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महिला सशक्तीकरण:

Created On: 09-05-2018,5:35 AM

महिलाओं की स्थिति को बहुआयामी आधारों द्वारा समझना आवश्यक है। महिला सशक्तीकरण की सर्वप्रथम पहल 1985 में नैरोबी में सम्पन्न अंतरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन में की गई थी। महिला सशक्तीकरण से तात्पर्य- महिला को शत्तिफ़ से सम्पन्न बनाना है। परन्तु यदि व्यापक रूप से देऽा जाये तो महिलाओं की हर क्षेत्र में भागीदारी ही उन्हें समाज में सशत्तफ़ बनाती है। महिला सशक्तीकरण को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सहभागिता से जोड़ा जाता है तथा महिलाओं की निर्णय लेने की क्षमता को भी उनके सशत्तफ़ होने का मानक माना जाता है। इसके अतिरित्तफ़ महिला सशक्तीकरण से जुड़े अन्य आधार भी हैं जिनके द्वारा महिलाओं के सशक्तीकरण का पता लगाया जा सकता है, जिनमें महिला शिक्षा, स्वास्थ्य, उन पर होने वाली घरेलू हिंसा, उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता एवं सरकारी योजनाओं की जानकारी व पहुंच आदि शामिल हैं। इसके साथ ही सशक्तीकरण एक सतत प्रक्रिया भी है जिसका कभी अंत नहीं हो सकता, जो अनवरत चलती रहती है।

भारत में 21वीं सदी के आरंभ में वर्ष 2001 को ‘महिला सशक्तीकरण वर्ष’ घोषित किया था। इस वर्ष का मूल विषय यह था कि महिलाओं को किस प्रकार से सशत्तफ़ बनाया जाए तथा उन पर हो रहे अत्याचारों से उन्हें मुत्तिफ़ दिलाने हेतु कौन-कौन से कदम उठाए जाएं, जिससे ये महिलाएं स्वाभिमान व आत्मसम्मान के साथ सिर उठा कर अपना जीवन अपनी पहचान के साथ जी सकें। अतः 21वीं सदी में यह आवश्यक है कि महिलाओं को नई सदी की महिला के रूप में पहचान प्राप्त हो सके।

2011 की जनगणना के महत्वपूर्ण निष्कर्षों में महिला व पुरुष के लिंगानुपात में असमानता स्पष्ट रूप से निहित होती दिऽाई दी। इसके साथ ही शून्य से छः वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिंगानुपात में भी लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या कम रही, जो समाज के लिए एक चिंतनीय विषय है, जिस पर हम सभी को काम करना होगा। सभी को अपने विचारों में परिवर्तन लाना होगा। अपने मस्तिष्क से बालक और बालिका का भेदभाव समाप्त करना होगा। जब तक हमारा समाज इस भावनाओं से दूर नहीं होगा तब तक हमारे समाज में प्रगति भी बहुत धीमी गति से होगी। क्योंकि यदि हम अपनी लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा कमतर मानेंगे, उन्हें अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य व सुविधाएं प्रदान नहीं कराएंगें तो वे बालिकाएं जो आगे चलकर एक महिला का रूप लेंगी, समाज में रहते हुए मात्र एक पुतले के समान ही बनी रहेंगीं। इस बात का यह अर्थ निकलता है कि समाज में उपस्थित जो पुरुष हैं वही अधिकांशतः समाज के विकास को प्रगति प्रदान करने में अपना योगदान देते आ रहे हैं। क्योंकि महिलाओं को तो पूर्ण तौर पर कभी ऐसा मौका दिया ही नहीं गया कि वे अपनी क्षमताओं का प्रयोग कर सभी के समक्ष अपने को साबित कर सकें। परन्तु अब समाज बदल रहा है।

अब पहले की अपेक्षा महिलाओं के जीवन और विचारों में भी परिवर्तन हुआ है। इस बदले हुए विचार के पीछे हमारा संविधान है, जिसमें जेन्डर इक्वेलिटी अर्थात् महिला-पुरुष समानता का सिद्धान्त निहित है, जिसके अन्तर्गत स्त्री और पुरुष की समानता की गारन्टी को आत्मसात किया गया है। जिससे महिलाओं के प्रति सामाजिक, आर्थिक तथा शैक्षिक तौर पर समाज में होने वाले भेदभाव को दूर किया जा सके तथा उनकी सामाजिक, आर्थिक व अन्य समस्याओं को दूर करके उनके अंदर एक सकारात्मक परिवर्तन किया जा सके। यह एक प्रयास था, जिसका असर तत्काल समय में तो प्रदर्शित नहीं हो पाया परन्तु आज के समाज में उन प्रयासों का परिणाम कुछ हद तक अवश्य दिऽाई पड़ रहा है।

