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संसदीय लोकतंत्र:

Created On: 01-05-2018,7:22 AM

अरस्तू ने कहा था कि राज्य का उदय जीवन के लिए हुआ है और इसका अस्तित्व सद्जीवन के लिए बना रहता है। इस कथन के प्रकाश में देखें तो मानव अपने उद्भव से लेकर आज तक बेहतर से बेहतर जीवन या उत्कृष्ट जीवन की परिस्थितियों की तलाश में संलग्न रहा है। इसी तलाश का परिणाम है कि मनुष्य पहले परिवार फिर कुटुम्ब, ग्राम, समाज से होता हुआ राज्य तक पहुंचा। राज्य के निर्माण के पीछे भावना समाज में व्याप्त संघर्ष, संसाधनों पर कब्जा पाने की होड़ से मुक्ति पाकर नियम निर्देशन की सर्वस्वीकृत व्यवस्था स्थापित करने की रही है।

राज्य निर्माण के साथ ही मनुष्य राज्य के कार्यों के संचालन हेतु शासन प्रणाली के प्रति भी चिंतनशील रहा है। समाज में समस्या की पहचान, उनका निदान तथा व्यवस्था के सुचारु और उचित संचालन की खोज उसके चिंतन प्रक्रिया की खोज बिंदु रही है। विभिन्न शासन प्रणालियों यथा राजतंत्र, धर्मतंत्र से होते हुए शासन प्रणाली ने लोकतंत्र का स्वरूप ग्रहण किया। फिर लोकतंत्र में भी जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने वाली शासन पद्धति में, सबसे लोकप्रिय पद्धति संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की रही।

अब अगर बात संसदीय लोकतंत्र को समझने की है तो इसको सीधे-सीधे शब्दों में कह सकते हैं जनता का शासन जो कि जनता के प्रतिनिधियों द्वारा संचालित किया जाता है जिन्हें प्रचलित संज्ञात्मक पद विधायक या सांसद के नाम से पहचानते हैं। तकनीकी रूप में संसदीय लोकतंत्र शासन प्रणाली का वह स्वरूप है जिसमें कार्यपालिका, विधायिका के सदस्यों में से चुनी जाती है तथा यह उसके प्रति उत्तरदायी रहती है। कार्यपालिका पर व्यवस्थापिका का पूर्ण नियंत्रण रहता है और व्यवस्थापिका द्वारा इसे हटाया भी जा सकता है। इस प्रकार कार्यपालिका या मंत्रिमंडल, लोक सभा या विधान सभा के प्रति प्रत्यक्ष तथा कानूनी रूप से और निर्वाचकों के प्रति अंतिम रूप से अपनी राजनीतिक नीतियों और कार्यों के लिए उत्तरदायी रहती है।

यदि अब संसदीय लोकतंत्र की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो इंग्लैंड में 1688 की रक्तहीन क्रांति के बाद संसद की प्रधानता का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ।

भारतीय परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के माध्यम से भारत पर प्रशासनिक नियंत्रण ब्रिटिश संसद का ही था। आजादी के पहले से ही भारत ब्रिटिश संसदीय प्रणाली में प्रशिक्षित होता रहा है। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो संविधान सभा ने दुनिया का सबसे बड़ा संविधान बनाकर संसदीय लोकतंत्र को ही अपनाया।

संसदीय लोकतंत्र की ऐतिहासिकता और इसके सैद्धांतिकी को जान लेने के बाद इसके व्यावहारिक उपयोगिता के प्रति भी जिज्ञासा उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इसमें जैसा कि विदित है कि संसदीय लोकतंत्र का बहुचर्चित गुण शासकों की उत्तरदायित्वता है। यही एक ऐसी प्रणाली है जिसमें शासकों को निरंतर उत्तरदायित्व की अवस्था में रखा जा सकता है। सरकार अथवा मंत्रिमंडल हरदम संसद यानी व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदायी रहती है और यह उत्तरदायित्व व्यवस्थापिका, प्रश्न, पूरक प्रश्न, स्थगन प्रस्ताव, ध्यान आकर्षण प्रस्ताव, निंदा प्रस्तावों व अन्य अविश्वासों के प्रस्तावों द्वारा सरकार को उत्तरदायी बनाए रखती है। उदाहरण के लिए भारत में हम देख सकते हैं कि एनडीए-2 के शासन के प्रारंभिक स्तर पर भूमि अधिग्रहण बिल को संसद से मंजूरी नहीं मिल पाने के कारण सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया क्योंकि यह बिल व्यवहार में किसान जनता के हित में नहीं था।

