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‘आधार’ का आधार, व्यक्ति या सरकार:

Created On: 09-05-2018,5:42 AM

लोकतन्त्र में सरकारी सुविधाएं जनता के लिए होनी चाहिए न कि जनता को सरकारी सुविधाओं के लिए, वरना वह सुविधा नहीं असुविधा बन जाती है। ऐसा ही कुछ देश के प्रत्येक नागरिक को पहचान की सुविधा दिलाने वाली परियोजना ‘आधार परियोजना’ के साथ हुआ। इस परियोजना का मुख्य विषयवस्तु भारत सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को जारी किया जाने वाला एक ‘पहचान पत्र’ है, जिसे प्रत्येक व्यत्तिफ़ को जीवनभर के लिए केवल एक ही प्रदान किया जा सकता है। सभी भारतीय निवासियों के लिए उपलब्ध करवाने के लक्ष्य के साथ इसे ‘आधार कार्ड’ नाम दिया गया है। इसमें 12 अंकों की एक विशिष्ट संख्या (न्दपुनम प्कमदजपपिबंजपवद छनउइमत) छपी होती है जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (न्दपुनम प्कमदजपपिबंजपवद ।नजीवतपजल वि प्दकपं) जारी करता है।

आधार में व्यत्तिफ़ के नाम, पते सहित उसकी अंगुलियों की छाप एवं आंऽों की पुतलियों की छाप जैसी बायोमैट्रिक जानकारियां भी दर्ज होती हैं। यह भारत में कहीं भी, व्यत्तिफ़ की ‘पहचान प्रमाण’ और ‘पते का प्रमाण’ का काम करता है। भारतीय डाक द्वारा प्राप्त और यू-आई-डी-ए-आई- की वेबसाइट से डाउनलोड किया गया ई-आधार दोनों ही समान रूप से मान्य हैं। कोई भी व्यत्तिफ़ आधार के लिए नामांकन करवा सकता है बशर्ते वह भारत का निवासी हो और यू-आई-डी-ए-आई- द्वारा निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया को पूरा करता हो, चाहे उसकी उम्र और लिंग (जेण्डर) कुछ भी हो।

आधार कार्ड एक पहचान पत्र मात्र है तथा यह नागरिकता का प्रमाण-पत्र नहीं है। अगर एक वाक्य में कहा जाए तो यह व्यत्तिफ़ की कई तरह के पहचान-पत्रें की जगह पर एकमात्र पत्र है, जिसे 16 मार्च, 2013 के सर्वाेच्च न्यायालय के निर्णय एवं वर्ष 2015 के हरियाणा एवं पंजाब उच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर बनवाना या न बनवाना अभी तक स्वैच्छिक है, अनिवार्य नहीं। किन्तु हाल में आधार कार्ड पर तब विमर्श एवं विवाद और बढ़ गए, जब इसे विभिन्न स्तरों पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अनिवार्य करने जैसे कदम उठाए गए। आज भारत सरकार की कई योजनाओं का लाभ लेने के लिए यदि व्यत्तिफ़ के पास आधार नहीं हैं तो उसे उन योजनाओं से वंचित होना पड़ सकता है, साथ ही ऐसे ही कई काम होने मुश्किल होने लगे।