हमारी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत महिलाओं की समस्याओं से उन्हें मुत्तफ़ कराने हेतु सरकार द्वारा इनके लिए अनेकों योजनाओं तथा कार्यक्रमों को समय-समय पर चलाया जाता रहा है, जिससे महिलाओं को सामाजिक तथा आर्थिक रूप से सशत्तफ़ बनाया जा सके। किन्तु समस्या की बात यह है कि महिलाओं के लिए चलाये गए कार्यक्रमों व योजनाओं की प्राप्ति बहुत कम प्रतिशत में होती है। बात यहां तक है कि इन महिलाओं को इनके लिए चलाए जाने वाले सरकारी कार्यक्रमों के बारे में ही जानकारी नहीं होती। महिलाओं तक इन जानकारियों के ना पहुंचने के पीछे का कारण इन महिलाओं का अधिकतर मात्र में अशिक्षित होना है। यदि ये महिलाएं शिक्षित रहें तो इन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता अवश्य रहती, क्योंकि शिक्षित लोग अपने अधिकारों के प्रति सदैव सचेत रहते हैं। उन्हें पता रहता है कि उनका शोषण किस प्रकार से किया जा सकता है और उन्हें किस बात के लिए क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए अर्थात् ऐसे लोग सदा सावधान रहते हैं। शिक्षा का महत्व न सिर्फ महिलाओं के लिए अपितु पुरुषों के लिए भी उतना ही है। पुरुषों को तो काफी मात्र में इस अधिकार की प्राप्ति होती है, परन्तु हमारे समाज में आज भी महिलाएं बहुत ही कम प्रतिशत में शिक्षा प्राप्त कर पा रही हैं। जबकि शिक्षा की प्राप्ति द्वारा महिलाओं का सर्वांगीण विकास कर उनका सशक्तीकरण किया जा सकता है। एक शिक्षित महिला स्वशत्तिफ़ व आत्मविश्वास से भरपूर रहती है और उसके अन्दर आत्मसम्मान होता है, इसके साथ ही वे आत्मनिर्भर भी होती हैं। शिक्षा के अतिरित्तफ़ एक और मुद्दा है जो महिलाओं के विकास तथा उसके सशत्तफ़ होने के लिए आवश्यक है, वह मुद्दा है स्वास्थ्य का। इन दोनों का ही बहुत घनिष्ठ संबंध है। एक महिला यदि शिक्षित है तो वे शिक्षा के माध्यम से अपने स्वास्थ्य में आने वाले परिवर्तन व समस्याओं के बारे में ध्यान रऽ सकती है, बीमारियों के प्रति सचेत रह सकती है। इस प्रकार से शिक्षा का स्वास्थ्य पर हमेशा सकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है।

शिक्षा द्वारा हम एक बेहतर और सुव्यवस्थित जीवन जीते हैं, परन्तु यदि किसी महिला का स्वास्थ्य अच्छा नहीं होता है तो जो कुछ अवसर उन्हें अपने जीवन में आगे बढ़ने के लिए मिलने होते भी हैं वे भी प्राप्त नहीं हो पाते। अतः हर एक महिला का स्वस्थ होना सबसे ज्यादा अनिवार्य है। भारत देश में आज भी 40» महिलाएं ऐसी हैं जो अरत्तफ़ता, कुपोषण एवं कम वजन से ग्रसित हैं। अधिकतर महिलाओं के अशिक्षित होने के कारण वे अपने बच्चों का भी उचित ढ़ंग से ध्यान नहीं रऽ पाती हैं, जिससे उनके होने वाले बच्चे भी कुपोषित हो जाते हैं। भारत के 33» बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। एक स्वस्थ व शिक्षित महिला आगे आने वाले भविष्य को सुधार सकती है। क्योंकि यदि मां शिक्षित होगी तो वे अपने आने वाले बच्चे का उचित ख्याल रऽ सकती है तथा उसके जन्म के पश्चात् भी उसे उचित शिक्षा व स्वास्थ्य प्रदान कर सकती है। इस प्रकार से यदि बच्चे स्वस्थ व शिक्षित रहेंगे तो हमारे समाज का भविष्य उज्ज्वल होगा। तथापि महिला शिक्षा एक अनिवार्य व आवश्यक पहलू है। ऐसा किसी ने सत्य ही कहा है कि यदि हम एक पुरुष को शिक्षित करते हैं तो मात्र वो पुरुष ही शिक्षित होता है, परन्तु यदि हम एक स्त्री को शिक्षित बनाते हैं, तो पीढि़यां-दर-पीढि़यां शिक्षित हो जाती हैं।

