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​प्राकृतिक आपदा प्रबंधन:

Created On: 09-05-2018,5:40 AM

मानव जाति ने अपने आविर्भाव काल से वर्तमान अवस्था तक निरंतर प्रकृति के तत्वों में हस्तक्षेप कर खुद को विकसित किया है। मानव व प्रकृति के बीच अंतर्संबंधों ने हर युग में विकास के आधार तथा नए चरण स्थापित किए हैं। आज हम धीरे-धीरे उस युग में प्रवेश कर रहे हैं जहां विज्ञान व प्रौद्योगिकी के निरंतर बढ़ते वर्चस्व के द्वारा मनुष्य दूसरे ग्रहों पर अपने जीवन की संभावनाएं तलाश रहा है। विकास की इस लंबी यात्र में जहां प्रकृति ने एक तरफ उसे अपनी छत्रछाया में ऐसे संसाधन व अवसर उपलब्ध कराए हैं जो मानवीय कौशल से विकास के नए प्रतिमान स्थापित करते हैं_ वहीं साथ ही उसके समक्ष कुछ चुनौतियां व विभीषिकाएं भी प्रस्तुत की हैं, जिससे मनुष्य को प्रकृति की महत्ता व सर्वोच्चता का भाव रहे।

इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रेसेन्ट सोसायटीज की ‘विश्व आपदा रिपोर्ट 2014’ के मुताबिक-

‘वर्ष 2003 से 2014 के मध्य पूरे विश्व में 6525 से भी अधिक प्रकार की छोटी बड़ी आपदाओं से मरने वालों की संख्या जहां 10-5 लाख से अधिक रही, वहीं लगभग 2 अरब लोग इससे प्रभावित रहे।’

विश्व बैंक से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 1980 से 2014 तक पूरे विश्व में आपदाओं से हुई कुल क्षति 4-2 ट्रिलियन डॉलर की रही। वहीं विश्व बैंक की ही श्प्दअमेजपदह पद न्तइंद त्मेपसपमदबमश् नामक रिपोर्ट यह मानती है कि 2030 तक यदि उचित प्रयास न किए गए तो केवल शहरी क्षेत्रें पर आपदाओं के कारण पड़ने वाले बोझ का मूल्य $314 अरब प्रति वर्ष होगा।

21वीं सदी के मानवतावादी तथा उत्तर आधुनिकतावाद के इस युग में जब विश्व संपोषणीय विकास की अवधारणा पर अग्रसर है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा व आगे बढ़ने की सभी अनुकूल दशाएं सुनिश्चित करने का वातावरण निर्मित करने का प्रयास हो रहा है। इस परिदृश्य में ‘आपदा प्रबंधन व इससे संबंधित तत्वों की प्रासंगिकता व महत्व’ निरंतर बढ़ा है।

श्म्ड-क्।ज्रू ज्ीम व्थ्क्।धब्त्म्क्श् के श्प्दजमत क्पेंजमत क्ंजंइेंमश् के मुताबिक भारत के कुल 35 राज्यों व संघ शासित क्षेत्रें में से 25 राज्य आपदा जोखिम की श्रेणी में आते हैं वहीं औसतन 50 मिलियन व्यक्ति प्रति वर्ष एक या एक से अधिक आपदाओं से प्रभावित होते हैं।

आपदा व इससे मिलते-जुलते शब्दों को परिभाषित करने के प्रयास विभिन्न संस्थाओं व विद्वानों द्वारा हर काल में किए गए हैं। इससे पहले कि हम इसकी एक सार्वभौमिक परिभाषा पर पहुंचने का प्रयास करें, यह जान लेना आवश्यक है कि वास्तव में आपदा शब्द स्वयं में ‘सापेक्षता’ व ‘भावात्मकता’ समाहित किए हुए है। प्रकृति के नियम कुछ ऐसे हैं कि वह सृजन व विनाश दोनों का संतुलन बनाए रखती है जो हमारे लिए विनाश है संभवतया वह घटना किसी नए प्रजाति या सृजन का स्फुरण हो।

‘अभिज्ञानशाकुन्तलम’ के चतुर्थ अध्याय में कालिदास ने भी एक श्लोक में कुछ ऐसा ही उद्धरण दिया है-

फ्यात्येकतो{स्तशिखरं पतिरोषधीना, माविष्कृतो{रुणपुरः सर एकतो{र्कः।

तेजोद्वयस्य युगपद्व्यसनोदयाभ्यां, लोको नियम्यत इवैषदशान्तरेषु।।य्

अर्थात् यह संसार दो तेजों (सूर्य व चन्द्रमा) के अस्त व उदय के द्वारा अवस्था विशेषों (सृजन व विनाश) द्वारा निरंतर नियमित होता रहता है।