संसदीय लोकतंत्र की एक विलक्षणता यह भी है कि यह बहुलवादी समाज में सबको प्रतिनिधित्व प्रदान करती है। आज भारत के विविधतापूर्ण समाज के हर तबके को संसद में प्रतिनिधित्व प्राप्त है। क्योंकि संसदीय प्रणाली में दलीय व्यवस्था पनपती है और दलों को जनता के समक्ष अपने नीतियों-कार्यक्रमों को लेकर जाना पड़ता है और उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए दल में सहभागी भी बनाना पड़ता है। यही कारण है कि भारत में सरकारों के निर्माण और टिकटों को बटवारा करने में जाति, क्षेत्र व धर्म सबका संतुलन बनाना पड़ता है। अगर लोकतंत्र का सबसे जीवंत स्वरूप प्रत्यक्ष प्रजातंत्र है तो संसदीय लोकतंत्र जनप्रतिनिधियों के माध्यम से इस लक्ष्य की कुछ हद तक तो पूर्ति करती ही है।

इन तमाम खूबियों के साथ विगत कुछ वर्षों में संसदीय लोकतंत्र की अवधारणा में व्यावहारिक धरातल पर कुछ विकृतियां आयी हैं जो लोकतंत्र मूल्यों के मानदंड पर काफी गंभीर किस्म की है।

सबसे पहले तो बात आती है उत्तरदायित्व और संसदीय नियंत्रण के सिद्धांत के स्तर पर। वर्तमान में देखा जाए तो विश्व की हर संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री प्रणाली की अनपेक्षित व्यवस्था ने जन्म ले लिया है। आखिर कैसे आया ये परिवर्तन? हम देख सकते हैं कि संसदीय प्रणाली की एक अनिवार्य लोकतांत्रिक जरूरत है चुनाव का होना और जब चुनाव होगा तो दलों का उद्भव स्वभावतः हो जाएगा। तो प्रधानमंत्रीय प्रणाली की कहानी दलीय पद्धति के साथ ही शुरू होती है। आज भारत जैसे विकासशील देशों में कार्यपालिका व्यक्तित्व उन्मुखी बन गई है कारण, इन समाजों में लक्ष्यों, मूल्यों और मानदंडों के बारे मे मतभिन्नता देखी जा रही है। राजनीतिक दल नेताओं के हाथ की कठपुतली हो जाते हैं। व्यवस्थापिका में अयोग्य, स्वार्थी व जोड़-तोड की चरित्र वालों का पहुंचना, साथ ही बुद्धिजीवी वर्ग के अनुत्तरदायी और स्वार्थी बन जाने से जनसाधारण उदासीन हो जाता है और किसी करिश्माई नायक का इंतजार करने लगता है।

ऐसे में जब कोई नेता जनता में अपने एजेंडों, वादों और जनता को दिखाए गए सपनों से भारी समर्थन पाता है और अपने दल को जीत दिलाने में सफल हो जाता है तो वह दल का सर्वेसर्वा हो जाता है और चूंकि संसद या विधानमंडल में सबसे बड़े दल की सरकार बनती है अतः वह सरकार का भी सब कुछ बन जाता है। इस प्रकार संसदीय लोकतंत्र की पहली धारणा सामूहिकता ही धराशायी हो जाती है। और चूंकि बहुमत वाला दल ही संसद में संख्या में सबसे अधिक होता है अतः कोई भी कानून पास होना न होना सब सरकार की मर्जी पर निर्भर हो जाता है। इस प्रकार सरकार पर विधायी नियंत्रण का सिद्धांत भी बिखर जाता है। शायद इसीलिए फ्गांधी जी ने संसद को बांझ और वैश्या कहा है।य् ये दोनों शब्द कठोर हैं पर उस पर पूरी तरह चरितार्थ होते हैं। गांधी जी के अनुसार वह बांझ इसलिए है कि वह स्वयं कोई कार्य नहीं करती यदि उस पर दबाव देने वाली जनाकांक्षा का बोझ न हो तो वह खुद से कुछ नहीं करेगी। वैश्या इसलिए कि संसद जिस मंत्रिमंडल का निर्माण करती है वह स्वयं उस मंत्रिमंडल के नियंत्रण में रहती है। उसका कोई मालिक- मुख्तार भी नहीं होता है। उसका मुखिया यदि बनता भी है तो जैसे ही उसकी कार्य प्रणाली प्रधानमंत्री से मेल नहीं खाती तो उसकी स्थिति वेश्या के जैसी हो जाती है।