सांस्कृतिक-स्वायत्तता महिलाओं की प्रस्थिति व सशक्तीकरण को एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। महिलाओं की सांस्कृतिक स्वायत्तता से तात्पर्य समाज में उनकी स्वतन्त्रता तथा उनके अधिकार से है, जिसके अन्तर्गत उन्हें निर्णय सम्बन्धी अधिकार मिलने चाहिए-जिनमें पारिवारिक मामले, सामाजिक, राजनीतिक,आर्थिक व स्वयं से जुड़े हर मामलों का अधिकार शामिल होता है। जैसे, महिला का अपने शरीर पर अधिकार, उसे अपनी इच्छा से कहीं आने-जाने का अधिकार, किसी के भी साथ उठने-बैठने का अधिकार, पैतृक सम्पत्ति में अधिकार तथा जीवन साथी चुनने का अधिकार भी सम्मिलित है।

उन महिलाओं को जिन्हें उनके घर के विशेष मामलों जैसे-अपने बच्चों के पालन-पोषण में पुरुषों के साथ महिलाओं को भी निर्णय अधिकार, अपने स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं के निवारण हेतु अपनी इच्छानुसार अधिकार, संतान उत्पत्ति का अधिकार तथा घर में पकने वाले प्रतिदिन के भोजन के निर्णय तक का भी अधिकार प्राप्त होता है। वे महिलाएं पारिवारिक तौर पर सशत्तफ़ महिलाएं कहलाती हैं।

महिलाओं को राजनीतिक मुद्दों में रुचि होने के साथ-साथ उन्हें अपनी इच्छा से बिना किसी के सलाह लिए मतदान करने, चुनाव में प्रत्याशी के तौर पर भागीदारी करने से संबंधित अधिकार उन्हें राजनीतिक रूप से सशत्तफ़ बनाते है।

यदि कोई महिला आय अर्जित करती है तथा उसके घर में बहुत से आर्थिक निर्णय उसके सलाह से ही लिए जाते है अथवा यदि कोई स्त्री नहीं कमाती है उस परिस्थिति में महिलाओं को यदि उनके परिवार में आर्थिक मामलों में अपना निर्णय देने व सहमति देने अधिकार दिया जाता है तो इसका मतलब यह है कि वे आर्थिक रूप से सशत्तफ़ है। यदि महिला से अपने घर में प्रतिदिन के होने वाले ऽर्च पर राय ली जाती है, तो भी वे महिला आर्थिक रूप से सशत्तफ़ कही जा सकती है।

इसके विपरीत जो महिलाएं आर्थिक रूप से सशत्तफ़ नहीं होती या यूं कहें कि उन्हें उनके पिता की सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं दिया जाता, उन महिलाओं के भीतर एक प्रकार का भय और असुरक्षा सी होती है और वे अपने घर में अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के विरोध में कोई आवाज नहीं उठा पाती हैं_ हर अत्याचार को वे अपनी किस्मत समझकर सहती जाती हैं, जो कदापि भी उचित नहीं है। समाज और घर में हो रहे महिलाओं पर अत्याचार उन्हें सशक्तीकरण से बहुत दूर ले जाते हैं या इस बात को इस प्रकार से भी समझा जा सकता है कि जो महिलाएं स्वयं को अबला और कमजोर मान कर चलती है उन्हें लोगों द्वारा और भी प्रताडि़त किया जाता है। इस बात का यही उपाय है कि लोगों की मानसिकता में बदलाव आए। हर दंपत्ति अपनी बेटियों की परवरिश भी अपने बेटों के समान करें और उन्हें सम्मान दें तभी समाज में भी उन्हें सम्मान प्राप्त होगा।