एक पहलू यह भी है कि कोई भी घटना मनुष्य के लिए तब तक आपदा का रूप नहीं लेती जब तक वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उससे प्रभावित न हो। इस सन्दर्भ में ‘आपदा प्रबंधन’ से जुड़ा अंग्रेजी का एक वाक्य बहुत प्रसिद्ध है कि श्म्ंतजीुनांमे कव दवज शपसस चमवचसमए इनज जीम नदेंमि ठनपसकपदह कवश् तथाकथित विकास की अन्धी दौड़ में जहां पूरे विश्व ने मानवजनित आपदाओं की व्यापक संभावनाओं को आमंत्रित किया है, वहीं उसका भुगतान वह समय-समय पर करता भी रहता है, जैसे- 1984 में भोपाल में हुई 30 मीट्रिक टन मिथाइल आइसो सायनाइड रिसाव की त्रसदी जिसमें 8000 से ज्यादा लोग मारे गए तथा यूक्रेन के चर्नोबेल व जापान के फुकुशिमा स्थित नाभिकीय संयंत्रें में रिसाव हुआ। 1952 में लंदन में हुई ‘ग्रेट स्मॉग’ तथा हाल ही में दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में हुई स्मॉग की घटनाएं भी मानव जनित आपदाएं ही हैं जो कि ‘अविवेकः परम आपदा पदम्’ की पुष्टि भी करते हैं।

भारत सरकार के ‘गृह मंत्रलय’ की रिपोर्ट के अनुसार फ्ऐसी विपत्तिपूर्ण स्थिति जिसमें सामान्य जन जीवन व पर्यावरण का सामान्य तंत्र बाधित हो गया हो और उसके निराकरण व संरक्षण हेतु अतिरिक्त असाधारण व आपातकालीन हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़े ‘आपदा’ कहलाती है।य् वहीं ‘आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005’ की परिभाषा में प्राकृतिक के साथ-साथ मानवजनित आपदाओं को भी शामिल करते हुए कहा गया है कि ‘किसी क्षेत्र में आई वह विपत्तिपूर्ण, अवांछनीय व गंभीर संकट की स्थिति जिसकी वजह से जनजीवन, सम्पत्ति, पर्यावरणीय क्षति हो या ऐसा पर्यावरण निम्नीकरण हो, जो प्रभावित क्षेत्र के समुदाय की संवहन क्षमता से परे हो, आपदा है।य्

एक परिभाषित विषय वस्तु के रूप में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन की अवधारणा का प्रादुर्भाव सन 1989 में हुआ, जब संयुक्त राष्ट्र संघ 1990-2000 के दशक को ‘प्राकृतिक आपदा जोखिम निम्नीकरण दशक’ (छंजनतंस क्पेंजमत त्पेा त्मकनबजपवद क्मबंकम) का अंतरराष्ट्रीय दशक घोषित किया जिससे नीति नियंताओं का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया जा सके। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि इसके पूर्व आपदाओं के प्रबंधन व निस्तारण के प्रयास नहीं किए गए, ब्रिटिश उपनिवेशवादी सरकारों ने भी अपने स्तर पर विभिन्न प्रकार के आपदा प्रबंधन के प्रयास किए थे जिनसे महामारी, दुर्भिक्ष व सूखे जैसी समस्याओं का सामना किया जा सके।

1994 में जापान के योकोहामा में हुआ सम्मेलन इस दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें पहली बार आपदा प्रबंधन के सिद्धांतों को प्रतिपादित किया गया। जापान के ही ‘कोब’ (ज्ञवइम) में वर्ष 2005 में तथा वर्ष 2015 में ‘सेन्डाई’ (ैमदकंप) ‘घोषणा-पत्र’ द्वारा इस दिशा में न्छ के सभी देशों से 2015 में 2030 तक विभिन्न प्रयासों को अपनाए जाने पर बल दिया। इसके पहले 2005 में ही ‘ह्यूगो’ में संपन्न बैठक भी इस दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है कि इसमें आपदा प्रबंधन के लिए अंतरराष्ट्रीय संरचना श्न्दपजमक छंजपवद प्दजमतदंजपवदंस ैजतंजमहल वित क्पेंजमत त्पेा त्मकनबजपवद - न्छप्ैक्त्श् का विस्तार किया गया।

भारतवर्ष में ‘आपदा प्रबंधन’ की व्यवस्थित शुरुआत वर्ष 1999 में भारत सरकार द्वारा जे-सी- पन्त के निर्देशन में गठित एक समिति द्वारा मानी जाती है। इस समिति ने 30 से भी अधिक प्रकार के आपदाओं की पहचान की साथ ही प्राकृतिक आपदा प्रबंधन के लिए आवश्यक संस्थाओं, अथॉरिटी व वित्तीय नियमन के उपाय भी सुझाए।

26 दिसंबर, 2004 को हिंद महासागर में आई सुनामी की विभीषिका के बाद भारत में आपदा प्रबंधन हेतु राष्ट्रीय स्तर के विधान व संरचना की आवश्यकता पर बल दिया गया। वर्ष 2005 को भारत के आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण से मील का पत्थर माना जा सकता है, क्योंकि नवंबर 2005 में भारतीय संसद ने ‘राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम’ पारित किया, जिसके बाद भारत में आपदा प्रबंधन के चिन्तनफलक व उपागमों में व्यापक परिवर्तन हुए।