वर्तमान प्रणाली में प्रधानमंत्री को आमतौर पर संसद की चिंता अधिक नहीं होती है। वह तो अपने शक्ति के मद में चूर रहता है। उसका पक्ष कैसे जीते इसी की चिंता उसे रहती है। गांधी जी के ये विचार आज के सन्दर्भ में सत्य ही मालूम पड़ते हैं। चूंकि संसदीय पद्धति में दलगत राजनीति कार्य करती है, जिसमें जनता द्वारा चुने गए विधायक/सांसद होते हैं परन्तु उनकी कर्त्तव्यनिष्ठा जनता के हितों के बजाए अपने दल के प्रति होती है। जनता के कल्याण के लिए वे कुछ भी नहीं कर पाते हैं। जो जिस दल का सदस्य होता है उसी को सदन में आंख मूंद कर समर्थन कर देता है या अविश्वास प्रस्ताव जैसे मुद्दे पर संसदीय विहिप की अनदेखी कर अगर किसी दूसरे दल को मत करता भी है तो रिश्वत लेकर_ जैसे यूपीए-प्रथम सरकार के दौरान न्यूक्लियर डील वाले बिल पर वोट के बदले नोट मुद्दा उठा था।

आज अगर संसदीय लोकतंत्र की भूमिका को सामाजिक- आर्थिक लोकतंत्र के स्थापना की दार्शनिक कसौटी पर रखें तो भी यह असफल ज्यादा ही नजर आती है। डॉ- अम्बेडकर का कहना था कि संसदीय लोकतंत्र के प्रति असंतोष इस कारण है कि यह आम जनता के लिए स्वतंत्रता, संपत्ति तथा खुशहाली सुनिश्चित कर पाने में असफल रहा है। आखिर इस असफलता का मूल कारण क्या हो सकता है? अम्बेडकर का कहना है कि गलत दूषित विचारधारा ही इसका कारण है। संसदीय लोकतंत्र ने इस विचार को अपना तो लिया लेकिन इसने आर्थिक असमानताओं की ओर ध्यान नहीं दिया। इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि करार करने वाले पक्ष यदि समान न हुए तो स्वतंत्रता का परिणाम ये होगा कि ताकतवर को यह अवसर देगा कि वह कमजोर को धोखा दे सके। इस विचारधारा का ही परिणाम है कि संसदीय लोकतंत्र ने विशेषताओं में लोकतांत्रिक होकर भी गरीबों, दलितों और वंचितों की आर्थिक विषमताओं को और बढ़ाया ही है। साथ ही सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र न हो वहां राजनीतिक लोकतंत्र असफल हो जाता है। इस तर्क का व्यावहारिक पहलू हम देख सकते हैं कि दोनों विश्व युद्धों के बीच जर्मनी, इटली, स्पेन में संसद असफल हुई तो सत्तर के दशक में भारत में आपातकाल लगाया गया।

आर्थिक-सामाजिक विषमता के कारण जनता की रुचि निरंतर लोकतंत्र में न होकर चुनाव के समय तक सीमित रह गई है। आज उदासीनता का ये आलम है कि लोग एक सरकार की स्थापना करते हैं और उसे स्वयं पर शासन करने के लिए छोड़ देते हैं। यही कारण है कि संसदीय लोकतंत्र में लोगों की सरकार लोगों के लिए नहीं बन पाई बल्कि सुप्रीमो की सरकार, पार्टी सुप्रीमो के लिए बनती है और काम करती है।

यही नहीं अगर संसद के भीतर की कार्यवाहियों का सिंहावलोकन किया जाए तो पिछले कुछ वर्षों में संसद की गरिमा गिरी है और सिर्फ गरिमा का ही नहीं संसदीय सत्ता का भी क्षरण हुआ है। आए दिन संसद में होने वाले हंगामों से संसदीय मंच का अवमूल्यन ही हुआ है अतः स्पष्ट है कि जब जन प्रतिनिधित्व की सबसे महान संस्था ही ठप रहेगी तो न तो सार्थक लोकतंत्र की अवधारणा साकार होगी और न ही जनता का भला होगा। जैसा कि अभी हमने चर्चा की थी कि आर्थिक और सामाजिक विषमता लोकतंत्र को कुंठित कर देती है, इसके कारण जनता में निराशा, भय और उदासीनता का भाव उत्पन्न होता है जिसका फायदा चुनावी उम्मीदवार उठाते हैं और गलत वोट डलवाए जाते हैं, तो कहीं वोट ही नहीं दिया जाता तो कहीं मतदान केंद्र तक कब्जा कर लिया जाता है जिसके कारण आपराधिक प्रवृत्ति के उम्मीदवार चुनाव में सफल हो जाते हैं। अब अगर ऐसे प्रतिनिधि संसद में पहुंचेंगे तो उस पवित्र स्थल का मंजर क्या होगा। आज राजनीतिक दलों का उद्देश्य किसी भी प्रकार से चुनाव जीतना रह गया है इसलिए प्रत्याशियों को टिकट देने का आधार चुनाव जीत पाने की संभावना हो गई है। इसलिए तात्कालिक लाभ की भावना भविष्य के हितों पर भारी पड़ती गई है। लोकतंत्र में चुनाव एक माध्यम है लेकिन आज चुनाव ही लोकतंत्र के केंद्र में आ गया है।