भारतीय संविधान के अन्तर्गत महिलाओं के लिए कई प्रावधानों को शामिल किया गया है। ऐसे कई अनुच्छेद हैं जिसमें महिलाओं के विकास व उनकी सुरक्षा के विषय में प्रावधान प्रस्तुत किए गए हैं, जिसके अन्तर्गत अनुच्छेद-14, 15(3), 16, 19, 21, 23, 24, 39, 39(घ), 243(घ), 42, 47, 330 एवं 332 । इसके अतिरित्तफ़ जिस प्रकार से पिछली सरकारों द्वारा महिलाओं के विकास व सुरक्षा के लिए बहुत सी योजनाएं व कार्यक्रम चलाए गए हैं ठीक उसी समान सामयिक सरकार द्वारा भी महिलाओं के लिए अनेक कार्यक्रम चलाए गए हैं। जिसमें - ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ स्कीम’, ‘वुमेन हेल्प लाइन स्कीम’, ‘उज्ज्वला स्कीम’ इत्यादि ऐसे कई कार्यक्रम शामिल हैं। परन्तु समस्या का समाधान मात्र कार्यक्रम चला देने से नहीं होगा, बल्कि इस बात का समाधान इस प्रकार से होगा कि वे कार्यक्रम जो महिलाओं के लिए चलाए गए हैं उनका कार्यान्वयन ठीक ढंग से हो रहा है या नहीं। अतः चलाए गए कार्यक्रमों के कार्यान्वयन पर उचित निगरानी रऽी जाए जिससे महिलाओं को सरकार द्वारा उनके लिए चलाए गए कार्यक्रमों का लाभ प्राप्त हो सके।

हम ऐसा कदापि नहीं कह सकते कि समाज में महिलाओं की स्थिति में आज के समय में बिल्कुल परिवर्तन नहीं हुआ है। महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन अवश्य हुआ है, परन्तु जो परिवर्तन हुए हैं, वो पर्याप्त नहीं हैं। आज 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की 64-6» महिलाएं साक्षर हैं। पंचायती राज व्यवस्था द्वारा महिलाओं को मिलने वाले आरक्षण ने भी महिलाओं के सशक्तीकरण में अपना योगदान दिया है, क्योंकि इसके जरिये महिलाओं की राजनीति में भागीदारी भले ही कुछ प्रतिशत ही, परन्तु बढ़ी अवश्य है। जिससे महिलाओं के अन्दर जो आत्मविश्वास पैदा हुआ है, उसे वे अपने साथी-संगिनियों तक भी पहुंचाने का प्रयत्न करती हैं, जो समाज के लिए बहुत सकारात्मक बात है।

महिलाओं को आज जिस क्षेत्र में मौका मिल रहा है वे उस क्षेत्र में अपना झंडा गाड़ रही हैं। चाहे वो राजनीति का क्षेत्र हो,चाहे ऽेल-कूद का, चाहे फिल्मी दुनिया का, चाहे शिक्षा का। सिविल सेवा परीक्षा में पिछले 3 वर्षों से महिलाएं ही प्रथम स्थान प्राप्त कर रही हैं। जिनमें- ईरा सिंघल, टीना डाबी एवं नन्दिनी के- आर- हैं। ऽेल-कूद के क्षेत्र में मैरी कॉम, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल, पी- वी- सिन्धु, साक्षी मलिक इत्यादि नाम उल्लेखनीय है। राजनीति के क्षेत्र में पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, सुश्री मायावती, श्रीमती सुषमा स्वराज, इत्यादि नाम शामिल है। इसके अतिरित्तफ़ अभी हाल ही में बनीं ‘मिस वर्ल्ड’ मानुषी छिल्लर भी इसका एक उदाहरण है। इन सभी महिलाओं ने विश्व स्तर पर भारत देश का नाम रौशन किया है जो महिला सशक्तीकरण का एक बड़ा उदाहरण हैं।

उपर्युत्तफ़ बातों से इस बात का स्पष्ट प्रदर्शन होता है कि महिलाओं के सशक्तीकरण हेतु उचित शिक्षा, स्वास्थ्य, उन्हें पारिवारिक, आर्थिक, राजनीतिक मामलों में निर्णय का अधिकार आवश्यक है। अतः महिलाओं को समानता की दृष्टि से देऽते हुए उन्हें अपनी क्षमता को प्रदर्शित करने का मौका दिया जाना हम सबका उत्तरदायित्व है। यह एक विचारशील प्रश्न है कि यदि किसी समाज के स्त्री व पुरुष दोनों मिलकर हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी दें तो उस देश का भविष्य क्या होगा? निश्चित रूप से बहुत ही बेहतर और प्रगतिवादी। महिलाएं समाज का आधा हिस्सा होने के नाते ये अधिकार रऽती हैं कि उन्हें उन सभी अधिकारों की प्राप्ति हो जिसकी वे हकदार हैं। तब कहीं जाकर महिला सशक्तीकरण भारत में स्पष्ट रूप से दिऽाई पड़ेगा।


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