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार और संसद के नियमों एवं प्रक्रियाओं के अधीन होनी चाहिये।

अनुच्छेद 121: संसद के सदस्यों को सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा करने से प्रतिबंधित किया गया है।