जहां आपदा निम्नीकरण निधि में आपदा पूर्व हस्तक्षेप तथा नियोजन हेतु प्रावधान है। सामान्यतया 3 स्तरों पर कार्य करता है, परंतु भारत में इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रावधान नही हैं बल्कि कुछ राज्यों व जिलों में ही इसकी स्थापना की गई है। वहीं राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया निधि (छंजपवदंस क्पेंजमत त्मेचवदेम थ्नदक) की स्थापना 13वें वित्त आयोग द्वारा 2010-15 के लिए तथा 14वें वित्त आयोग द्वारा 2015-20 तक की अवधि हेतु की गई थी।

यह उल्लेखनीय है कि प्रतिक्रिया निधि में कोष, करों तथा उपकरों (ब्मेे) से प्राप्त होता है, परंतु 14वें वित्त आयोग ने इसकी आलोचना करते हुए अधिक स्थायी स्रोत व प्रक्रियाओं की आवश्यकता पर बल दिया है, जिससे इस निधि को अधिक स्थायित्व व मजबूती मिल सके।

वास्तव में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की चुनौती एक ऐसा मापदंड है, जिस पर किसी सरकार या शासन तंत्र की राजनैतिक व प्रशासनिक दक्षता आंकी जा सकती है। बजाए लंबे विकास कार्यक्रमों, माडलों व गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के सरकार की आपदाओं के प्रति प्रतिक्रिया प्रक्रिया (त्मेचवदबम डमबींदपेउ) लोगों के हृदय पर लंबे समय तक अंकित रहती है। भारत के संदर्भ में यदि आपदा प्रबंधन कायक्रमों की समीक्षा की जाए तो यहां विशेषज्ञता का अभाव दिखाई देता है, यह अभाव 3 स्तरों पर विभाजित किया जा सकता है।

1- आकस्मिक विशेषज्ञता (ब्वदजपदहमदज म्गचमतजपेम) / प्रशासनिक प्रत्युत्पन्नमतिः यह आपदाओं की स्थिति में तुरंत व प्रभावकारी रूप से राहत व सहायता पहुचाने के अभाव से संबंधित है।

2- अवधारणात्मक विशेषज्ञता (ब्वदबमचजनंस म्गचमतजपेम): यह दीर्घकालिक पुनर्वास की योजनाओं का सृजन व उनके व्यवहारिक निरूपण का अभाव जैसी समस्याओं से संबंधित है। साथ ही सम्पूर्ण आपदा प्रबंधन प्रक्रिया को समवेत रूप में देख पाने का अभाव भी इसमें निहित है।

3- मानव अध्ययन संबंधी विशेषज्ञता (म्जीदवहतंचीपब म्गचमतजपेम)ः इसका तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष के समुदायों की प्रासंगिकता व हकीकत को समझने में समर्थ बनना है तथा उसी अनुभव के आधार पर क्रियान्वयन को बल देना है।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (छक्ड।) के गठन के बाद भारत में आपदा प्रबंधन की दिशा में सराहनीय प्रयास किए गए हैं। तकनीकी अवसंरचना, सैटेलाइट सिस्टम के प्रयोग तथा तटीय क्षेत्रें में बढ़ते चक्रवात की दिशा व गति संबंधी भविष्यवाणियों में सटीकता बढ़ी है परंतु अभी भी आपदा प्रबंधन से संबंधित समस्याओं में स्पष्ट उपागमों व रूपरेखा का अभाव परिलक्षित होता है। विज्ञान ही नहीं बल्कि सामाजिक विज्ञान के दृष्टिकोण को भी ध्यान में रखते हुए अधिक क्रमबद्ध व ऐतिहासिक उपागमों के साथ-साथ विश्लेषणात्मक दक्षता को मजबूत किए जाने की आवश्यकता है। हालांकि यह सरकारी तंत्र के साथ-साथ समाज के सभी वर्गों व खंडों की जिम्मेदारी है कि वे आपदा प्रबंधन के किसी न किसी चरण में अपने योगदान को सुनिश्चित करें। संबंधित अनुसंधान व प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अधिक निवेश के साथ-साथ प्रोत्साहन व पुरस्कार जैसे कदम उठाकर भी आने वाले समय में आपदाओं की विभीषिका को यदि समाप्त नहीं तो बहुत हद तक कम कर ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के दर्शन को चरितार्थ अवश्य कर सकते है।

साथ ही सामान्य जनसमुदाय को आगे बढ़ाकर शासकीय उत्तरदायित्वों की आश्रयता से विलग व्यक्तिगत सरोकार की तरफ अग्रसर होना होगा, तभी ‘आपदा प्रबंधन’ की समस्या का यथार्थ रूप में अधिकतम निराकरण संभव हो पाएगा। यथा-

फ्रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्ततुरगाः

निरालंबो मार्गश्चरणविकलो सारथिरपि

रविर्यात्यंतं प्रतिदिनमपारस्य नभसः

क्रिया सिद्धि सत्वे भवति महतां नोपकरणे।य्


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