इसके अनिवार्य बनाए जाने पर केंद्र सरकार की तरफ से यह कहा गया कि फ्संबन्धित व्यत्तिफ़ के अलावा इस कार्ड को कोई और इस्तेमाल नहीं कर सकता है, जबकि राशन कार्ड समेत कई और दूसरे प्रमाण-पत्र के साथ कई तरह कि गड़बडि़यां हुई हैं और होती रहती हैं किन्तु आधार में ऐसा नहीं होगा साथ ही कई सारे फायदे भी हैं जैसे बैंकिंग, राशन कार्ड, पासपोर्ट, मोबाइल फोन कनेक्शन आदि सेवाओं के लिए आधार कार्ड ‘पहचान प्रमाण’ और ‘पते का प्रमाण’ के रूप में इस्तेमाल किया जायेगा। सर्विस प्रोवाइडर्स को बार बार ‘नोव योर कस्टमर’ (ज्ञल्ब्) की जांच नहीं करनी पड़ेगी। आधार कार्ड की ऑनलाइन जांच आसानी से और कम ऽर्चे में हो जाएगी। निवासियों को उनके जनसांख्यिकीय और बॉयोमीट्रिक जानकारी के आधार पर नामांकित किया जाएगा। इससे सरकारी और निजी डेटाबेस में से बहुत से डुप्लीकेट और जाली पहचान-पत्र समाप्त करने में मदद मिलेगी। आधार कार्ड से गरीबों को बैंकिंग प्रणाली में प्रवेश का अवसर मिलेगा। आधार कार्ड से गरीब जनता को सरकारी और निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान की गई सेवाओं का लाभ उठाने का अवसर मिलेगा!य्।

वर्तमान में आधार कार्ड कई सारी चीजों के लिए जरूरी होता जा रहा है। विभिन्न जगहों पर पहचान के लिए आधार कार्ड मांगना सामान्य-सी बात हो गई है। जैसे पासपोर्ट जारी करने के लिए, जन धन ऽाता ऽोलने के लिये, एलपीजी की सब्सिडी पाने के लिये, ट्रेन टिकट में छूट पाने के लिए, परीक्षाओं में बैठने के लिये (जैसे आईआईटी, जेईई और अब कई सारे बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षाओं के लिये), बच्चों को नर्सरी कक्षा में प्रवेश दिलाने के लिये, डिजिटल जीवन प्रमाण-पत्र (लाइफ सर्टिफिकेट) के लिए, प्राविडेंट फंड के लिए, डिजिटल लॉकर के लिए, सिम कार्ड ऽरीदने के लिये, आय कर रिटर्न भरने के लिए तथा संपत्ति के रजिस्ट्रेशन के लिए भी आधार कार्ड जरूरी कर दिया गया है।

छात्रें को दी जाने वाली छात्रवृत्ति भी आधार कार्ड के जरिए ही उनके बैंक में जमा करवाई जाएगी, आदि आदि। इतनी सारी जगहों पर आधार को अनिवार्य कर देने का अर्थ यह हुआ कि यदि व्यत्तिफ़ के पास अपनी पहचान जाहिर करने का यह साधन यानि आधार, नहीं है तो उसे अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए स्वयं ही कोशिश करनी होगी। सरकारों के इस प्रयास के विपरीत सोचने वालों की भी संख्या कम नहीं है जिन्होंने इसके अवगुणों को लेकर न्यायालय तक भी गुहार लगाई। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि बॉयोमैट्रिक जानकारी का संग्रहण और उसे साझा करना, जो कि आधार योजना के तहत जरूरी है, निजता के ‘मूलभूत’ अधिकार का हनन है। यद्यपि यह मुद्दा वर्ष 2015 में एक वृहद पीठ के समक्ष भेजा गया था जिसमें सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 11 अगस्त को आधार कार्ड पर तीन महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं- फ्पहला, ये कि आधार कार्ड बनवाना जरूरी नहीं है। किसी को इसे बनवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। दूसरा, ये कि सरकार जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) और गैस सिलिंडर (एलपीजी) वितरण में इसका प्रयोग कर सकती है लेकिन इन सेवाओं के लिए आधार कार्ड देना जरूरी नहीं होगा। तीसरा, अहम आदेश ये है कि कोर्ट की पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ आधार परियोजना पर जब तक अपनी सुनवाई पूरी नहीं कर लेती तब तक सरकार को किसी भी उद्देश्य से आधार कार्ड मांगकर लोगों की निजता को ऽतरे में नहीं डालना चाहिएय्।