अगर हम भारत में संसद के भीतर कार्यवाहियों पर नजर डालें तो पाएंगे कि जनता के कर से चलने वाली संसद ने ज्यादातर समय और धन की बर्बादी ही की है। एक अध्ययन में ये बताया गया है कि 14वीं लोक सभा के प्रथम तीन वर्ष में 26» समय की बर्बादी सदन की अव्यवस्था, हो हल्ला और शोर-शराबे के कारण हुई। 2007 के बजट सत्र में 73 घंटे का नुकसान अव्यवस्था की वजह से हुआ। 25 में से मात्र 11 विधेयक पास हो पाए। लोकसभा का 40» और राज्य सभा का 49» समय सदन के स्थगन की भेंट चढ़ गया। लोक सभा में 4 विधेयक बिना चर्चा के ही पास कर दिए गए। सदन के 1 मिनट की कीमत जनता के धन की 26,000 रुपए की बर्बादी है। इन परिस्थितियों में कोई भी नागरिक संसदीय लोकतंत्र की सफलता की क्या कीमत लगाएगा। आज लोकतंत्र दो वंश परंपरा में बंट गया है। एक शासक वर्ग का वंश जो बार-बार कभी सत्ता में कभी विपक्ष के रूप में संसद में पहुंचता है और एक शासित वर्ग जो सदा शासित ही होता रहता है। ऐसे में लोकतंत्र का राजनीतिक स्वतंत्रता का स्वरूप, मतदान के रूप में ही जनता के हिस्से में रह गया है, जनता की शासन सत्ता में भागीदारी न के बराबर रह गई है। सारी चर्चा को पूर्ण विराम देने के पहले हम निष्कर्ष रूप में देखें तो आज संसदीय लोकतंत्र देशों में विशेषकर विकासशील देशों में एक नैतिक पहचान के संकट से गुजर रहा है। नैतिक इसलिए कि संसदीय लोकतंत्र से बेहतर विकल्प अन्य कोई व्यवस्था बन नहीं सकती। ऐसे में अगर संसदीय प्रणाली को अपने ही मानदंडों की कसौटी पर खरा उतरना है तो इसे संसदीय मूल्यों, जनप्रतिनिधित्व के आदर्शों तथा उच्च सदाचरण के माध्यम से जनता के हृदय में स्थान बनाना होगा। वैसे देश और काल की बदलती परिस्थितियों के अनुरूप हर प्रणाली में आने वाली विकृतियों को नियंत्रित करने वाली कोई न कोई आशा की किरण रोशनी फैला ही देती है।

आज औद्योगिक पूंजीवादी समाज के दौर में नए सामाजिक आंदोलन, नागरिक समाज, गैर-सरकारी संगठन नए मूल्यों, संघर्ष के नए तरीकों के माध्यम से सरकारों संस्थाओं पर जनकल्याणकारी नीतियों-कार्यक्रमों के निर्माण के लिए निरंतर दबाव बना रहे है। अन्ना हजारे के लोकपाल विधेयक आंदोलन में नागरिक समाज की भूमिका ही थी जो जनता को सड़क पर ले आई और भारत की लोक सभा ने आधी रात्रि को रिजोल्यूशन पास किया। वैसे बेहतर तो यह होगा कि संसद के सदस्य अपनी भूमिका को स्वयं समझें और जनता की भावनाओं इच्छाओं, जरूरतों से खुद को जोड़ें उन्हें समझें और आवश्यक नीति-नियम निर्माण करें। क्योंकि जनता बार-बार सड़क पर नहीं आ सकती और अगर आने लगी तो अराजकता का माहौल निर्मित होगा जो किसी भी समाज और राज्य संस्था के हित में नहीं होगा।

आजाद भारत के नए संविधान निर्माण के बाद पहली लोकसभा में प्रवेश करने पर पंडित नेहरू रोज स्पीकर की तरफ मुंह करके सर झुका कर सम्मान प्रकट करते थे। इसी भावना को दोहराने का कार्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में घुसने के पहले सीढि़यों पर सर टेक कर संसद का सम्मान किया था। दरअसल ये सम्मान ईंट पत्थर से बने किसी ढांचे का नहीं बल्कि देश की जनता के लोकतंत्र में आस्था, जनता की भावना को सम्मान था और एक परोक्ष संदेश भी था कि देश और राष्ट्र निर्माण का कार्य इसी संसदीय लोकतंत्र की परंपरा और मूल्यों के द्वारा ही संभव है।


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