बावजूद इसके आधार कार्ड को केंद्र लगातार अनिवार्य करता जा रहा है। अब जबकि सर्वाेच्च नयायालय की संवैधानिक पीठ ने ‘निजता’ को मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान कर दिया है तो निश्चित ही पाँच सदस्यों की संवैधानिक पीठ पर ‘आधार की अनिवार्यता पर चल रही सुनवाई पर भी व्यत्तिफ़ के आंकड़ों के सार्वजनिक हो जाने के ऽतरे पर चर्चा होगी।

आज हम देऽ रहे हैं कि न्यायालय के फैसले का इंतजार किए बगैर ही सभी प्राइवेट टेलिकॉम कंपनियां आधार को मोबाइल नंबर के लिए अनिवार्य कर दी हैं और जिन उपभोत्तफ़ाओं के नंबर आधार से लिंक नहीं हैं उनके पास भारत सरकार के निर्देश का हवाला देकर आधार लिंक करवाने के लिए धमकी भरे एसएमएस और कॉल्स की भरमार लग गई है।

इन प्राइवेट कंपनियों के पास व्यत्तिफ़ की निजी जानकारियाँ कितनी सुरक्षित हैं? और इन सूचनाओं का उपयोग किसी अन्य उद्देश्यों के लिए नहीं किया जाएगा, कहना मुश्किल है। साल 2009 में, जब यह सरकारी प्रोजेक्ट शुरू हुआ, तब सरकारी तंत्र ने बार-बार आश्वासन दिया कि यह वैकल्पिक है और इसे अनिवार्य नहीं बनाया जाएगा। फिर धीरे-धीरे सरकार ने पीछे के दरवाजे से इसे नरेगा के तहत काम का अधिकार और पेंशन हासिल करने के लिए अनिवार्य कर दिया।

जब उच्चतम न्यायालय ने सितंबर 2013 में कहा कि इसकी वजह से लोगों को उनके हक से वंचित नही किया जा सकता, तो सरकारी आदेशों में पहली पंत्तिफ़ में न्यायालय के आदेश को लिऽा जाता और साथ-ही दूसरी पंत्तिफ़ में लिऽ दिया गया- यदि आधार नंबर नहीं है, तो उस व्यत्तिफ़ की आधार पंजीकरण में मदद की जाए। न्यायालय के इस आदेश को मंत्रलय से होते हुए ग्रामीण क्षेत्रें तक पहुंचते-पहुंचते और भी तोड़ा-मरोड़ा गया, और दूसरी पंत्तिफ़ में यह लिऽा जाने लगा कि लोगों को आधार में पंजीकृत किया जाए। अंततः हुआ यह कि इसको आधार की अनिवार्यता की परिभाषा के रूप में अपनी सुविधानुसार पढ़ा गया। जिसके परिणामस्वरूप बहुत से लाभार्थियों के नाम सरकारी छूट एवं योजनाओं से कटते चले गए।

सरकारें इतने पर ही नहीं रुकीं, बल्कि इन वंचितों की संख्या को फर्जी बताकर, डुप्लीकेट या अवैध सुविधा लेने वाले लोगों की तरह पेश कर भ्रष्टाचार में हुई कमी के रूप में पेश किया। यह सिर्फ अपने मुंह मियां मिट्टòू बनाने वाली बात नहीं हैं, यह योजनाओं की विफलता की भी कहानी कहते हैं। बीबीसी हिन्दी ने 17 अत्तफ़ूबर को झारऽंड में हुई संतोषी नामक बच्ची की मौत की ऽबर प्रकाशित की थी, ‘आधार-राशन कार्ड नहीं जुड़े और बच्ची ‘भूऽ’ से मर गई’। संतोषी ने चार दिन से कुछ भी नहीं ऽाया था। घर में मिट्टðी चूल्हा था और जंगल से चुन कर लाई गई कुछ लकडि़यां भी। सिर्फ ‘राशन’ नहीं था। अगर होता, तो संतोषी आज जिंदा होती। लेकिन, लगातार भूऽे रहने के कारण उसकी मौत हो गई। वो दस साल की थी।

गांव के डीलर ने पिछले आठ महीने से उन्हें राशन देना बंद कर दिया था। क्योंकि, उनका राशन कार्ड आधार से लिंक्ड नहीं था। आधार और राशन कार्ड के लिंक न होने की वजह से संतोषी के परिवार को राशन नहीं मिला, दरअसल, झारऽंड सरकार ने अप्रैल से राशन लेने के लिए आधार कार्ड का होना अनिवार्य कर दिया था। इस कारण कई तरह की समस्याएं पैदा हुईं और पिछले दिनों सिमडेगा जिले में संतोषी कुमारी की मौत के बाद विभागीय मंत्री सरयू राय ने सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया।

सरयू राय ने तब कहा कि राशन वितरण के लिए आधार कार्ड का होना अनिवार्य नहीं है। इसके बावजूद झारऽंड के सभी जिलों में इस पर तत्काल अमल नहीं हुआ है। इस कारण हजारों लोग परेशान हैं। यह सोचने की बात है कि यहाँ आधार आवश्यक है या जरूरतमन्द के लिए अनाज। यह तो सिर्फ एक उदाहरण है ऐसी कई घटनाएं हैं जिनमें संवेदना की जगह कार्ड को ही महत्व दिया गया। अगर आधार को यह कहकर प्रचार किया जा रहा हो कि इससे जिन व्यत्तिफ़यों के पास पहचान हेतु कोई कागजात नहीं है, उन्हें एक पहचान-पत्र उपलब्ध करवाना है। तो यह सही नहीं है क्योंकि आधार बनवाने हेतु भी किसी न किसी पहचान-पत्र की आवश्यकता होती ही है, बिना किसी कागजात के आधार बनवाना अभी तक तो संभव नहीं हो पाया है।

उपर्युत्तफ़ तथ्यों को प्रस्तुत करने का अर्थ यह नहीं है कि आधार पूरी तरह अनुपयुत्तफ़ व्यवस्था है। या यह भ्रष्टाचार रोकने में सहायक सिद्ध नहीं हो रहा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आधार कई जगहों पर आर्थिक प्रक्रिया में सहायक सिद्ध हो रहा है। साथ ही किसी भी व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ ऐसे कागजातों की आवश्यकता होती ही है जिसे व्यवस्था मान्यता दे सके और व्यत्तिफ़ की पहचान सुनिश्चित हो सके। इसमें समस्या तब बन जाती है जब इस सुविधा को लागू करने में जल्दबाजी दिऽाई जा रही हो। अर्थात सभी तक इसकी पहुंच हो जाने पर इसको अनिवार्य करने की जरूरत ही नहीं होती। बल्कि कई कागजातों के झंझट से मुत्तफ़ होने के लिए जनसमान्य ऽुद ही इसका प्रयोग करते। किन्तु जहां देश में कई जगह ऐसी हैं जहां पर बिजली, टेलीविजन और समाचार-पत्र तक नहीं पहुंच पाते, वहां पर आधार को अनिवार्य करने एवं उसे प्रमाणित करने जैसी समस्याएं इसके पीछे छिपे उद्देश्य के विपरीत ही साबित होंगी।

साथ ही सरकारों को आधार के आंकड़ें या व्यत्तिफ़ की सूचना के सार्वजनिक न होने एवं उनका गलत इस्तेमाल न होने देने के लिए मजबूत कानून बनाना चाहिए। जिसको सिर्फ संवैधानिक आधार पर सरकारी व्यवस्था ही संचालित करे प्राइवेट व्यवस्था नहीं। नागरिकों की सुविधा के लिए सरकारों को थोड़ी असुविधा भी उठाने से परहेज नहीं करना चाहिए। और अंत में, न्यायालय का निर्णय आने तक आधार को स्वैच्छिक ही रहने दिया जाय तो बेहतर, क्योंकि जरूरी नहीं कि निर्णय आधार की अनिवार्यता के पक्ष में ही आए।


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